The Mysterious Bell – Chapter 1285
उस्ताद ने अपनी स्टूल उठाई। हाथ में लेकर खड़े रहे। फिर अपने घुटने टेककर स्टूल को उस जगह रख दिया — चबूतरी के दूसरी तरफ़, खाली हिस्से पर, जहाँ पचास साल से कोई नहीं बैठा था।
और उसी वक़्त, गली के दूसरे सिरे से, फिर धूल उठी।
सफ़ेद गाड़ी लौट रही थी।
इस बार शीशा पूरा खुला था। और अंदर से वो हाथ फिर बाहर आया — पर इस बार उँगली पर अंगूठी नहीं थी। इस बार उस हाथ में एक चाबी थी।
और गाड़ी ने अपनी रफ़्तार कम करके, ठीक चबूतरी के सामने से गुज़रते वक़्त, चाबी को खिड़की से नीचे गिरा दिया।
चाबी धूल में गिरी और दो बार उछली।
फिर गाड़ी गई।
सबने धूल में पड़ी चाबी को देखा।
और उस्ताद ने, बिना कुछ कहे, अपने पीतल के छल्ले से अपनी आधी-अटकने वाली चाबी निकाली और दोनों को हवा में पास-पास रखा।
दोनों चाबियाँ एक ही आकार की थीं। पर एक की दाँतेदार किनारी उल्टी थी।
उस्ताद ने धीरे से कहा, "ये दोनों एक ही ताले की हैं।"
चिंटू ने तब कहा, जो बच्चे ही कह सकते हैं, "तो अब काम आसान है, उस्ताद। एक चाबी आपके पास, एक उनके पास। बस दोनों को साथ घुमाना है।"
और तभी, चबूतरी पर रखा बक्सा, बिना किसी के छूए, ज़ोर से टन-टन करके बजा।
जैसे अंदर बैठी कोई चीज़ उठकर खड़ी हो गई हो।
॥
चबूतरी पर रखा बक्सा टन-टन करके बजा और मेरे हाथ से घंटी गिरते-गिरते बची।
सब रुक गए।
शबनम आपा का हाथ चाय की केतली पर था, वो वैसे ही रुक गया। उस्ताद के होंठ खुले रह गए, मानो कोई बात बोलते-बोलते भूल गए हो। पापा जो बैठे थे, खड़े हो गए, बिना सहारे के। और फ़ैज़ — फ़ैज़ ने पीछे दो कदम ऐसे लिए जैसे उसके सामने कोई ज़िंदा चीज़ उठकर खड़ी हो गई हो।
और बक्सा चुप हो गया।
दो सेकंड पहले जो आवाज़ आई थी, वो आवाज़ नहीं थी — वो ऐसी थी जैसे पुराने लोहे के पिंजरे में बैठी कोई चीज़ अपना सिर उठाकर एक बार हमें देख ले और फिर अपनी जगह पर लौट जाए।
मीरा ने कैमरा चालू रखा और मेरी तरफ़ देखा।
"ये — ये क्या था?" टिंकू की आवाज़ फटी हुई आई।
"बक्सा बोला," सानिया ने कहा, बिलकुल सपाट आवाज़ में, जैसे वो किसी और से नहीं, अपने ही कानों से कह रही हो।
"बक्सा नहीं बोला," उस्ताद ने धीरे से कहा और अपनी छड़ी को सहारा देकर खड़े हुए। "अंदर बैठी चीज़ बोली। और उसने कोई नया शब्द नहीं कहा। उसने हमारी ही बात दोहराई — दोनों भाई, दोनों चाबियाँ, दोनों हाथ। बक्सा सिर्फ़ हाँ कह रहा है।"
"हाँ नहीं, उस्ताद," चिंटू ने कहा। "बक्सा हाँ नहीं कह रहा। बक्सा ये कह रहा है कि अब वो चुप नहीं रहेगा।"
मैंने अपनी जेब से घंटी निकाली और देखा — वो गरम थी। न बहुत ज़्यादा, बस इतनी कि हथेली में रखते ही लगे कि कोई धूप में बैठी चीज़ है।
तभी गली के मुँह से एक पुरानी स्कूटर की आवाज़ आई।
सबने गर्दन घुमाई।
किसी ने स्कूटर रोका, कोई उतरा, और फिर हमने पैरों की आवाज़ सुनी — जल्दी में, पर सँभलकर। और उस वक़्त चबूतरी की तरफ़ एक लड़का आया। उम्र पंद्रह-सोलह के आसपास, सफ़ेद कुर्ता, हाथ में भूरे रंग का मोटा लिफ़ाफ़ा।
वो सीधे उस्ताद के सामने आकर रुका।
"इलाही बक्श?" उसने कहा।
उस्ताद ने उसे देखा। फिर मेरी तरफ़ देखा। फिर अपनी आवाज़ में कहा, "मैं उसका भाई हूँ। बोल।"
लड़के ने लिफ़ाफ़ा आगे बढ़ा दिया। "दफ़्तार से आया हूँ। कहा गया था — इलाही बक्श को या उनके घर के किसी आदमी को देना। नाम लिखा है।" और फिर बिना कुछ और कहे, वो पलटकर स्कूटर की तरफ़ चला गया।
"रुक," मैंने कहा।
वो रुका, पर पलटा नहीं।
"कौन सा दफ़्तार?"
"भारद्वाज साहब का दफ़्तार," उसने कहा। "मैं वहाँ चपरासी हूँ। मुझे पता नहीं इसमें क्या है। मुझे सिर्फ़ पहुँचाना था।"
और वो चला गया। स्कूटर की आवाज़ आई और दूर हो गई।
उस्ताद ने लिफ़ाफ़ा अपने दोनों हाथों में लिया। मैंने देखा कि उनके हाथ काँप रहे थे। फ़ैज़ पास आया और उसने उस्ताद की कोहनी थाम ली।
"दादा को बैठा दो," मैंने कहा। "पहले बैठाओ, फिर खोलो।"
उस्ताद को स्टूल पर बैठाया गया। पापा एक तरफ़ खड़े थे, हाथ जोड़े हुए, मानो अंदर ही अंदर कुछ माँग रहे हों। शबनम आपा ने अपना पल्लू कंधे पर सँभाला और सबके पीछे खड़ी हो गईं — इस तरह खड़ी हुईं कि कोई भी बाहर से आए तो पहले उन्हें देखे।
उस्ताद ने लिफ़ाफ़े की गोंद उँगली से कुरेदी, फिर छोटी चाकू माँगी। शबनम आपा ने अपनी जेब से एक चाकू निकाला — वही जो वो समोसे के लिए सब्ज़ी काटने में इस्तेमाल करती थीं — और उस्ताद को दे दिया।
लिफ़ाफ़ा खुला।
उसमें से एक काग़ज़ निकला — मोटा, पीला, ऊपर से मुड़ा हुआ, नीचे पूरी मुहर लगी हुई। उस्ताद ने काग़ज़ खोला और पढ़ने लगे।
और फिर उनके हाथ काँपने लगे।
सच में। जैसे किसी ने उनकी कलाई पकड़कर हिला दी हो। काग़ज़ उनके हाथ में हिलने लगा। पापा तुरंत आगे बढ़े और उन्होंने उस्ताद के हाथ पर अपना हाथ रख दिया।
"धीरे," पापा ने कहा। "धीरे पढ़ो। एक-एक लाइन।"
उस्ताद ने गला साफ़ किया। फिर पढ़ा। धीमे, टूटे हुए स्वर में।
"नोटिस… सार्वजनिक सूचना… ज़मीन संख्या — जो पुराने बाज़ार की पाठशाला की दुकान के नीचे दर्ज है… नीलाम… नीलाम की तारीख़… और…"
वो रुक गए।
"और क्या, उस्ताद?" मीरा ने कहा। उसने कैमरा थोड़ा नीचे किया, पर बंद नहीं किया।
"और — इस ज़मीन पर दावा करने वाले पक्ष को अदालत में हाज़िर होना अनिवार्य है। इलाही बक्श… पुत्र… स्वर्गीय इलाही बक्श की ओर से उनके वारिस… फ़ैज़ बक्श… को अदालत में पेश होना होगा।"
चबूतरी पर एक पल के लिए हवा भी रुक गई।
फ़ैज़ ने उस्ताद के हाथ से काग़ज़ छीन लिया।
"ये झूठ है," उसने कहा। उसकी आवाज़ पहले तेज़ थी, फिर टूट गई। "ये झूठ है। दादा ने कोई ज़मीन नहीं बेची। दादा ने कभी किसी को अंगूठा नहीं दिया। दादा…" — वो रुक गया, काग़ज़ को दोनों हाथों से पकड़े हुए, और उसकी आँखें उस काग़ज़ पर टिकी रहीं जैसे वो काग़ज़ उससे कुछ कह रहा हो। "दादा ने मुझे कभी नहीं बताया कि उनकी ज़मीन पर कोई और भी है।"
उस्ताद ने अपना सिर उठाया।
"मुझे बताया था," उन्होंने कहा। आवाज़ सूखी थी। "उसने मुझे बताया था। मैंने सुना नहीं।"
फ़ैज़ ने उनकी तरफ़ देखा।
"पचास साल पहले," उस्ताद ने कहा। "उसने कहा था — भैया, काग़ज़ ऐसा रखना कि कोई बेच न सके। मैंने कहा था — बेचने वाला कौन है? तू है या मैं? और मैं हँस दिया था। वो चुप हो गया था। मैंने सोचा कि वो हार गया। वो हारा नहीं था। वो मुझे बता रहा था कि उसके पीछे कोई और है।"
मैंने काग़ज़ उस्ताद के हाथ से लिया और उसे ध्यान से देखने लगा।
पीला काग़ज़। ऊपर टाइप किया हुआ पाठ। नीचे मोटी सीधी लकीर। और उस लकीर के नीचे — गोल, नीली, बड़ी मुहर। बराबर नहीं, ज़रा सी घिसी हुई।
मैंने मीरा की तरफ़ देखा।
"मीरा — ये मुहर…"
उसने कैमरा मेरी तरफ़ घुमाया और एक पल में पहचान गई। "वो ही मुहर है," उसने कहा। "जो सफ़ेद फाइल से निकले काग़ज़ पर थी। वही नीली, वही घिसी किनारी, वही नीचे का कोना जो आधा मिटा हुआ है।"
"मतलब?"
"मतलब — जो काग़ज़ चंद्रेश सक्सेना की गाड़ी में था, और जो काग़ज़ आज इलाही बक्श के नाम पर आया है — दोनों एक ही दफ़्तार से निकले हैं। और मैं दावे से कह सकती हूँ कि ये दफ़्तार अदालत नहीं है। ये भारद्वाज कंस्ट्रक्शन का दफ़्तार है।"
फ़ैज़ ने काग़ज़ मेरे हाथ से लिया और उसे देखता रहा।
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