The Mysterious Bell – Chapter 1284
उस्ताद ने नोटिस नहीं लिया।
"मैं इलाही नहीं हूँ," उन्होंने कहा।
"जानता हूँ," चंद्रेश ने कहा, और उनकी आवाज़ में कोई कड़वाहट नहीं थी। "इसीलिए तो मैं इतनी जल्दी आया। नोटिस पर साफ़ लिखा है कि अगर इलाही बक्श खुद अदालत में पेश नहीं होते, तो उनकी तरफ़ से कोई भी सुनेगा नहीं — और जिस दिन सुनेगा ही नहीं, उस दिन दुकान की चाबी बदल दी जाएगी। आप समझ रहे हैं न? चाबी नहीं, आपके भाई की तरफ़ से कोई पेश नहीं होगा।"
मैंने कहा, "उनकी तबीयत खराब है।"
"मुझे पता है," चंद्रेश ने कहा, और उन्होंने मेरी तरफ़ देखा। "बेटा, मैं तुम्हारा दुश्मन नहीं हूँ। मैं तो काग़ज़ पकड़ाकर जाने वाला आदमी हूँ। यह काग़ज़ मेरा नहीं, जिसका भी है, वो मेरे हाथ से भिजवा रहा है। तुम्हें जो करना है करो — पर अदालत का काग़ज़ तारीख़ नहीं बदलता, दुआ नहीं मानता।"
फिर उन्होंने वो नोटिस मेरे हाथ में रख दिया।
"अच्छा, एक बात और," उन्होंने कहा, और पलटने लगे। "इलाही बक्श की तरफ़ से जवाब देने का हक़ सिर्फ़ इलाही बक्श को है, या उसके बेटे को। किसी भाई को नहीं। किसी पड़ोसी को नहीं।" उन्होंने उस्ताद की तरफ़ देखा। "पचास साल बाद भी आपके पास चाबी नहीं है, उस्ताद साहब। और अब तो काग़ज़ भी नहीं है।"
और फिर वो मुड़े और चले गए।
गाड़ी शुरू हुई। धूल उठी। और जब गाड़ी मुड़ी, तो पीछे की खिड़की से एक हाथ बाहर निकला — सफ़ेद आस्तीन, और उँगली पर वो काली अंगूठी।
उसने कुछ किया नहीं। बस हाथ को ऐसे उठाकर रखा जैसे कोई नमस्ते नहीं कर रहा हो, बल्कि गिन रहा हो — हम सबको, एक-एक करके, चबूतरी पर पाँच, छह, सात लोग।
गाड़ी गायब हुई। सन्नाटा रह गया।
सानिया ने पहली बार कुछ धीरे से कहा, "इन्होंने कितने लोग गिने?"
"सात," टिंकू ने कहा।
"नहीं," सानिया ने कहा। "आठ। वो बक्सा भी गिना।"
उस्ताद ने नोटिस उठाया। उनके हाथ नहीं काँप रहे थे। यही सबसे अजीब बात थी।
"अंकुश," उन्होंने कहा, "ये काग़ज़ कह रहा है कि इलाही को खुद आना होगा।"
"तो वो आएँगे," मैंने कहा।
"वो चल नहीं सकते।"
"तो हम उन्हें उठाकर लाएँगे," मैंने कहा। "गाड़ी सात बजे आ रही है। हम उन्हें चारपाई समेत ले आएँगे।"
पापा ने तब कहा, जो उन्होंने पूरे वक़्त नहीं कहा था। "चारपाई नहीं।"
सबने उनकी तरफ़ देखा।
"चारपाई पर लिटाकर नहीं लाना," पापा ने कहा, और उनकी आवाज़ छोटी थी पर साफ़। "अगर कोई आदमी पचास साल बाद अपने भाई से मिलने आ रहा है, तो वो बैठकर आए। बैठने की चीज़ हो। कुर्सी। और अगर कुर्सी न हो तो मेरी गोद।"
उस्ताद ने पापा की तरफ़ देखा। बहुत देर तक।
फिर उन्होंने कहा, "शंकर यादव, तुम आज पहली बार सही बोले हो।"
"पहली बार नहीं," पापा ने कहा। "पहले भी सही बोला था। पर तब किसी ने नहीं सुना।"
और दोनों हँसे। छोटी हँसी, दो ऐसे आदमियों की जिनके बीच पचास साल का सन्नाटा था और वो आज टूट रहा था — किसी बक्से से नहीं, किसी चाय के कप से।
शबनम आपा ने तब कहा, "अब मैं एक बात कहूँगी और कोई मुझे रोकेगा नहीं।"
"कहो," मैंने कहा।
"इस गली में सबसे बड़ी गलती यही हुई," उन्होंने कहा, "कि सबने अपना हिसाब अलग रखा। मैंने अपना, उस्ताद ने अपना, तुम्हारे पापा ने अपना। और जिस दिन हिसाब मिलाने की बात आई, उस दिन सबने कहा — मैं अकेला क्यों मिलाऊँ? मेरा तो कम नुक़सान है।" उन्होंने कप उठाया। "आज से मैं अपना हिसाब सबके सामने रखूँगी। किसी को डरना है तो डरे।"
मैंने उन्हें देखा। "आपा, आपकी बहन का क्या?"
उनका हाथ रुका। बहुत छोटा सा रुकना — किसी ने नहीं देखा, पर मैंने देखा।
"वो अलग हिसाब है," उन्होंने कहा, और अचानक तेज़ होकर, "उसमें चीनी और दूध की कोई गिनती नहीं होती।"
और वो उठकर अपना खाली कप लेकर गुमटी की तरफ़ चली गईं, जैसे हिसाब से भाग रही हों।
मीरा ने उनके पीछे देखा, फिर मेरी तरफ़।
"हर बार जब कोई किसी को नहीं देख रहा होता, यही होता है," उसने कहा।
"क्या?"
"कोई पुरानी बात हाथ में आ जाती है," मीरा ने कहा। "और आदमी उसे फेंक देता है — जैसे बर्तन धोते वक़्त पानी फेंकते हैं। पर फेंकने से वो बात जाती नहीं। वो सिर्फ़ ज़मीन पर गिरती है।"
उसने अपना कैमरा उठाया और चबूतरी पर रखे बक्से की तरफ़ घुमाया। लाल बत्ती जल उठी।
"यह सब रिकॉर्ड कर रही हो?" उस्ताद ने पूछा।
"जी," मीरा ने कहा। "क्यों?"
"क्योंकि जो रिकॉर्ड होता है, उसे कोई बदल नहीं सकता," उस्ताद ने कहा। "मैं पचास साल से यही सोचता रहा कि मेरी बात किसी ने नहीं सुनी। शायद सुनी होती, अगर मैंने कभी कही होती।"
तभी बक्से से आवाज़ आई।
छोटी, धीमी — किसी चीज़ के खिसकने की आवाज़। पर इस बार सबने सुना। चिंटू कूदकर पीछे हटा। रफ़ीक़ ने अपना टूटा चश्मा पकड़ लिया। सानिया के हाथ से कप छूटते-छूटते बचा।
"ये…" गुड्डू ने धीरे से कहा, "ये अंदर से आई ना?"
"हाँ," मैंने कहा। "ये अंदर से आई।"
"अंदर क्या है?"
मैंने बक्से पर हाथ रखा। गरम था — पूरा, इस बार पूरा।
"कुछ नहीं," मैंने कहा। "बस एक बात है जो तय नहीं हुई।"
"कौन सी?"
मैंने उस्ताद की तरफ़ देखा। उस्ताद ने मेरी तरफ़ देखा। फिर दोनों ने पापा की तरफ़ देखा।
और पापा ने कहा, "यह बात यहीं तय होगी। आज। दोपहर से पहले।"
मैंने नोटिस उठाया और उसे कपड़े में लपेटकर अपनी जेब में रखा — उसी जेब में जहाँ हत्था था। दोनों चीज़ें मिलते ही गरमाहट फैल गई, जैसे कोई दो पुराने दोस्त एक-दूसरे को देखकर हाथ मिला रहे हों।
"सुनो," मैंने सबसे कहा। "आज चार काम हैं। एक — इलाही बक्श सात बजे यहाँ। दो — बक्सा उसी वक़्त खुलेगा, दोनों भाइयों के हाथ से। तीन — इस नोटिस का जवाब आज संध्या तक पहुँचेगा, क्योंकि जो आदमी सुबह आकर काग़ज़ पकड़ा गया है, वो शाम को भी आएगा। और चार…"
मैं रुक गया।
"चार क्या?" सानिया ने कहा।
"चार — आज उस्ताद और मैं नगर निगम जाएँगे, कुंदनलाल से उस पन्ने की असली नक़ल लाने। जो काग़ज़ एक दफ़्तार में है और जिसका एक हिस्सा भवन की दीवार में है, उसका तीसरा हिस्सा भी कहीं है। और जब तीन हिस्से आ जाएँगे, तब कोई अंगूठा नहीं माँगेगा। हम माँगेंगे।"
टिंकू ने कहा, "और मैं क्या करूँगा?"
"तुम सबसे ज़रूरी काम करोगे," मैंने कहा। "तुम मीरा के साथ रहोगे और कैमरा पकड़ोगे। आज जो भी हो, जो भी कहे, जो भी पकड़ाए — वो हजम नहीं होना चाहिए। समझे?"
उसने गंभीरता से सिर हिलाया। पर फिर तुरंत उसका असली चेहरा आ गया। "उस्ताद, अगर कैमरा चोरी हो जाए तो?"
"तो तुम उसको पीछे-पीछे भागकर ढूँढ़ोगे।"
"और अगर मैं भी पकड़ लिया जाऊँ?"
"तो पतंग ढूँढ़ने की बात कह देना।"
वो हँसा। पूरी गली में वो हँसी फैली।
पाँच बजकर सैंतालीस मिनट पर गाड़ी गली के मुँह पर रुकी। मैंने देखा — वो भोला भाई की पुरानी जीप थी, जिसका पीछे का हिस्सा टूटा था और जिसे भोला भाई ने "आज रास्ता लंबा है, दिल छोटा नहीं करना" कहकर सजाया था।
फ़ैज़ जीप से उतरा और चबूतरी की तरफ़ भागा।
"दादा तैयार हैं," उसने कहा, साँस फूल रही थी। "पर उन्होंने एक बात कही।"
"क्या?"
"उन्होंने कहा — मुझे उस चबूतरी पर बैठाओ, जहाँ मैंने पचास साल पहले बैठना छोड़ा था।"
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