The Mysterious Bell – Chapter 1281
फ़ैज़ ने धीरे से कहा, "दादा ने ये नहीं चुराया। दादा ने इसे बचाया था।"
"क्यों?" उस्ताद ने कहा, और उनकी आवाज़ में गुस्सा नहीं था, बस एक बूढ़ी थकान थी। "क्यों छिपाया? क्यों नहीं कहा — भाई, ये तेरी दुकान में है, तेरा हक़ है, ले जा?"
"क्योंकि तब तुम सुनते नहीं थे," फ़ैज़ ने कहा। बिल्कुल सीधा, बिना डरे। "बारह साल का लड़का भी जानता है कि गुस्से में कान नहीं सुनते। दादा ने सोचा होगा — जिस दिन भाई सुनेगा, उस दिन ये बक्सा खुद उससे बात करेगा।"
उस्ताद कुछ देर चुप रहे। फिर उन्होंने हथेली से अपना मुँह ढक लिया और बहुत धीरे से, इतने धीरे कि लगा हवा बोल रही है, कहा, "पचास साल। पचास साल इसने मेरे पैरों के नीचे इंतज़ार किया।"
मैं उठा और दरवाज़े की तरफ़ गया। शटर आधा खुला था, बाहर से रोशनी की पतली लकीर आ रही थी।
"मीरा?"
"हूँ।" उसकी आवाज़ बाहर से आई। "सब ठीक है? तीन आवाज़ें आई थीं, फिर चुप्पी। मैं अंदर आने ही वाली थी।"
"ठीक है। पर एक चीज़ है जो तू देख।"
"क्या?"
"बक्से के नीचे कुछ चिपका है। कोई पर्ची। मुझे पढ़ने दे।"
उसने शटर के नीचे से झाँका, फिर हाथ बढ़ाकर लालटेन मेरी तरफ़ सरकाई। "ले। रोशनी अच्छी रख। काग़ज़ पुराना लग रहा है, फट सकता है।"
मैंने बक्से को ज़रा तिरछा किया। उसके नीचे की तरफ़, चिपचिपी पुरानी गोंद से, एक काग़ज़ चिपका था। पीला, सूखा, किनारे से उखड़ा हुआ। मैंने बहुत हल्के हाथ से उसे निकाला।
काग़ज़ सूखा था, पर उसकी स्याही अभी भी बोलती थी।
मीरा दरवाज़े पर आ गई थी। उसने बाहर खड़े-खड़े गर्दन अंदर डाली और पढ़ने लगी। उसकी आवाज़ धीमी थी, जैसे काग़ज़ भी सुन रहा हो।
"यह ताला तभी खुलेगा जब दोनों भाई एक साथ अपनी गलती मानें। एक भी टेढ़ा बोला, तो दूसरा ताला बंद रहेगा।"
नीचे छोटी लाइन थी, बहुत महीन लिखाई में, काँपती स्याही में।
"और यह बात दोनों को साथ लिखनी है। न कोई बड़ा, न कोई छोटा।"
कमरे में चुप्पी छा गई।
टिंकू ने धीरे से कहा, "मतलब ये बक्सा भी सभा माँग रहा है।"
"नहीं," मैंने कहा। "ये सभा नहीं माँग रहा। ये बैठक माँग रहा है। दो आदमी। एक बक्सा। और दो सच्ची बातें।"
फ़ैज़ ने अपनी जेब से कपड़े में लिपटा बंडल निकाला — दादा की चिट्ठियाँ। वो एक-एक करके उन्हें उलटने लगा, धीरे से, जैसे कोई पुरानी किताब के पन्ने फेर रहा हो।
"रुको," उसने कहा। "सातवीं चिट्ठी में दादा ने इसका ज़िक्र किया है। सुनो।" उसने लालटेन की रोशनी में काग़ज़ को आँखों के पास लाया और पढ़ा, "भाई, मैंने बक्सा तेरे फ़र्श के नीचे रखा है। उस पर दो ताले लगे हैं। एक ताले की चाबी तेरे पास रहेगी, एक मेरे पास। दोनों एक ही वक़्त पर घूमेंगे तभी खुलेगा। और हाँ — ताला खोलने से पहले उस काग़ज़ को पढ़ लेना जो बक्से के नीचे चिपका है। वरना ताला घूम जाएगा और हम फिर पचास साल चुप हो जाएँगे।"
"चाबी का ज़िक्र नहीं," मैंने कहा। "उसने ये नहीं लिखा कि चाबी कहाँ है।"
"नहीं लिखा," फ़ैज़ ने कहा, और मुझे देखने लगा।
उस्ताद ने धीरे से कहा, "क्योंकि चाबी की बात लिखने की ज़रूरत ही नहीं थी। जिस आदमी के पास चाबी है, वो जानता है कि उसके पास चाबी है।"
मैंने जेब में हाथ डाला और घंटी निकाली। उसकी सतह ठंडी थी, बिल्कुल शांत। हत्था भी पास था, वो भी चुप। मैंने घंटी पर उँगली रखी और हल्का सा बजाया।
टन।
एक ही आवाज़। कोई शब्द नहीं। कोई इशारा नहीं।
मैंने फिर बजाया। टन। फिर तीसरी बार। टन।
"ये चुप क्यों है?" टिंकू ने पूछा। "हमेशा तो कुछ न कुछ बोलती है।"
"क्योंकि यहाँ उसका काम नहीं है," मैंने कहा। मैंने घंटी जेब में वापस रखी। "ये तंत्र हमें वहीं मदद देता है जहाँ दो इंसान खुद नहीं पहुँच पाते। पर जहाँ दो भाई खुद बैठकर सच बोल सकते हैं, वहाँ उसे बोलने का हक़ नहीं। वो चुप रहेगी। ये उसका अपना नियम है।"
उस्ताद ने बक्से को दोनों हाथों से थामा और उसे अपनी तरफ़ खींचा।
"उठाओ इसे," उन्होंने कहा। "फ़र्श पर नहीं रखूँगा। मेज़ पर रखूँगा। जो चीज़ पचास साल मिट्टी में रही, वो अब मेज़ पर रहेगी।"
हमने बक्सा उठाया। भारी था, पर उतना नहीं जितना मैंने सोचा था। अंदर से कुछ खिसका। हल्की-सी आवाज़ आई, जैसे काग़ज़ का कोई मोटा पुलिंदा एक तरफ़ से दूसरी तरफ़ सरक गया हो। और उसके साथ एक धातु जैसी छोटी टन-टन, जो तुरंत बुझ गई।
टिंकू ने लालटेन ऊँची की। "अंदर कुछ है।"
"हाँ," मैंने कहा। "पर ताला खुलने से पहले नहीं देखेंगे।"
"क्यों नहीं?"
"क्योंकि अगर हम अभी छेद से झाँकेंगे, तो हम वही करेंगे जो रणवीर करता है — किसी और की बंद चीज़ में पहले आँख डालना।" मैंने उसकी तरफ़ देखा। "हम वो नहीं करेंगे। हम इंतज़ार करेंगे।"
टिंकू ने सिर हिलाया। फिर वो बोला, "पर एक बात पूछूँ?"
"पूछ।"
"अगर दोनों ताले एक साथ खुलते हैं, तो दोनों चाबियाँ चाहिए। एक उस्ताद के पास है। दूसरी किसके पास?"
कमरे में फिर वही चुप्पी आई। पर इस बार चुप्पी में कुछ और था — जैसे सबको जवाब पता हो और कोई बोलना न चाहता हो।
मैंने उस्ताद की तरफ़ देखा।
उन्होंने बक्से को मेज़ पर रखा, फिर अपनी कमर से चाबियों का गुच्छा खोला — वो पुराना पीतल का छल्ला, जिसमें पचास साल की चाबियाँ लटकती थीं। उन्होंने एक-एक करके तीन चाबियाँ निकालीं और तीनों को दोनों तालों के छेद में लगाकर देखा।
पहली चाबी पहले छेद में गई, घूमी, और आधी घूमकर अटक गई।
दूसरी चाबी दूसरे छेद में गई ही नहीं। छेद छोटा था। चाबी का दाँता मोटा था।
तीसरी चाबी पहले छेद में भी नहीं गई।
उस्ताद ने गुच्छा वापस कमर पर बाँधा और बहुत देर तक बक्से को देखते रहे।
"ये दो ताले एक जैसे दिखते हैं," उन्होंने कहा, "पर हैं नहीं। इन्हें मंसूर ने बनाया था। वो ऐसे ताले बनाता था जिनमें एक चाबी दोनों में न लगे। ऐसे ताले में दोनों भाइयों को साथ खड़ा होना पड़ता था। एक हाथ से दो ताले नहीं खुलते। यही उसका तरीका था।"
"तो एक चाबी आपके पास है," मैंने कहा। "दूसरी?"
उस्ताद ने आँखें उठाईं। कुछ देर वो मेरी तरफ़ देखते रहे, और उनकी आँखों में वो सब था जो पचास साल की चुप्पी में जमा हो गया था।
"दूसरी चाबी," उन्होंने कहा, "इलाही के पास ही होगी।"
फ़ैज़ ने एक कदम आगे बढ़ा। "दादा के पास तो बस वही एक चाबी है जो तकिये के नीचे रहती है। बक्से की नहीं। दुकान की।"
"तो फिर दूसरी कहीं और है," मैंने कहा। "या फिर…"
"या फिर क्या?" टिंकू ने पूछा।
मैंने बक्से के दोनों तालों को रोशनी के सामने किया। एक ताला थोड़ा ऊपर था, दूसरा थोड़ा नीचे। दोनों के बीच में एक बहुत पतली दरार थी, और उस दरार के किनारे-किनारे वही दो लकीरें-बिंदु का निशान छोटा-सा उभरा था, जैसे दो ताले मिलकर एक तीसरा निशान बना रहे हों।
"या फिर दूसरी चाबी उस आदमी के पास है जिसने इन तालों को लगाया," मैंने कहा। "और वो आदमी अब इस दुनिया में नहीं।"
तभी शटर पर कुछ टकराया।
छोटी, तेज़ आवाज़ — जैसे कंकड़।
टिंकू उछल पड़ा। फ़ैज़ ने छड़ उठा ली। उस्ताद ने बक्से को अपने दोनों हाथों से ढक लिया, जैसे कोई उसे छीन लेगा।
"मीरा?" मैंने आवाज़ दी।
बाहर से उसकी आवाज़ आई, थोड़ी हकलाती हुई। "कोई नहीं। कोई नहीं दिख रहा। बस एक कंकड़ आया। किसी लड़के ने फेंका होगा।"
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