The Mysterious Bell – Chapter 1280
मैंने फोन रखा और एक क्षण के लिए सोचा — कुआँ? कौन सा कुआँ?
शाम छह बजे उस्ताद आए। साथ में फ़ैज़, टिंकू, और एक पुरानी लोहे की छड़। उन्होंने छड़ दीवार के साथ टिका दी।
“शटर गिरा,” उन्होंने कहा।
मैंने शटर गिराया। अंदर अंधेरा था। मैंने लालटेन जलाई और बीच में रखी।
मीरा दरवाज़े के बाहर रुकी। “मैं अंदर नहीं आ रही। बाहर रहूँगी। अगर कुछ हो, तो शोर करना।”
“ठीक है।”
शबनम आपा गुमटी के बाहर खड़ी थीं। उन्होंने मुझे देखा और सिर हिलाया — मतलब, मैं यहाँ हूँ।
मैं अंदर गया।
उस्ताद ने दुकान के बीच का पुराना गल्ला हटाया — वो लोहे का भारी डिब्बा, जिसमें पैसे रखे जाते थे। फिर उन्होंने मुझे देखा।
“अंकुश, यह फ़र्श पचास साल पुराना है। मैंने इसे बनवाया था। मुझे पता है कहाँ से उठता है।”
उन्होंने छड़ उठाई। इशारा किया — दीवार के उस कोने की तरफ़, जहाँ पीछे का ट्रंक रखा रहता था।
टिंकू ने ट्रंक खींचा। फ़ैज़ ने फ़र्श पर हाथ रखा।
“यहाँ,” फ़ैज़ ने कहा। “यह टाइल अलग है। बजती है।”
उस्ताद ने छड़ की नोक टाइल के किनारे में डाली। ज़ोर लगाया। टाइल उठी — चरचराती हुई, जैसे बहुत साल से किसी ने उसे नहीं छुआ हो।
उसके नीचे मिट्टी थी। सूखी, सख़्त। और उसके नीचे — कुछ सख़्त और चिकना।
उस्ताद ने छड़ से खुरचा। दो इंच मिट्टी हटी। और फिर हमें दिखा।
लोहे का एक बड़ा ढक्कन।
“यह क्या है?” टिंकू ने पूछा।
“नहीं पता,” उस्ताद ने कहा। “पचास साल पहले मैंने इस फ़र्श को बनवाया था। मुझे याद नहीं कि मैंने कभी यहाँ कुछ दबाया हो।”
“तो किसी और ने दबाया,” मैंने कहा।
“किसने?”
“वही जिसने सब कुछ दबाया है।”
हम बैठ गए। फ़र्श पर चारों तरफ़ मिट्टी फैली थी। लालटेन की रोशनी में वो ढक्कन चमक रहा था, जैसे उसे हमारी तरफ़ देखना हो।
मैंने हाथ बढ़ाया। ढक्कन छुआ।
और ठीक उस वक़्त, बिना किसी ने कुछ कहे, बिना घंटी बजे, दुकान के फ़र्श के नीचे से आवाज़ आई।
धीमी। भारी। लोहे की। एक बार — जैसे दस्तक।
फिर दूसरी बार।
फिर तीसरी बार।
तीन दस्तकें।
टिंकू ने मेरी कमीज़ पकड़ ली। फ़ैज़ के हाथ से छड़ छूट गई और वो ज़मीन पर टकराई।
और घंटी — जो अब तक बिल्कुल चुप थी — मेरी जेब में गरम हो उठी, और हत्थे के साथ मिलकर एक आवाज़ निकाली, इतनी साफ़ कि लगा किसी ने मेरे कान में बोला हो —
“अंदर कोई और नहीं है। अंदर तू है।”
मैं फ़र्श पर झुका।
और उस ढक्कन पर, लालटेन की पीली रोशनी में, मुझे वो निशान दिखा।
दो लकीरें। और बीच में बिंदु।
वही निशान, जो चूल्हे के पीछे वाले दरवाज़े पर था। जो घंटी के छल्ले पर था। जो मंसूर के पीले काग़ज़ पर था। जो पाठशाला की घंटी के हत्थे पर था।
मैंने उँगली उस पर रखी।
ढक्कन ठंडा था। बर्फ़ जैसा ठंडा।
और मैंने धीरे से कहा, जैसे खुद से —
“अब बताओ, तुम क्या हो।”
॥
मेरी उँगली उस ढक्कन पर टिकी रही। बर्फ़ जैसी ठंडी सतह। और उसके नीचे से कोई जवाब नहीं आया।
तीन दस्तकें हो चुकी थीं। अब सिर्फ़ लालटेन की हल्की फड़फड़ाहट बची थी, और टिंकू की साँस, जो बहुत तेज़ चल रही थी।
"उस्ताद," टिंकू ने फुसफुसाया, "अंदर कुछ है।"
"हाँ," मैंने कहा। "कुछ है। पर वो कुछ बोल नहीं रहा।"
"फिर किसने दस्तक दी?"
मैंने हाथ नहीं हटाया। "जिसने दी, वो अब चुप है। मतलब वो हमसे पहले सवाल पूछ रहा है।"
फ़ैज़ ने छड़ उठाई, जो उसके हाथ से गिरी थी। उसके हाथ काँप रहे थे, पर आवाज़ साफ़ थी। "अंकुश भाई, अगर ये वही बक्सा है जो दादा ने छिपाया था, तो इसे खोलना हमारा हक़ है।"
उस्ताद अब तक कुछ नहीं बोले थे। वो फ़र्श पर बैठे थे, घुटनों पर हाथ रखे, और उस ढक्कन को ऐसे देख रहे थे जैसे कोई पुराना आदमी अपनी खोई हुई उम्र देख रहा हो।
"उस्ताद?" मैंने धीरे से कहा।
"यह मेरी दुकान का फ़र्श है," उन्होंने कहा। आवाज़ ऐसी जैसे गला सूख गया हो। "मैंने इसे अपने हाथ से बनवाया था। ईंट-ईंट मैंने छुई थी। और आज पचास साल बाद पता चल रहा है कि मेरे ही फ़र्श के नीचे कुछ दबा था।"
"तो उठाइए," टिंकू ने कहा। "देखते हैं क्या है।"
"उठाना है," मैंने कहा। "पर सोच-समझकर। अगर ये चीज़ इतने साल दबी रही है, तो इसके साथ जल्दबाज़ी नहीं करनी।"
उस्ताद ने छड़ उठाई। फिर उन्होंने फ़ैज़ को इशारा किया और मुझे। हम तीनों ने ढक्कन के किनारे पर उँगलियाँ डालीं। टिंकू ने भी हाथ बढ़ाया, पर मैंने उसे रोक दिया।
"तू लालटेन पकड़। रोशनी ठीक रख। अंधेरे में ये काम नहीं होता।"
उसने लालटेन उठाई और ठीक मेरे कंधे के पास रखी। रोशनी में फ़र्श की उभरी हुई मिट्टी, उस्ताद के घुटनों पर लगी धूल, और वो लोहे का ढक्कन साफ़ दिखने लगा।
ढक्कन भारी था। बहुत भारी। जैसे कोई चीज़ ऊपर से नहीं, नीचे से उसे पकड़े हुई हो।
"एक साथ," उस्ताद ने कहा। "उठाओ।"
हमने ज़ोर लगाया। ढक्कन चरचराया, फिर ज़रा ऊपर आया, फिर उसके किनारे से मिट्टी की पतली धार नीचे बही, और मिट्टी के साथ एक अजीब सी गंध उठी — ज़ंग की, पुराने तेल की, और उससे भी पुरानी किसी चीज़ की।
ढक्कन एक तरफ़ सरक गया।
और हम सब झुककर उसमें देखने लगे।
नीचे गड्ढा नहीं था। नीचे एक बक्सा था।
छोटा। लोहे का। मेरी बाँह जितना चौड़ा, और हाथ भर गहरा। कोनों पर पीतल की पट्टियाँ, ऊपर की सतह पर हल्की ज़ंग, और बीच में दो चीज़ें जो एक साथ लगी थीं, जैसे दो आदमी कंधे से कंधा मिलाकर खड़े हों।
दो ताले।
एक बक्सा, और उस पर जुड़वाँ ताले। दोनों एक ही आकार के, दोनों के ऊपर छोटा-सा उभरा निशान। एक-एक छेद, दोनों बगल-बगल।
टिंकू ने लालटेन ऊपर उठाई और फिर एकदम हँस पड़ा। वो हँसी इस जगह पर इतनी अजीब लगी कि फ़ैज़ भी चौंक गया।
"अरे उस्ताद," टिंकू ने कहा, "तुम्हारी दुकान नहीं, खज़ाने की दुकान निकली। पहले ढक्कन, अब बक्सा, अब दो ताले। कल कोई सोने की मुहर निकले तो मुझे बुला लेना पहले।"
"हँस ले," मैंने कहा। "पर ध्यान से सुन — खज़ाना नहीं है ये। हिसाब है। और हिसाब वाला बक्सा भी तभी खुलता है जब दो लोग साथ खड़े हों। देख, दो ताले हैं न। एक आदमी के हाथ में एक ताला, दूसरे के हाथ में दूसरा। दोनों साथ नहीं हुए तो बक्सा बंद।"
टिंकू की हँसी धीरे से बुझ गई। "मतलब एक आदमी अकेले खोल ही नहीं सकता?"
"नहीं।"
फ़ैज़ ने बक्से को छुआ। उसकी उँगलियाँ सतह पर सरकीं और फिर रुक गईं।
"ये बक्सा है," उसने धीरे से कहा, "या सन्दूक?"
उस्ताद आगे आए। उन्होंने घुटनों के बल बैठकर दोनों हाथों से बक्से के किनारे थामे, और फिर ऐसे झुके जैसे किसी बच्चे का चेहरा देख रहे हों।
उनके हाथ काँपने लगे।
"यह," उन्होंने कहा, और आवाज़ टूट गई। "यह मेरी पाठशाला का हिसाब-बक्सा है।"
टिंकू ने मेरी तरफ़ देखा। मैंने सिर हिलाया — चुप रह।
उस्ताद ने बक्से को धीरे से सहलाया। "इसमें हम दिन भर की कमाई रखते थे। मैं, इलाही और भाई। तीन हिस्सों में बाँटने से पहले डिब्बा यहीं रहता था। रोज़ शाम इलाही इसे खोलता था। वो कहता था — भाई, हिसाब पहले, रोटी बाद में। और मैं हँसता था, कहता था — पहले रोटी, फिर हिसाब, वरना हिसाब लिखते-लिखते भूख मर जाएगी।"
उन्होंने आँखें बंद कर लीं।
"आख़िरी रात," वो बोले, "जब हम लड़े थे, उस रात यह बक्सा गायब हो गया था। मैंने सोचा इलाही ले गया। चोरी कर ली। बारह रुपये भी गए, और बक्सा भी। उस रात मैंने उसका नाम तक मिटा दिया था अपने मन से। और वो… वो इसे यहाँ छिपाकर गया था। मेरे ही फ़र्श के नीचे। मेरी ही दुकान में।"
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