The Mysterious Bell – Chapter 1279
“क्या, उस्ताद?” मैंने पूछा।
वो अपनी जगह पर खड़े रहे। आँखें बंद कर लीं। और फिर, बहुत धीरे, बोले।
“पचास साल पहले की बात है। उस रात के बाद, जब इलाही चला गया। एक हफ़्ते बाद, शायद दस दिन बाद। इलाही आया था। रात में। मैंने उसे देखा नहीं, मैंने सुना। दरवाज़े की आवाज़ सुनी। बाहर देखा तो इलाही शिवनारायण के घर की तरफ़ जा रहा था। उसके हाथ में काग़ज़ों का बंडल था। मैंने सोचा — भाग रहा है। काग़ज़ लेकर भाग रहा है। मैंने पीछे से आवाज़ दी — चोर। और वो रुक गया। मुड़ा। मेरी तरफ़ देखा। फिर बोला — भाई, यह काग़ज़ तेरी भी है। तेरी और मेरी। मैं इसे शिवनारायण के पास रख आया हूँ, ताकि कोई एक इसे न बेच सके। ताकि अस्पताल बचा रहे और पाठशाला भी।”
“और आपने क्या कहा?” मैंने पूछा।
“मैंने कहा — मुझे कुछ नहीं चाहिए। जो तूने लिया, तेरा। मुझे अपना हिस्सा नहीं चाहिए।”
“और काग़ज़?”
“वो उसके हाथ में ही रहा। वो चला गया।” उस्ताद ने आँखें खोलीं। “पचास साल मैंने सोचा वो काग़ज़ उसने बेच दिया। और मैंने कभी शिवनारायण से नहीं पूछा। कभी नहीं।”
उस वक़्त मीरा आई।
वो तेज़ चल रही थी, साँस फूली हुई थी, कैमरा कंधे पर लटक रहा था और हाथ में उसकी छोटी कॉपी थी।
“देखो यह,” उसने कहा। सीधे मेरे पास आई। “गुमटी पर बबलू बैठा था। मैंने देखा वही मोटा आदमी उसे भी कुछ दिखा रहा था। मैंने पीछे से कैमरा चलाया — हाथ का उतना ही हिस्सा आया।” उसने काग़ज़ की फोटो कॉपी मेज़ पर रखी। “अंकुश, इस काग़ज़ का कोना देख। कोना कटा हुआ है। और कटा हुआ कोना मिलता है — सफ़ेद फाइल पर चिपके काग़ज़ के कोने से। वही फाइल, जो चंद्रेश की गाड़ी की पिछली सीट पर पड़ी थी। वही फाइल जिसे तूने ‘अलमारी' कहा था।”
मैंने फोटो देखी।
“यह है न वो का काग़ज़?” मीरा ने पूछा।
“हाँ।”
“तो यह अलग काग़ज़ नहीं है। यह उसी काग़ज़ का दूसरा हिस्सा है। जो चंद्रेश के पास है, वो एक हिस्सा है। जो यह आदमी दिखा रहा है, वो दूसरा। और जिसका कोना कटा है, वो तीसरा। कौन जोड़ेगा इन्हें? हम?”
उस्ताद ने धीरे से कहा, “तीन ताले। तीन नाम। तीन हिस्से। और एक ज़मीन।”
“और हम आज नगर निगम जा रहे हैं,” मैंने कहा।
“पर वहाँ क्या मिलेगा?” फ़ैज़ ने पूछा। उसकी आवाज़ अब उतनी तेज़ नहीं थी। उसमें डर आ गया था। “अगर काग़ज़ दफ़्तर में है और वो भारद्वाज के पास है, तो हम क्या करेंगे? हमारे पास कोई वकील नहीं, कोई पैसा नहीं। दादा बिस्तर पर हैं। मैं तेरह साल का हूँ। मैं क्या कर सकता हूँ?”
मैंने उसकी तरफ़ देखा। छोटा लड़का। पतला। जिसके दादा ने पचास साल अपनी चुप्पी में काट दिए और अब वो चुप्पी उसके पोते के कंधों पर आ गई थी।
मैंने उसके कंधे पर हाथ रखा।
“फ़ैज़, तू यह सुन। नोटिस आने से पहले हम अपना सच जोड़ लेंगे।”
“कैसे?”
“पता नहीं। पर जोड़ लेंगे।”
“यह कोई जवाब नहीं है।”
“नहीं है,” मैंने कहा। “पर जवाब भी तो किसी के पास नहीं है। हम सब ऐसे ही चल रहे हैं। मेरे पास भी कोई जवाब नहीं। मेरे पापा ने पाईस साल पहले एक अंगूठा लगाया, और आज तक वो उस अंगूठे को छुपाकर जी रहे हैं। मेरी माँ ने वही अंगूठा देखा और चुप रही। उस्ताद ने पचास साल एक ताला बंद करके रखा। कोई भी साफ़ नहीं है। पर हम सब एक चीज़ में साफ़ हैं — हम सब चुप्पी से थक गए हैं।”
फ़ैज़ ने मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखें भरी हुई थीं, पर वो रोया नहीं।
“ठीक है,” उसने कहा।
मोटा आदमी अब भी खड़ा था। उसने अपना लिफ़ाफ़ा उठाया, टेबल पर वही कोना-वाला काग़ज़ रखा, और कहा, “यह सिर्फ़ जानकारी थी। नोटिस सात दिन में आएगा। तब तक कुछ नहीं होगा। पर अंकुश यादव, अभी भी वक़्त है। एक अंगूठा। बस एक। सब साफ़ हो जाएगा।”
वो मुड़ा। जाने लगा। दरवाज़े पर रुका। बिना मुड़े बोला, “और हाँ — उस्ताद की दुकान के नीचे जो कुछ है, उसे कोई नहीं खोदेगा। वो भारद्वाज कंस्ट्रक्शन की ज़मीन है अब।”
वो चला गया। कदम धीरे-धीरे दूर हुए। गली के मोड़ पर मुड़कर ग़ायब हो गया।
मैंने काग़ज़ उठाया। उसे उलटा किया। पीछे कुछ नहीं लिखा था। सिर्फ़ वही कोना कटा था, और कटे कोने के किनारे पर एक हल्की पीली लकीर थी — जैसे किसी ने शासक रखकर काटा हो।
तभी दरवाज़े पर बबलू आया।
वो आज अलग लग रहा था। सफ़ेद कमीज़, कोई सोने की चेन नहीं, पानदान नहीं। हाथ में एक छोटी काग़ज़ की थैली थी, जिसे वो मसल रहा था। उसका चेहरा पसीने से भीगा था।
“अंकुश,” उसने कहा। आवाज़ धीमी थी। “मैं कुछ बताने आया हूँ। और आज मुझे न डाँट।”
“बोल, बबलू।”
“साहब की गाड़ी में,” उसने कहा, और उसका गला सूख गया। “उसी काग़ज़ की दूसरी कॉपी रखी है। वही — जो अभी वो आदमी दिखा गया। मैंने कल रात देखी। सफ़ेद फाइल के नीचे, पीली कॉपी में। और उस पर साहब का हाथ है।”
“तूने पहले क्यों नहीं बताया?”
“क्योंकि मैं डरता हूँ, अंकुश। मैं बारह साल से डरता हूँ।” उसने थैली मेज़ पर रख दी। “पर आज सुबह मेरी बीवी ने कहा — तू डरता है, तो बच्चे भी डरेंगे। मैं नहीं चाहता मेरा बेटा मेरी तरह डरे।”
मैं कुछ देर उसे देखता रहा।
“बबलू, तू एक चीज़ और बता। साहब ने उस कॉपी को कभी निकाला? किसी को दिखाया?”
उसने सिर हिलाया, न में।
“पर वो पढ़ी हुई है। मैंने उसे एक बार देखा — कुछ पन्नों के कोने मुड़े हुए थे।”
उस्ताद ने कहा, “तो उसे पता है कि काग़ज़ क्या कहता है। और उसे पता है कि हमें अभी नहीं पता। यही उसकी ताक़त है।”
“और यही हमारी ताक़त हो सकती है,” मैंने कहा। सबने मेरी तरफ़ देखा। “वो सोच रहा है कि हम कुछ नहीं जानते। अगर हम उसके सामने खड़े होकर कहें कि हम जानते हैं — तो उसका पूरा हिसाब गड़बड़ा जाएगा।”
मीरा ने कहा, “तो हमें पहले जानना पड़ेगा। पूरा। आधा-अधूरा जानकर खड़े हुए, तो वो हमें वैसे ही काट देगा जैसे उसने उस काग़ज़ का कोना काटा है।”
“तो जानेंगे,” उस्ताद ने कहा।
सबने उनकी तरफ़ देखा। वो अब भी वहीं खड़े थे, हाथ मेज़ पर टिकाए।
“आज,” उन्होंने कहा। “आज शाम को, दुकान बंद होने के बाद। मेरी दुकान का फ़र्श खोदा जाएगा।”
“उस्ताद,” मैंने कहा, “वो आदमी कह गया है — मत खोदना।”
“वो कह गया है क्योंकि उसे डर है।” उस्ताद ने मेरी तरफ़ देखा। “अंकुश, पचास साल मैंने उस दुकान की ज़मीन पर पैर रखा, और एक बार भी नहीं सोचा कि उसके नीचे क्या है। आज सोचूँगा।”
फ़ैज़ ने कहा, “मैं भी रहूँगा।”
“तू घर जा,” उस्ताद ने कहा। “तेरे दादा के पास।”
“नहीं,” फ़ैज़ ने कहा। “दादा ने पचास साल अकेले काटे। मैं तेरह साल का हूँ, पर मैं पचास साल अकेले नहीं काटूँगा। मैं यहीं रहूँगा।”
उस्ताद ने उसकी तरफ़ देखा। कुछ देर। फिर उन्होंने सिर हिलाया और कुछ नहीं कहा।
दिन भर मैंने अपने आप को काम में डुबोया। एक ग्राहक आया — साइकिल का पिछला पहिया लेकर। मैंने उसकी तीलियाँ सीधी कीं, बॉल बियरिंग बदली, और जब वो पैसे देने लगा, मैंने कहा — नहीं।
“क्यों?”
“क्योंकि आज मेरे पास एक और हिसाब चल रहा है,” मैंने कहा। “छोटा-सा।”
वो हँसकर चला गया। पर मुझे लगा उसकी हँसी में कुछ था — जैसे उसे पता है कि मेरी दुकान कल नहीं होगी।
दोपहर में माँ का फोन आया। काजल ने कहा, माँ ने आज बुखार में फिर वही कहा — “मत खोल।” और फिर कुछ और कहा जो काजल ने साफ़ नहीं सुना। सिर्फ़ इतना — “अंकुश को बोल, वो कुआँ नहीं है।”
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