The Mysterious Bell – Chapter 1277
मेरे हाथ में हत्था आया। पीतल। मोटा। भारी था, पर अजीब तरह का भारी। जैसे इसमें कुछ और भी रखा हो। मैंने उसे घंटी के पास रखा। और घंटी ने फिर टन-टन किया।
“उस्ताद,” मैंने कहा, “एक बात साफ़ हो गई।”
“क्या?”
“हिस्से मिलाना काफ़ी नहीं है। आप और इलाही — दोनों को बैठना पड़ेगा। आमने-सामने। और एक-दूसरे को वो बात बतानी पड़ेगी जो पचास साल से दबी है। हत्था घंटी से जुड़ जाएगा, पर आवाज़ तब आएगी जब आप दोनों के बीच की बात जुड़ेगी।”
उस्ताद ने कुछ नहीं कहा। पर फ़ैज़ ने कहा, “उस्ताद जी, दादा ने कहा है — जिस दिन भाई खुद कहे कि यह चाबी तेरी है, उस दिन वो काम आएगी। वो अपनी चाबी आपको देंगे। पर पहले आपको कहना पड़ेगा।”
“क्या कहना पड़ेगा?”
“कि वो चोर नहीं था।”
उस्ताद ने मुँह खोला, पर आवाज़ नहीं निकली।
मैंने बीच में कहा, “उस्ताद, आज नहीं। आज रात नहीं। कल सुबह नगर निगम। वहाँ से लौटकर। जब आपने उस चीज़ को देख लिया जो पचास साल से इलाही के लिए रखी है। फिर जो आपको ठीक लगे।”
उन्होंने सिर हिलाया। धीरे से। जैसे बच्चा मान जाता है।
तभी मेरी जेब में याद का ताला हिला। बहुत हल्का। जैसे कोई दरवाज़े की कुंडी छू रहा हो। मैंने हाथ जेब में डाला। ताला गरम था। सुबह तक बर्फ़ जैसा ठंडा था, आधी शाम में एक बार हल्का गरम हुआ, और अब फिर।
“क्या हुआ?” मीरा ने पूछा।
“ताला,” मैंने कहा। “गरम है।”
“इसका मतलब?”
“मतलब यह कि कहीं कोई रिश्ता जुड़ने वाला है। या टूटने वाला है।”
टिंकू ने कहा, “उस्ताद, अगर दोनों एक ही चीज़ है, तो फ़र्क़ कैसे पता चलेगा?”
मैंने उसकी तरफ़ देखा। सच में, तेरह साल का लड़का जब सवाल पूछता है, तो बड़े चुप हो जाते हैं। मैंने कहा, “अच्छा सवाल है। फ़र्क़ यह है कि जोड़ में ताला ठंडा होता है, टूटन में गरम। जोड़ में गरमाहट आराम की होती है, जैसे चाय का कप हाथ में आ जाए। टूटन में वो जलन की होती है, जैसे गरम तवे पर उँगली रख दी हो।”
टिंकू ने घंटी की तरफ़ देखा। “और यह अभी कौन सा है?”
मैंने ताला मुट्ठी में लिया। “यह… यह दोनों के बीच है। जैसे किसी ने हाथ बढ़ाया हो, पर छुआ न हो।”
मीरा ने कहा, “मतलब कुछ होने वाला है।”
“मतलब कुछ हो रहा है,” मैंने कहा। “अभी। इस वक़्त।”
हम सब चुप हो गए। बाहर से शबनम आपा की आवाज़ आई — “अंकुश! गुमटी की तरफ़ से सफ़ेद गाड़ी गुज़री है। धीरे। रुकी नहीं। पर गुज़री ज़रूर है।”
मैंने दरवाज़े की तरफ़ देखा। शबनम आपा दरवाज़े पर खड़ी थीं, कंधे पर मोटा शॉल, हाथ में चिमटी। चिमटी आज भी हाथ में थी। जैसे वो उसके बिना बाहर नहीं निकलतीं।
“कितनी देर पहले?” मैंने पूछा।
“दो मिनट। शायद तीन।”
मैंने मीरा की तरफ़ देखा। उसने तुरंत कैमरा उठाया। “मैं देखती हूँ। पीछे की गली से गई होगी।”
“अकेले मत जाना,” मैंने कहा।
“मैं अकेली नहीं जा रही,” उसने कहा। “टिंकू साथ है।”
टिंकू ने तुरंत कहा, “मैं तैयार हूँ।”
“नहीं,” मैंने कहा। “टिंकू यहीं रहेगा।”
“क्यों?”
“क्योंकि तू मेरी आँख है, टिंकू,” मैंने कहा। “अगर तू बाहर चला गया, तो मुझे अंदर कुछ दिखेगा नहीं। और आज रात अंदर बहुत कुछ देखना है।”
टिंकू ने पहले नाराज़गी से देखा, फिर समझ गया। उसने सिर हिलाया। “ठीक है, उस्ताद।”
मीरा बाहर निकल गई। शबनम आपा भी उसके साथ चली गईं — “मैं गुमटी की तरफ़ देखती हूँ,” कहकर।
अब कमरे में मैं, उस्ताद, फ़ैज़ और टिंकू थे। और मेज़ पर घंटी और हत्था। दोनों पास-पास।
मैंने घंटी उठाई। बहुत धीरे से। और उससे पूछा, “तूने कहा था — अब मुझे भी भूख लगी है। तेरी भूख क्या है?”
घंटी ने कहा, “मेरा बीच।”
“बीच की आवाज़?”
“हाँ। जो खो गई।”
“वो कहाँ है?”
“जहाँ सबसे ज़्यादा चुप्पी है।”
मैंने सोचा। गली में सबसे ज़्यादा चुप्पी कहाँ है? पापा के कमरे में? माँ के बुखार में? उस्ताद की मशीन में? या उस दुकान के नीचे, जिसके बारे में अभी कोई नहीं बोलता?
“उस्ताद,” मैंने कहा, “आपकी दुकान के नीचे क्या है?”
उन्होंने मेरी तरफ़ देखा। एक पल के लिए उनकी आँखों में कुछ ऐसा आया जो डर नहीं था। कुछ और था। जैसे कोई पुराना ज़ख़्म अचानक छू लिया गया हो।
“क्यों पूछ रहा है?” उन्होंने कहा।
“क्योंकि घंटी ने अभी कहा — मेरी भूख जहाँ सबसे ज़्यादा चुप्पी है। और इस कमरे में सबसे ज़्यादा चुप्पी मेज़ के नीचे है।”
मैंने नीचे देखा। मेज़ के नीचे फ़र्श पर, पुरानी लकड़ी के फटे तख़्तों के बीच, एक छोटी सी जगह थी जहाँ धूल अलग तरह से बैठी थी। जैसे कोई चीज़ वहाँ से हटाई गई हो। या रखी गई हो।
फ़ैज़ ने भी नीचे देखा। उसने कहा, “उस्ताद जी, दादा कहते थे — पाठशाला की दुकान के नीचे एक कोठरी थी। छोटी। जिसमें टूटे ताले रखे जाते थे। और…”
“और?” मैंने पूछा।
“और एक ताला ऐसा था जो कभी नहीं खुलता था। दादा कहते थे — वो ताला ताले का नहीं, आदमी का था।”
मैंने घंटी को और ऊँचा उठाया। हत्थे को उसके पास लाया।
और तभी — बिना किसी वजह के, बिना किसी हवा के — हत्था ठंडा हो गया।
इतना ठंडा कि मेरी उँगलियाँ चिपक गईं। जैसे बर्फ़ का टुकड़ा हाथ में आ गया हो।
“क्या हुआ?” टिंकू ने पूछा। “उस्ताद, आपका चेहरा…”
मैंने हत्था मेज़ पर रख दिया। पर ठंडक हाथ में रह गई।
और घंटी ने कहा — इस बार आवाज़ बहुत साफ़ थी, बहुत धीमी, बहुत ठंडी। जैसे कोई पुराने कुएँ से बोल रहा हो।
“दुकान के नीचे जो छिपा है… वही असली गवाह है।”
मैंने उस्ताद की तरफ़ देखा।
उनका चेहरा सफ़ेद था। उन्होंने मेरी तरफ़ देखा, फिर फ़र्श की तरफ़, फिर मेरी तरफ़। और बहुत धीरे से, इतना धीरे कि मैंने सिर्फ़ होंठ हिलते देखे, उन्होंने कहा, “वो ताला आज तक नहीं खुला।”
“कौन सा ताला?” मैंने पूछा।
“जो मैंने खुद बंद किया था,” उन्होंने कहा। “पचास साल पहले। उस रात। इलाही के जाने के बाद।”
फ़ैज़ ने कहा, “उस्ताद जी, दादा कहते थे — उस ताले में कुछ नहीं है। बस उनकी चुप्पी है।”
और घंटी ने, इस बार बहुत देर बाद, बहुत थकी हुई आवाज़ में कहा, “चुप्पी भी गवाह होती है।”
मैंने कॉपी निकाली। मेज़ पर रखी। पन्ना खोला। और उस वक़्त, उस छोटी सी लौ की रोशनी में, मैंने लिखा।
आज का दिन तीन चीज़ें दे गया। एक — घंटी अधूरी है, पर उसका हत्था मिल गया है। दो — उस्ताद के पास एक ताला है, जो पचास साल से बंद है। तीन — उस ताले के नीचे कुछ है, जो गवाही दे सकता है।
मैंने कलम रोकी। फिर नीचे जोड़ा।
और सबसे ज़रूरी बात — हिस्से मिलाना काफ़ी नहीं है। दिलों की मरम्मत बाकी है।
मैंने कॉपी बंद की।
उस्ताद अब भी उसी कुर्सी पर बैठे थे। फ़ैज़ उनके पैरों के पास बैठ गया था, बिना कुछ कहे। टिंकू दरवाज़े के पास खड़ा था, बाहर की तरफ़ देख रहा था।
मैंने हत्था उठाया। घंटी के साथ, दोनों को जेब में रखा। दोनों अलग-अलग जेबों में नहीं। एक ही जेब में। साथ।
“उस्ताद,” मैंने कहा। “कल सुबह नौ बजे नगर निगम। मैं आपके साथ चलूँगा।”
“तू चलेगा?” उन्होंने पूछा।
“हाँ।”
“क्यों?”
“क्योंकि आप अकेले जाएँगे, तो उस काग़ज़ को देखकर चुप हो जाएँगे,” मैंने कहा। “और आज आपको चुप नहीं होना है। आज आपको बोलना है। पचास साल की बात एक बार में।”
उन्होंने मेरी तरफ़ देखा। और फिर, पहली बार, मुस्कुराए। बहुत हल्का। इतना हल्का कि मुझे शक हुआ कि वो मुस्कान थी या सिर्फ़ होंठ का काँपना।
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