The Mysterious Bell – Chapter 1276
“उस्ताद,” मैंने कहा, “इसे घंटी के पास रखें? मेरा मतलब है, इस घंटी के पास?”
उन्होंने कोई जवाब नहीं दिया। बस हत्था मेज़ पर रख दिया। और मेरी घंटी उससे चार अंगुल दूर पड़ी थी।
जैसे ही फ़ैज़ ने हत्थे को मेज़ पर उसकी तरफ़ सरकाया, घंटी से आवाज़ आई।
टन।
बहुत हल्की। जैसे किसी दूर की पहाड़ी पर कोई घंटी बजी हो और यहाँ तक आवाज़ पहुँची हो।
फिर टन।
फिर टन।
मैंने घंटी उठाई। उसमें कँपकँपी थी, पर आवाज़ नहीं। वो टन-टन सिर्फ़ हत्थे से आ रही थी। जैसे हत्था घंटी को पहचान रहा हो और घंटी हत्थे को, पर दोनों मिल नहीं पा रहे हों। जैसे दो आदमी एक ही दरवाज़े के दोनों तरफ़ खड़े हों और एक-दूसरे की आवाज़ सुन तो रहे हों, पर मुँह न खोल पा रहे हों।
“क्यों नहीं बोल रही पूरी तरह?” मैंने घंटी से पूछा।
घंटी ने कहा, “टुकड़े पास आ गए हैं। दिल नहीं।”
मैंने पूछा, “दिल का मतलब क्या है? यह तो पीतल का हत्था है। इसमें कहाँ दिल?”
घंटी ने कहा, “तू भी तो पीतल का है। तेरे अंदर दिल कहाँ से आया?”
मैं हँस पड़ा। बिना वजह। और फिर मेरी हँसी गले में अटक गई, क्योंकि उस्ताद की आँखों में पानी था।
“उस्ताद,” फ़ैज़ ने कहा। “दादा कहते थे, जब भी हत्था घंटी के पास आए, चार बातें होती हैं। पहली — घंटी बोलती है। दूसरी — हत्था गरम होता है। तीसरी — दोनों के बीच हवा हिलती है। और चौथी — एक आवाज़ कहती है कि बाकी कहाँ है।”
“और चौथी?” मैंने पूछा।
“अभी नहीं आई,” फ़ैज़ ने कहा।
उस्ताद ने अपनी कुर्सी खींची और बैठ गए। मशीन के पास। हाथ मशीन के पहिये पर। जैसे वो पहिया उन्हें सहारा दे रहा हो।
“मुझे वो रात याद है,” उन्होंने कहा। “मैंने उसे चोर कहा। पर सच यह है कि मैंने उसे चोर नहीं कहा था। मैंने उसे गरीब कहा था। और यह ज़्यादा बुरा था। मैंने कहा — तू पैसा उठा क्यों नहीं लेता, तेरे पास है क्या? मैंने कहा — तेरे बच्चे भी तो भूखे रहते हैं। मैंने उसके बच्चे की बात की। उस रात के बाद मैंने उससे कभी बात नहीं की। और अब पता चलता है कि उसने हत्था उखाड़ा था — पर बेचने के लिए नहीं।”
“क्यों उखाड़ा था?” मैंने पूछा।
उस्ताद ने फ़ैज़ की तरफ़ देखा। फ़ैज़ ने कहा, “दादा कहते थे — भाई ने मुझे चोर कहा। मैं घंटी को छोड़कर जा रहा था। पर घंटी को अकेला नहीं छोड़ सका। इसलिए उसका हत्था निकाल लिया। क्योंकि घंटी बिना हत्थे के किसी काम की नहीं रहती। इंसान भी बिना भरोसे के किसी काम का नहीं रहता। मैंने सोचा — भाई को भी यही समझ आएगा। वो घंटी देखेगा, बिना हत्थे के, और मुझे याद करेगा।”
मैंने उस्ताद की तरफ़ देखा।
उन्होंने कहा, “मैंने उसे याद नहीं किया। मैंने उसे नफ़रत से याद किया। पचास साल तक मुझे लगा कि उसने मेरी चीज़ तोड़ी है। और सच यह है कि उसने मेरी चीज़ नहीं तोड़ी थी। उसने मुझे एक सवाल छोड़कर जाना चाहा था, जो आज पचास साल बाद मेरे सामने रखा है।”
उस पल उस्ताद ने मेज़ पर पड़े हत्थे को छुआ। बहुत धीरे। जैसे गरम लोहे को छूते हैं। फिर उन्होंने उसे घंटी के पास रख दिया। इस बार बहुत पास। लगभग छूते हुए।
घंटी फिर टन-टन करने लगी। पर इस बार आवाज़ में कुछ अलग था। पहले जैसी दूर की नहीं, पास की। जैसे कोई दरवाज़े पर खड़ा हो और हाथ उठाकर खटखटाने ही वाला हो।
और तभी मैंने पहली बार सुना — घंटी अपनी आवाज़ में बोली। वो पहले जैसी रूखी आवाज़ नहीं थी। कुछ लरजती हुई, कुछ भीगी हुई।
“दो पीढ़ियाँ पास आ गई हैं।”
मैंने कहा, “तो फिर पूरी आवाज़ क्यों नहीं आ रही?”
“क्योंकि सच्ची बात अभी बाकी है।”
“कौन सी सच्ची बात?”
“उस्ताद की ज़ुबान से। और इलाही के कान से।”
मैंने उस्ताद की तरफ़ देखा। वो मशीन के पहिये पर हाथ रखे, आँखें बंद किए बैठे थे। और मुझे लगा कि पचास साल का आदमी अचानक बूढ़ा हो गया है। नहीं — सच यह था कि वो पचास साल से बूढ़ा था, पर आज पहली बार उसे खुद पर तरस आ रहा था।
दरवाज़े पर हल्की खटपट हुई। मैंने सिर घुमाया। मीरा थी। बाहर खड़ी, कैमरा लटकाए, होंठ सिले हुए। उसके पीछे टिंकू, जो दरवाज़े की चौखट से आधा सिर निकालकर अंदर देख रहा था।
“अंदर आ जाओ,” मैंने कहा।
मीरा ने कदम रखा, पर पहले उस्ताद की तरफ़ देखा। जैसे पूछ रही हो — अंदर आ सकती हूँ? उस्ताद ने आँखें खोलीं और सिर हिलाया।
मीरा ने अंदर आकर मेज़ पर नज़र डाली। हत्था देखा। घंटी देखी। दोनों के बीच की जगह देखी। और बिना कुछ पूछे, बहुत धीरे कहा, “यह उसी घंटी का है।”
“तुम्हें कैसे पता?” मैंने पूछा।
“क्योंकि इस पर वही फूल है जो मशीन के नीचे वाले काग़ज़ पर था। और जो निशान है न…” उसने उँगली बढ़ाई, फिर रोक ली। “यह वही निशान है जो सफ़ेद गाड़ी की पीतल की डिब्बी पर है। मैंने तस्वीर में देखा था।”
कमरा फिर चुप हो गया।
टिंकू ने धीरे से कहा, “तो मतलब… साहब के पास भी इसी घंटी का कोई हिस्सा है?”
मैंने उसकी तरफ़ देखा। तेरह साल का लड़का। जिसकी आँखों में डर था, पर सवाल सही था। मैंने कहा, “हाँ, टिंकू। लगता है। तीन हिस्से हैं। उस्ताद के पास, इलाही के पास, और बीच की आवाज़ — जो खो गई। और उस खोई हुई आवाज़ को किसी ने उठाया होगा। उठाकर कहीं रख दिया होगा।”
“किसने?” टिंकू ने पूछा।
“अगर मैं जानता,” मैंने कहा, “तो इतनी रात तक यहाँ बैठा न होता।”
फ़ैज़ ने तभी कहा, “उस्ताद जी। दादा एक बात और कहते थे।”
उस्ताद ने उसकी तरफ़ देखा।
“वो कहते थे — हत्था घंटी को नहीं बजाता। हत्था हाथ को याद दिलाता है कि घंटी बजानी है। असली आवाज़ हाथ से आती है।”
उस्ताद ने उसकी तरफ़ देखा। फिर मेरी तरफ़। फिर मेज़ पर पड़े हत्थे की तरफ़।
“अगर ऐसा है,” उन्होंने कहा, “तो यह हत्था मुझे नहीं, मेरे हाथ को चाहिए।”
और उन्होंने हत्था उठाया।
उनके हाथ काँप रहे थे। मैंने देखा — उनकी उँगलियों पर पचास साल की सिलाई के निशान थे, सुई की छोटी-छोटी गोलियाँ। और जब उन्होंने हत्थे को अपनी हथेली में रखा, तो वो कँपकँपी कुछ कम हुई।
“इसे रखना कहाँ है?” उन्होंने पूछा।
मैंने कहा, “घंटी के पास। हर वक़्त। रात को भी। मेरा मतलब है, साथ में।”
“क्यों?”
“क्योंकि ये दोनों अलग-अलग रहे हैं न,” मैंने कहा। “पचास साल। जो चीज़ें बहुत लंबे वक़्त तक अलग रहें, उन्हें पास रहने की आदत डलवानी पड़ती है। नहीं तो वो फिर अलग हो जाती हैं। मैंने अपनी दुकान पर एक पहिया जोड़ा था, दो साल बाद फिर टूट गया। क्योंकि मैंने उसे जोड़ा था, पर उसे पास नहीं रखा था। जोड़ना अलग चीज़ है, साथ रहना अलग।”
उस्ताद ने मेरी तरफ़ देखा। और उनकी आँखों में कुछ ऐसा था जो मैंने पहले नहीं देखा था। जैसे किसी बूढ़े आदमी को कोई लड़का ज़िंदगी की बात समझा रहा हो, और वो सुन रहा हो। नाराज़गी से नहीं। भूख से।
“तूने यह बात कहाँ से सीखी?” उन्होंने पूछा।
“आपसे,” मैंने कहा। “आपने एक बार कहा था — पहली सिलाई अच्छी हो जाए, तो कपड़ा टिकता है। टेढ़ी हो जाए, तो भी टाँका लगता रहता है। बस कपड़ा ढीला हो जाता है।”
उस्ताद ने एक लंबी साँस ली। फिर उन्होंने हत्था मेरी तरफ़ बढ़ा दिया।
“तू इसे रख,” उन्होंने कहा।
“मैं?”
“हाँ। घंटी तेरे पास है। हत्था भी तेरे पास रहेगा। जब तक वो लौटकर नहीं आता… तब तक तू इन दोनों को एक जगह रख।”
वेबसाइट पर अपनी पसंदीदा कहानियाँ मुफ्त पढ़ें और Story FM App पर उन्हीं कहानियों का शानदार Audio Experience लें।
यह कहानी Story FM app पर ऑडियो में भी सुनें — आगे के एपिसोड सबसे पहले वहीं आते हैं।
Audio mein suno