The Mysterious Bell – Chapter 1274
“पहले मुझे एक बात साफ़ करनी है,” मैंने कहा। “आपने आज अपने भाई पर शक किया, ये माना। पर अब शक नहीं है। अब सच है। और सच आपके पास है। ये आपका हिसाब है। मैं इसमें दाख़िल नहीं होऊँगा। पर कल जब हम नगर निगम के रजिस्टर खोलेंगे, और जब वो तीसरा नाम सामने आएगा — उस वक़्त आपको यह नहीं कहना है कि मैंने सब खो दिया। उस वक़्त आपको यह कहना है कि मैंने कुछ जोड़ा।”
उस्ताद ने घंटी को देखा।
“तूने मेरी सबसे बड़ी गलती का नाम लिया,” उन्होंने कहा। “पर तूने यह नहीं कहा कि मैं गलती करने वाला बूढ़ा हूँ। तूने यह कहा कि मैं हिसाब करने वाला आदमी हूँ।”
“क्योंकि आप हैं,” मैंने कहा। “जिसने पचास साल एक भूल को घर में रखकर पाला हो, वो हिसाब करना जानता है। वो भूल को दूध-पानी नहीं पिलाता — उसका खाता रखता है।”
उस्ताद ने कुछ कहा नहीं। पर उनका सिर हल्का झुका, जो किसी बूढ़े के हाँ कहने से कम नहीं होता।
फ़ैज़ ने अपना बंडल खोला। तेरह चिट्ठियाँ थीं। उसने सबसे नीचे वाली उठाई — जो ऊपर की नहीं, सबसे पुरानी थी, और जिसका काग़ज़ सबसे ज़्यादा पीला था।
“ये पहली है,” उसने कहा। “दादा ने यही सबसे पहले लिखी थी। और उसमें कुछ नहीं है — सिर्फ़ इतना है कि भाई मुझे चोर न समझे।”
उस्ताद ने वो काग़ज़ अपने हाथ में लिया। इतने हल्के से, जैसे उसमें कोई गिर पड़ेगा।
“मैं इसे आज रात पढ़ूँगा,” उन्होंने कहा। “अकेले।”
“ठीक है,” फ़ैज़ ने कहा।
“और कल सुबह,” उस्ताद ने आगे कहा, “तू मेरे साथ नगर निगम चलेगा। तेरे दादा की चाबी साथ लाना।”
फ़ैज़ ने एक पल को उनकी तरफ़ देखा, फिर धीरे सिर हिलाया।
“लाऊँगा,” उसने कहा। “वो तकिये के नीचे ही है। मैंने उसे कभी हिलाया नहीं।”
“अब हिलाना पड़ेगा,” उस्ताद ने कहा।
और यह वाक्य जैसे हवा में रुक गया।
मैंने पीछे मुड़कर दरवाज़े की तरफ़ देखा। शबनम आपा अब भी बाहर खड़ी थीं। मीरा दुकान के किनारे खड़ी अपना कैमरा सम्भाल रही थी, और उसका चेहरा उस तरह का था जैसे वो कुछ अंदर जाकर पूछना चाहती है, पर पूछ नहीं रही। टिंकू गली के मुँह पर बैठा था और अपनी कॉपी में कुछ लिख रहा था — पता नहीं क्या, पर जब मैंने देखा तो उसने कॉपी बंद कर ली।
मैं बाहर निकला और दुकान के सामने खड़ा हो गया।
आसमान साफ़ था। पीपल की पत्तियाँ हिल रही थीं। कहीं से किसी रेडियो की आवाज़ आ रही थी। सब कुछ सामान्य था। और फिर भी सब कुछ बदल चुका था।
मेरी जेब में घंटी अब भी हल्की गरम थी। और मेरे सामने, मेरे भीतर, एक हिसाब खुल रहा था जो मैंने कभी नहीं सोचा था।
मैंने सोचा — जब घंटी टुकड़ों में बोलती थी, तो मुझे लगता था ये उसकी आदत है। घंटी कभी पूरी बात नहीं कहती। घंटी सवाल पूछकर चुप हो जाती है। मैंने सोचा, ये तंत्र का तरीक़ा है — इंसान से काम करवाना।
पर आज साफ़ हो गया।
घंटी पूरी बात नहीं कह पाती थी, क्योंकि वो खुद पूरी नहीं थी।
जो चीज़ आधी हो, वो पूरा वाक्य कैसे बोले? जो चीज़ बीच से कटी हो, वो अपनी बात कैसे पूरी करे?
और अगर घंटी आधी है, तो वो जोड़ वो कैसे पूरा करेगी जो दो लोगों के बीच में है? तभी तो हर जोड़ के बाद कुछ टूटता है। तभी तो हर मरम्मत के बाद कोई नया टूटा हुआ सामने आ जाता है।
वो गली की बदकिस्मती नहीं थी, अंकुश। वो मेरे तंत्र का अधूरापन था।
और यही वो बात थी जो रणवीर के पास थी। उसका फूट। उसका टूटा साया। मैंने हमेशा सोचा कि फूट, घंटी का उल्टा है। पर शायद फूट उल्टा नहीं है। शायद फूट वही दूसरा आधा है, जो घंटी से कटकर उसकी तरफ़ चला गया। और इसीलिए रणवीर मेरे हर जोड़ से मज़बूत होता है।
मैंने आँखें बंद कर लीं।
यह बात इतनी बड़ी थी कि मुझे इसका डर महसूस हुआ। क्योंकि अगर ऐसा है, तो मैं जितना जोड़ूँगा, उतना ही उसका हिस्सा भी घूमकर उसी तरफ़ जाएगा। जब तक घंटी अधूरी है, ये खेल बराबरी का नहीं हो सकता।
“अंकुश?”
मैंने आँखें खोलीं। टिंकू सामने खड़ा था।
“क्या हुआ?” उसने पूछा। “तुम्हारा चेहरा बदला हुआ है।”
“कुछ नहीं,” मैंने कहा। “बड़ी बात सुन ली, छोटे।”
“कैसी बात?”
मैंने उसकी तरफ़ देखा। वो तेरह साल का है। उसके कंधों पर वो सब नहीं है जो मेरे पर है। पर वो भी उसी गली में रहता है, उसी सच के बीच।
“ये बात कहने के लिए मुझे पहले खुद पूरा होना पड़ेगा,” मैंने कहा।
टिंकू ने मेरी बात को कुछ पल समझने की कोशिश की, फिर कहा, “तो पूरा हो जाओ ना। किसने रोका है?”
मैं हँस पड़ा। सच में हँसा।
“तू कभी मत बदलना, टिंकू,” मैंने कहा।
अंदर से उस्ताद की आवाज़ आई।
“अंकुश।”
मैं अंदर गया। उस्ताद और फ़ैज़ दोनों खड़े थे। उस्ताद ने वो पुराना सफ़ेद कुर्ता, जिस पर नीले धागे से “भाई” सिला था, मोड़कर अपने सीने से लगाया हुआ था। और फ़ैज़ ने अपना बंडल समेटकर दुबारा बाँध दिया था।
“मुझे एक बात सूझी,” उस्ताद ने कहा। “जो ज़मीन तीन हिस्सों में है — एक हिस्सा उसका जो चला गया, दूसरा उसका जो चुप रहा, तीसरा उसका जिसका नाम कोई नहीं लेता।”
“हाँ,” मैंने कहा।
“मैं चुप रहा वाला हूँ,” उन्होंने कहा। “तेरा दादा जगदीश — वो जो हिसाब रखता था — शायद तीसरा है। और जो चला गया…”
उन्होंने फ़ैज़ की तरफ़ देखा।
“मेरा दादा इलाही,” फ़ैज़ ने कहा। आवाज़ धीमी थी, पर साफ़।
उस्ताद ने सिर हिलाया।
“अगर यही सच है,” उन्होंने कहा, “तो कल वो तीन चिट्ठियाँ खोलनी हैं जो तीनों ने अलग-अलग छोड़ी थीं। और उन्हें एक मेज़ पर रखना है।”
फ़ैज़ ने कुछ कहना चाहा, पर रुक गया। फिर बोला, “दादा आज भी उस चाबी को निकालकर देखते हैं। डॉक्टर कहते हैं उनका दिमाग़ कमज़ोर हो रहा है, पर चाबी उन्हें पूरी याद है।”
उस्ताद कुछ देर चुप खड़े रहे। फिर बोले, “मेरे पास भी एक चीज़ है जो मैंने कभी किसी को नहीं दिखाई। तेरे दादा के लिए रखी है। पचास साल से।”
मैंने पूछा, “क्या?”
“आज नहीं,” उन्होंने कहा। “कल। जब नगर निगम से लौटेंगे। मैं उसकी कसम खा चुका हूँ — जिस दिन मेरा भाई मुझे चोर नहीं कहेगा, उस दिन वो चीज़ मैं उसके हाथ में रखूँगा।”
फ़ैज़ की आँखें चमकीं।
“वो कहेगा,” फ़ैज़ ने कहा। “वो ज़रूर कहेगा। बस उन्हें सुनना पड़ेगा। और वो सुनते हैं, उस्ताद जी। एक बात पूछिए — चाबी किसकी है? वो पचास साल से आपका जवाब सुन रहे हैं।”
उस पल उस्ताद के चेहरे पर जो आया, वो मैं बयान नहीं कर सकता। कह सकता हूँ कि वो रोना नहीं था, हँसी नहीं थी। कुछ तीसरा था। जैसे किसी ने पचास साल की धूल हटाकर उनके सामने उनका ही चेहरा रख दिया हो।
मैं बाहर निकला।
धूप ढल रही थी। गली में बच्चे खेलने लगे थे। किसी ने पीपल के नीचे एक लालटेन जला दी थी — शायद शबनम आपा ने, या उस्ताद ने कह दिया होगा। और मैंने सोचा — कल सुबह नौ बजे नगर निगम। फिर शाम की दूसरी चिट्ठी। फिर माँ की दवा। फिर दुकान का नोटिस। फिर वो तीसरा नाम।
सब एक साथ आ रहा है।
मैंने जेब से घंटी निकाली और उसे देखा।
“तू अधूरी है,” मैंने धीरे कहा। “पचास साल से। और मैं सालों से सोचता रहा कि मैं अधूरा हूँ।”
घंटी कुछ नहीं बोली। बस उसकी सतह पर एक हल्की गरमाहट आई और चली गई।
“तेरा दूसरा आधा कहाँ है?” मैंने पूछा। “उसके पास? रणवीर के पास? या उस तीसरे के पास, जिसका नाम कोई नहीं लेता?”
घंटी चुप रही।
पर मेरी जेब में रखा याद का ताला, जो सुबह तक बर्फ जैसा ठंडा था, उस पल एक बार हल्का गरम हुआ। जैसे किसी ने दूर से, किसी पुराने दरवाज़े पर, उँगली रख दी हो।
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