The Mysterious Bell – Chapter 1270
फ़ैज़ ने अपने हाथ जोड़े, और उसने अपना सिर झुका दिया।
और मैंने पहली बार देखा कि उस्ताद अली बक्श ने किसी के सामने झुककर प्रणाम नहीं कराया — उन्होंने अपना हाथ बढ़ाकर फ़ैज़ के कंधे पर रखा।
"तू बैठ," उन्होंने कहा। "अभी और बहुत सुनना है।"
उस पल मुझे लगा कि वो चबूतरी आज कुछ बड़ी हो गई है। जितनी जगह पर मैं पच्चीस साल से बैठता आया हूँ, वो जगह आज कुछ फैल गई है। और उस पर बैठे लोग — उस्ताद, शबनम आपा, पापा, काजल, मीरा, फ़ैज़, चार बच्चे — सबका वज़न अब एक ही तराज़ू पर है। और तराज़ू आज इतना भारी नहीं लगा जितना पहले लगता था।
फिर उस्ताद ने अपना हाथ फ़ैज़ के कंधे से हटाया, चिट्ठी जेब से निकाली, और उसे एक बार फिर खोला। इस बार उन्होंने उसे बीच से पकड़ा, ऊपर उठाया, और एक-एक शब्द साफ़ बोलकर पढ़ा:
"दुकान की ज़मीन जोड़ की ज़मीन है। उसे कभी बेचना नहीं।"
फिर उन्होंने चिट्ठी को मोड़ा, उसे सीने पर रखा, और उठ खड़े हुए।
और उन्होंने वो कहा जो चबूतरी पर बैठे हर आदमी के दिल में एक ही साथ घुसा।
"अगर यह ज़मीन जोड़ की है," उन्होंने कहा, "तो इसका मतलब है कि हम दोनों से ज़्यादा कोई और इसे जानता है। क्योंकि जो बेचता है, वो जानता है कि सब कुछ नहीं बेच रहा — वो एक हिस्सा बेच रहा है जो असल में उसका नहीं है। और उसका मतलब है – इलाही ने यह ज़मीन नहीं बेची। किसी और ने, बिल्कुल किसी और ने, इस ज़मीन पर इलाही और मेरा नाम इस्तेमाल किया है। और अगर उसने किया है — तो वो आदमी आज भी उसी शहर में है, वो आज भी उसी दफ़्तार में है, और वो आज भी हमारी गली पर हँस रहा है।"
उन्होंने अपना हाथ मेरी तरफ़ बढ़ाया।
"अंकुश। कल सुबह नौ बजे हम नगर निगम के रिकॉर्ड कमरे में होंगे। और इस बार सिर्फ़ कुंदनलाल के भरोसे नहीं जाएँगे। इस बार हम यह चिट्ठी लेकर जाएँगे। और तेरे बाबा का अंगूठा — सात अंकों वाला — मैं वहीं, उसी रजिस्टर पर, अपनी आँखों से देखूँगा।"
मैंने उनका हाथ थामा।
"उस्ताद," मैंने कहा, "मैं चलूँगा। और यह बात बाहर नहीं जाएगी।"
"नहीं जाएगी।" उन्होंने कहा। "क्योंकि इस बार खबर फैलाने वाला हम नहीं — हमला करने वाला हम होंगे।"
तभी मेरी जेब में घंटी बजी। एक बार।
फिर उसकी आवाज़ आई, दो आवाज़ों में — जैसे उस्ताद और फ़ैज़, दोनों साथ बोल रहे हों।
"भाई का हिस्सा लौट आया है।"
फिर बहुत धीरे, सिर्फ़ मेरे लिए, तीसरी आवाज़ ने कहा:
"जो नाम बाक़ी है, वो उस चिट्ठी में है जो अभी नहीं पढ़ी गई।"
मैंने फ़ैज़ की तरफ़ देखा।
फ़ैज़ ने अपनी पेटी की तरफ़ देखा।
"उस्ताद साहब," उसने कहा, "दादा ने यह भी कहा था — जिस दिन उस्ताद पहली चिट्ठी पढ़े, उसी दिन दूसरी चिट्ठी का लिफ़ाफ़ा उसके हाथ में रखकर जाना।"
उस्ताद की आँखें एक पल के लिए और खुल गईं।
"मतलब?"
"मतलब," फ़ैज़ ने कहा, और उसने बंडल से दूसरी चिट्ठी निकाली, "कि दादा जानते थे कि पहली चिट्ठी पढ़ने के बाद आप रुकेंगे नहीं।"
उसने दूसरी चिट्ठी उस्ताद की तरफ़ बढ़ा दी।
और उस्ताद ने अपना हाथ उसकी तरफ़ बढ़ाया — पर इस बार उनका हाथ नहीं काँपा।
"नहीं।" उन्होंने कहा, और अपना हाथ नीचे कर लिया।
"उस्ताद?" फ़ैज़ ने कहा, थोड़ा झटका खाकर।
"आज नहीं, बेटा।" उस्ताद ने कहा। "आज पहली चिट्ठी का हिसाब कर ले। कल सुबह रिकॉर्ड कमरे जाएँगे, और शाम को, अगर सब ठीक रहा तो, दूसरी चिट्ठी।" उन्होंने चिट्ठी को सीने पर रखा। "मेरे भाई ने पचास साल एक-एक चिट्ठी लिखी। मैं उसे एक शाम में नहीं खत्म करूँगा।"
फ़ैज़ ने सिर हिलाया।
शबनम आपा ने अपनी थाली उठाई, और उस पर एक कटोरी रखी — चाय से भरी।
"लो," उन्होंने कहा, और उस्ताद को कटोरी दी। "पहली चिट्ठी के बाद की चाय।"
उस्ताद ने कटोरी पकड़ी। उन्होंने पहला घूँट लिया। फिर उन्होंने आँखें बंद कर लीं, और वो घूँट पचास साल पुराना लगा — जैसे इलाही भी साथ में पी रहा हो।
मैंने भी एक कटोरी ली।
चबूतरी पर, पीपल के नीचे, शाम ढल रही थी, और घंटी मेरी जेब में धीरे से गरम हो रही थी।
फिर मेरी नज़र पीपल की डाल पर गई।
वहाँ कोई नहीं था।
पर एक-एक करके, ऊपर से दो पत्ते और गिरे।
दोनों पर वही निशान — दो लकीरें, बीच में बिंदु।
मैंने उन्हें उठाकर फ़ैज़ की तरफ़ बढ़ाया।
"ये भी उसी के हैं," मैंने कहा। "हमें गिनती देनी है।"
फ़ैज़ ने पत्ते उलटकर देखे और धीरे से बोला:
"दो पत्ते, दो भाई।"
"और बाक़ी?" उस्ताद ने कहा, और उनकी आवाज़ में एक नई चीज़ थी — जिसका नाम शायद हिम्मत था।
मैंने ऊपर देखा।
पीपल की सबसे ऊँची डाल, जहाँ उन्नीस-बीस साल से कोई नहीं चढ़ा था, आज भी हिल रही थी — जैसे वहाँ से अभी-अभी कोई उतरकर गया हो।
और उसी डाल पर बैठा एक कौआ फड़फड़ाया, उड़ा, और गली के मुँह की तरफ़ चला गया।
फिर मुझे याद आया कि गली के मुँह पर सफ़ेद गाड़ी खड़ी थी।
और उस्ताद के पीछे, चबूतरी के बाहर, एक पीली रोशनी जल रही थी — जो मेरी जानकारी में वहाँ नहीं होनी चाहिए थी।
मैंने उस्ताद को इशारा किया।
उन्होंने बिना पलटे पूछा:
"अंकुश, कैसी रोशनी?"
"पीली," मैंने कहा। "लालटेन जैसी। पर जाने कहाँ से आ रही है।"
उस्ताद ने एक घूँट और लिया, और उन्होंने आँखें बंद नहीं कीं।
"वो लालटेन नहीं है, बेटा।" उन्होंने धीरे कहा। "वो उस दुकान से आ रही है जो पचास साल से बंद है। पाठशाला की दुकान। और उसमें कोई है। अब जल्दी बंद कर वहाँ।"
मैंने कटोरी रखी।
फ़ैज़ भी उठा।
पापा उठे।
मीरा ने कैमरा उठाया।
और हम सब उस पीली रोशनी की तरफ़ चले — जो हमें उस जगह ले जा रही थी, जहाँ आज से पचास साल पहले इलाही बक्श ने, कथित रूप से, दुकान की ज़मीन बेचने वाला हाथ बढ़ाया था।
और मेरी जेब में, घंटी एक बार फिर बोली — बहुत धीरे, बस मुझसे:
"अब तीसरा भाई आएगा।"
मैंने सोचा, तीसरा?
फिर मुझे तस्वीर याद आई — शिवनारायण यादव, इलाही बक्श, और तीसरा आदमी जिसका चेहरा किसी ने काट दिया था।
और मैं उस पीली रोशनी की तरफ़ और तेज़ चल पड़ा।
क्योंकि अब मुझे यक़ीन हो गया था — तीसरा भाई, जो अब तक पर्दे के पीछे था, वो आज खुद सामने आने की तैयारी में था। और उसकी तैयारी का पहला पुर्ज़ा — पीली रोशनी थी, जो पचास साल बाद जल रही थी।
॥
पीली रोशनी के पास पहुँचते-पहुँचते मैंने देखा कि वो लालटेन नहीं थी। वो एक पुरानी दीया-सी चीज़ थी, जो पाठशाला की दुकान के अंदर, खिड़की के पास रखी थी। और वो दुकान… वो दुकान पचास साल से बंद बताई जाती थी, पर आज उसका शटर आधा उठा हुआ था — इतना कि एक आदमी झुककर अंदर जा सके।
उस्ताद ने मेरा कंधा पकड़ा।
“अंदर मत जाना,” उन्होंने कहा।
“पर उस्ताद,” मैंने धीरे कहा, “लालटेन जल रही है।”
“मुझे दिख रही है,” उन्होंने कहा, और उनकी आवाज़ काँप रही थी — जैसे कोई पुरानी दुकान उनके सामने ज़िंदा हो गई हो।
फ़ैज़ आगे बढ़ा, शटर के नीचे झाँका, और पीछे हटकर बोला:
“अंदर कोई नहीं है। पर ज़मीन पर… ज़मीन पर चूने से कुछ लिखा है।”
मैंने झुककर देखा। शटर के नीचे से, धूल में चूने की सफ़ेद लकीर — दो लकीरें, बीच में बिंदु। वही निशान।
“ये अभी लिखा है,” मीरा ने कहा, उसने अपनी टॉर्च जलाई और उसकी रोशनी उस लिखाई पर डाली। “चूना अभी गीला है। पाँच मिनट भी नहीं हुए होंगे।”
उस्ताद ने आँखें बंद कर लीं।
“बंद करो,” उन्होंने कहा। “शटर नीचे गिराओ।”
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