The Mysterious Bell – Chapter 1271
“पर उस्ताद—”
“अंकुश, शटर गिराओ।” उनकी आवाज़ में जो था, वो शायद डर था — जो पचास साल से साथ था और आज पहली बार बाहर आ रहा था। “वो चाहता है कि हम इस दुकान को खोलकर देखें। हम नहीं खोलेंगे। आज नहीं।”
मैंने शटर पकड़ा। लोहा ठंडा था — हाथ लगाते ही हड्डी तक फैल गया। मैंने ज़ोर लगाया और शटर नीचे आ गया, धड़ाम से।
और जैसे ही शटर गिरा, अंदर की पीली रोशनी बुझ गई — जैसे किसी ने दीया बुझा दिया हो।
“वो बाहर नहीं आया,” मीरा ने धीरे कहा, कैमरा अब भी उस शटर पर टिका हुआ।
“नहीं आएगा,” उस्ताद ने कहा, फिर मुड़े, और उनकी आँखों में जो था, वो पचास साल का बोझ था। “अभी नहीं आएगा। पहले हमें उसका हिसाब पूरा करना है।”
हम लौटे। गली करीब आती गई। फ़ैज़ मेरे बगल में चल रहा था, और उसकी साँसें भारी थीं। वो अभी भी उस्ताद की दुकान के पास जमा करने वालों वाला बंडल सीने से चिपकाए हुए था।
“अंकुश भाई,” उसने कहा, धीमी आवाज़ में।
“हाँ।”
“वो रोशनी…”
“हाँ?”
“उस दुकान में मेरे दादा की आवाज़ थी।” उसने रुककर मेरी तरफ़ देखा। “मैंने सुना। जब शटर गिर रहा था, तब भीतर से… बहुत धीमे, कोई कह रहा था — भाई।”
मैंने उसकी तरफ़ देखा।
“किसे कह रहा था?”
“पता नहीं,” फ़ैज़ ने कहा। “पर बोलने वाला बूढ़ा नहीं लगा।”
मैं कुछ नहीं बोला। और हम चबूतरी की तरफ़ चले।
उस रात मैं घर पहुँचकर माँ का दुपट्टा सीधा किया, काजल को दवा का डिब्बा देकर खुद चारपाई पर बैठा। घंटी मेरी जेब में थी और ठंडी थी। ताले पर एक बार हाथ रखा — वो भी ठंडा था। जैसे दोनों अंदर से कुछ जमा रहे हों, बोलने से पहले।
उस रात सब सो गए। मैं नहीं सोया।
सुबह मैं दुकान पर पहुँचा तो सात बजे थे। उस्ताद की दुकान का शटर पहले से खुला था — जो पिछले कई दिनों से बंद था। उस्ताद अंदर बैठे थे, मशीन ढकी हुई थी, और सामने एक छोटी स्टूल पर फ़ैज़ बैठा था। उसके हाथों में कुछ काग़ज़ थे। और उन काग़ज़ों को पकड़कर, वो बार-बार उन्हें सीधा कर रहा था।
“आ गए?” उस्ताद ने कहा, मुझे देखकर।
मैंने सिर हिलाया। चाय का कटोरा मेज़ पर रखा था — शबनम आपा की गुमटी से आया होगा। मैंने पिया और बैठ गया।
“फ़ैज़?” मैंने कहा।
वो मेरी तरफ़ देखकर, काग़ज़ सामने रखकर बोला:
“दादा की कमर के नीचे अब कोई हरकत नहीं है। डॉक्टर कह रहे हैं कि ऑपरेशन के लिए…अब और देर नहीं हो सकती।”
उस्ताद ने मशीन पर से कपड़ा उठाकर सिलाई की सुई को छुआ। उन्होंने कुछ नहीं कहा।
“और ऑपरेशन का खर्च?” मैंने कहा।
“बारह हज़ार,” फ़ैज़ ने कहा। “पहले पाँच, और बाकी बाद में। पर पहले पाँच भी अभी नहीं हैं।”
मैंने उसकी तरफ़ देखा। उसकी उम्र पच्चीस-छब्बीस के आसपास रही होगी। और उसकीआँखों में वो था जो आमतौर पर पच्चीस की आँखों में नहीं होता — हार।
मैं कुछ कहने को था कि दुकान के बाहर रेत पर पैरों की आवाज़ आई।
मैं मुड़ा।
एक आदमी दुकान के सामने खड़ा था। मोटा शरीर, सफ़ेद कुर्ता, हाथ में मोटा भूरा लिफ़ाफ़ा। उसके पीछे एक दुबला आदमी खड़ा था, जिसने हाथ पीछे बाँधे हुए थे।
“कौन?” मैंने कहा।
“साहब की तरफ़ से आया हूँ,” मोटे आदमी ने कहा, और उसकी आवाज़ नरम थी — इतनी नरम कि सुनने में वो मीठी लगती थी, पर उसमें वो ज़हर था जो मीठे में सबसे ज़्यादा जल्दी चढ़ता है। “थोड़ी देर बैठें?”
“बैठने के लिए नहीं,” मैंने कहा, “कहने के लिए सुनेंगे। कहिए।”
उसने मेरी तरफ़ देखा, फिर मेरा चेहरा पहचाना — बबलू ने उसे तस्वीरों में दिखाया होगा — और होंठों पर एक हल्की सी मुस्कान लाकर वो आगे बढ़ा।
“ये ज़मीन का मामला है,” उसने कहा, और लिफ़ाफ़ा मेज़ पर रख दिया। “इस दुकान की ज़मीन का। इलाही बक्श साहब के नाम से जो ज़मीन है।”
फ़ैज़ के हाथ जम गए।
“दुकान बिकने की बात है?” फ़ैज़ ने कहा, और उसकी आवाज़ में जो था, वो कोई सवाल नहीं था — वो एक तराज़ू था, जिस पर दो पलड़े पड़े थे।
“यही बात लेकर आया हूँ,” मोटे आदमी ने कहा। “साहब की तरफ़ से बहुत अच्छा पेशकश है। आपके दादा के इलाज का पूरा खर्च, ऊपर से दुकान का दाम अलग, और वो भी — गली के दाम से दोगुना। बस एक काग़ज़ पर अंगूठा चाहिए।”
वो लिफ़ाफ़ा खोलने लगा।
मैंने उसकी तरफ़ देखा, फिर फ़ैज़ की तरफ़। फ़ैज़ का चेहरा बदल रहा था — जैसे किसी ने उसकी अंदर की बात को बाहर खींचकर सामने रख दिया हो। उसकी उँगलियाँ काँप रही थीं, और उसके होंठ खुल रहे थे।
“फ़ैज़,” मैंने धीरे कहा। “पहले पूरा सुन लो। पर बोलने से पहले मेरी एक बात सुन लो।”
“क्या?” उसने कहा, उसकी आवाज़ में घबराहट थी।
मैं हँसा।
“दुकान टूटी साइकिल नहीं है, भाई,” मैंने कहा। “टूटी साइकिल कबाड़ में तोल दी जाती है। दुकान को चलाना पड़ता है। गली में सबसे बड़ा फ़र्क़ यही है — कबाड़ का दाम आज मिलता है, दुकान का दाम हर रोज़ मिलता है। और ये दुकान तो अभी शुरू भी नहीं हुई।”
फ़ैज़ ने मेरी तरफ़ देखा। मोटे आदमी ने भी।
“तुम्हें साहब का नाम आता है?” मोटे आदमी ने कहा, और उसकी आवाज़ अब मीठी नहीं थी — वो अब कुछ और थी। “तुम्हें यहाँ किसने बुलाया?”
इससे पहले कि मैं कुछ कहता, गुमटी से आती आवाज़ ने दुकान भर दी।
“मैंने बुलाया!”
शबनम आपा आ रही थीं — हाथ में चाय की पीतल की थाली, जिस पर तीन कटोरे और एक चिमटी। उनका लाल बॉर्डर वाला घिसा रुमाल कंधे पर, और आँखों में वो आग जो गुमटी जलाते वक़्त भी नहीं दिखती।
“ये मेरी गली है,” उन्होंने कहा, थाली उस्ताद की मेज़ पर रखते हुए, “और इस गली में मेरी ज़ुबान रखी जाती है। तुम्हें शर्म आई या नहीं — बूढ़े आदमी की दुकान पर बैठकर उसका दरवाज़ा तोलने? तुम्हारे साहब को मेरी गुमटी का चाय का हिसाब चाहिए? मैं भेज दूँगी, एक-एक पैसा — जो उनके आदमी हर सुबह पीकर जाते हैं।”
मोटे आदमी ने एक कदम पीछे लिया।
“आपा, हम बस प्रस्ताव लाए हैं—”
“प्रस्ताव?” शबनम ने कहा, और उन्होंने चिमटी उठाई। “ये प्रस्ताव है?” उन्होंने लिफ़ाफ़े पर चिमटी रखी, जैसे किसी गंदी चीज़ को छूने से बच रही हों। “इस गली में प्रस्ताव कोई नहीं देता। यहाँ प्रस्ताव का जवाब चूल्हे से आता है। और आज चूल्हा तेरे लिए बंद है।”
मोटे आदमी का चेहरा उतर गया। उसने पीछे खड़े दुबले आदमी की तरफ़ देखा। दुबला आदमी कुछ नहीं बोला।
“सुनो,” मोटे आदमी ने कहा, और उसने अपनी आवाज़ फिर से नरम करने की कोशिश की। “ये बात साहब के काग़ज़ों में पहले से घूम रही है। और साहब…”
“साहब को क्या लगता है?” किसी ने दुकान के दरवाज़े से कहा।
हम सब मुड़े।
बबलू खड़ा था। पर आज वो बबलू नहीं था। आज उसके गले में वो मोटी सोने की चेन नहीं थी। आज उसके हाथ में पानदान नहीं था। आज उसके होंठों पर पान नहीं था। वो सिर्फ़ एक सादी सफ़ेद कमीज़ में खड़ा था — और यही उसका सबसे बड़ा बयान था।
“बबलू भाई?” मोटे आदमी ने कहा, और उसकी आवाज़ में जो नरमी थी, वो अब गिरने लगी थी।
“मैं तेरा भाई नहीं हूँ,” बबलू ने कहा। उसने दुकान में कदम रखा, फिर उस्ताद की तरफ़ देखकर सिर झुकाया, फिर मेरी तरफ़। “मैं सिर्फ़ इतना कहने आया हूँ — साहब के काग़ज़ों में ये दुकान सिर्फ़ एक नंबर है। सातवाँ। और उस सातवें नंबर के आगे पहले से लिखा है — बेचने योग्य।”
फ़ैज़ का चेहरा सफ़ेद पड़ गया।
“कब से लिखा है?” मैंने पूछा।
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