The Mysterious Bell – Chapter 1269
उस्ताद रुके।
उन्होंने चिट्ठी को मोड़ना शुरू किया — एक, दो, तीन बार मोड़ा। फिर उसे जेब में नहीं रखा, बल्कि अपने सीने पर, कमीज़ के अंदर, कलेजे की तरफ़ रख लिया।
और फिर उन्होंने वो बात कही जिसने चबूतरी के हर आदमी को एक साथ चुप करवा दिया।
"अगर ज़मीन जोड़ की है," उन्होंने कहा, आवाज़ में फिर वो सख़्ती लौट आई जो सुई में होती है — तेज़, पतली, साफ़, "तो उसे बेचने वाला कोई और है। इलाही नहीं।"
पीपल की डाल पर बैठा एक कबूतर उड़ गया। हवा ने पत्तों को हिलाया। और कुछ पल के लिए लगा कि चबूतरी पर बैठे लोग भी साथ में हिल गए।
फ़ैज़ ने पहले तो कुछ नहीं कहा। फिर उसने अपनी आवाज़ में जैसे जान डाली।
"मतलब?"
"मतलब यह," उस्ताद ने कहा और उन्होंने काग़ज़ को सीने पर ही रहने दिया, हाथ उस पर रखा, "कि जो ज़मीन कभी बिकनी नहीं थी, वो बिक चुकी है। किसी ने बेच दी। और वो किसी ने हमारे में से नहीं — क्योंकि इलाही ने तो कह लिया कि नहीं बेची। मैंने भी नहीं बेची, कम से कम जानते हुए नहीं। मेरा काग़ज़ — दुकान का काग़ज़ — यही कमरा, यही आँगन — सब मेरे हाथ से निकल गया था। पचास साल में किसी ने वो काग़ज़ उठाया, नाम बदला, मोहरें लगाईं। और मैं यह सोचता रहा कि भाई मेरा दुश्मन है। भाई मेरा दुश्मन नहीं था, अंकुश।"
उन्होंने मेरी तरफ़ देखा। आँखें लाल थीं, पर साफ़।
"भाई मेरा दुश्मन नहीं था। मगर जिसने उसका नाम लिया, वो भाई भी नहीं था। वो हमारे बीच की चुप्पी में बैठकर हमारी ज़मीन खा गया। वो चुप्पी उसकी सबसे बड़ी मदद थी। हमने अलग-अलग शहरों में रहकर पचास साल उसकी सेवा की। पचास साल, अंकुश।"
मैंने कुछ नहीं कहा।
क्योंकि यही बात मुझे सबसे ज़्यादा डरा रही थी — कि वो जो गली को अंदर से खोखला कर रहा था, वो कभी एक दरवाज़े पर खड़ा नहीं हुआ। वो हमारी चुप्पी में बैठा था। हमारी "जाने दो भाई" में बैठा था। हमारी "अब क्या फ़र्क़ पड़ता है" में बैठा था। हमारी "बड़ों की बात है, बच्चों को क्या बताएँ" में बैठा था।
शबनम आपा ने पहले कुछ नहीं कहा। फिर उन्होंने अपनी थाली उठाई और ज़मीन पर पटक दी — पीतल की थाली, जिसका शोर चबूतरी से नीचे गली तक गया।
"तो अब चुप कौन रहेगा?" उन्होंने कहा। "पचास साल हो गए इस चुप्पी के। अब बोलने का वक़्त है।"
"कैसे?" फ़ैज़ ने कहा, और उसकी आवाज़ में पच्चीस साल की हिम्मत और पच्चीस साल का डर दोनों थे। "उस्ताद साहब, मेरे दादा पचास साल दूर रहे — कोई काग़ज़ नहीं, कोई दस्तख़त नहीं, कोई गवाह नहीं। बस यह चिट्ठी है, और यह पहिया।"
"गवाह हैं।" उस्ताद ने कहा। "और बहुत हैं।" उन्होंने चिट्ठी अपने सीने से निकाली, उसे सामने रखा — चबूतरी पर सबके बीच। "यह चिट्ठी कहती है ज़मीन दोनों की है। मंसूर के काग़ज़ पर वही निशान है। तेरे दादा का टूटा पहिया मेरे पास आएगा, और वो कहेगा कि मशीन, जिस पर यह पहिया लगा था, मेरे हाथ से गई थी। अब सिर्फ़ एक चीज़ चाहिए — उस ज़मीन का पुराना काग़ज़। जिस पर मेरा नाम और तेरे दादा का नाम दोनों हों।"
"और वो कहाँ होगा?" मैंने पूछा।
उस्ताद ने मेरी तरफ़ देखा।
"उस जगह," उन्होंने कहा, "जहाँ से सब चीज़ें चोरी होती हैं। नगर निगम के रिकॉर्ड में। कुंदनलाल के हाथ में।"
मीरा ने कुछ लिखना शुरू किया। काजल ने मेरी कलाई छोड़ी और अपने हाथ सामने लाकर आंचल से पोंछे।
पापा ने पहली बार उस बैठक में अपनी आवाज़ निकाली।
"उस्ताद," उन्होंने कहा, "अगर ज़मीन दोनों की थी — मतलब आधी तेरी, आधी इलाही की — तो मेरे बाबा का काग़ज़? जगदीश यादव का काग़ज़? वो उस ज़मीन में क्यों है?"
उस्ताद कुछ देर चुप रहे।
"क्योंकि सात नाम हैं," उन्होंने धीरे कहा। "सात अंगूठे हैं। और उन सात में एक नाम जगदीश यादव का है।"
"मतलब?" पापा ने कहा।
"मतलब यह कि मेरी और इलाही की दुकान की ज़मीन को कोई चुरा नहीं सकता, अगर उस पर बाबा के रसीद का इंतज़ाम हो। और उस काग़ज़ में बाबा का नाम था — सात में से एक। इसलिए जो ज़मीन बेची गई, वो मेरी दुकान की नहीं थी। वो पूरी की पूरी थी। दुकान, आँगन, गुमटी, अस्पताल, स्कूल — सब मिलाकर। सात हिस्सों में बँटी हुई ज़मीन। और उसका कोई एक मालिक नहीं था। सबका एक-एक हिस्सा था।"
मैंने अपनी साँस रोक ली।
क्योंकि मुझे तब वो बात समझ आई जो टिंकू ने एक बार कही थी — यह गली किसी की नहीं है, यह गली सबकी है। मैंने उसे मज़ाक समझा था। मगर वो सच था, काग़ज़ पर। सच था, अंगूठों पर। सच था, उन पीले पन्नों पर जो धूल खाते रहे।
"तो फिर वो ज़मीन कैसे बिकी?" मैंने पूछा।
"सात अंगूठों से," उस्ताद ने कहा। "अगर सात के सात सही हों, तो काग़ज़ बोलता है। और अगर एक भी झूठा हो, तो काग़ज़ चुप हो जाता है।"
"और अगर सभी… सात के सात सही हों?" मीरा ने कहा।
उस्ताद ने उसकी तरफ़ देखा, और उनकी आँखों में फिर वही इस्पात लौटा।
"तो काग़ज़ बोलता है," उन्होंने कहा, "और यह बात किसी को अच्छी नहीं लगेगी। वो जो सात अंगूठे लेकर ज़मीन बेचता है, वो एक धागा भी नहीं छोड़ना चाहता जो उसे जोड़ता हो। वो चाहता है सात अंगूठों के नीचे सिर्फ़ एक अंगूठा दिखे — उसका। और इसीलिए उसने मेरी और इलाही की चुप्पी में सेंध लगाई।"
मैंने पीपल की तरफ़ देखा। ऊपर कोई नहीं था, बस पत्तों की छाया हिल रही थी।
"उस्ताद," मैंने कहा, "आप कह रहे थे कि इलाही खुद आएगा। और घंटी वही बोली। अब कह रहे हैं कि बेचने वाला कोई और है। तो कौन?"
उस्ताद ने चिट्ठी को फिर सीने से लगाया।
"अगर पहली चिट्ठी में इतना कुछ है," उन्होंने कहा, "तो बाक़ी ग्यारह में कम से कम एक नाम तो होगा। इलाही ने कहा है कि उसे खुद लौटना है। मतलब वो फ़ैज़ को … फ़ैज़ को वो नाम लिखवाने से रोक रहा है? नहीं। फ़ैज़ को वो गली में अकेले भेज रहा है, यह जानते हुए कि जो नाम इन लिफ़ाफ़ों में हैं, वो उसकी जान को खतरे में डाल सकते हैं। इसलिए वो नहीं चाहता कि फ़ैज़ एक बार में सब पढ़े। उसे खुद इस चबूतरी पर आना है। वो जानता है — जो लिखा हुआ है, वो सिर्फ़ मेरे सामने बोला जाएगा।"
फ़ैज़ ने गर्दन झुकाई।
"उस्ताद साहब," उसने कहा, "दादा ने और भी कुछ कहा था। कहा था — पहले दिन उस्ताद को बस चिट्ठी देना। और अगर उस्ताद पूछे कि मैं कैसा हूँ, तो कहना कि मैं अपनी मशीन पर बैठा हूँ।"
उस्ताद कुछ देर स्थिर बैठे रहे।
फिर उन्होंने अपना हाथ घुटने पर रखा, उँगली ऊपर उठाई — जैसे किसी को तराज़ू पर तोल रहे हों।
"अपनी मशीन पर बैठा हूँ," उन्होंने धीरे दोहराया। "वो मशीन जो उसने बेच दी थी।"
उन्होंने आँखें बंद कीं।
"फ़ैज़।"
"हाँ उस्ताद साहब।"
"कल सुबह, नौ बजे, अपनी साइकिल के हैंडल पर जो चीज़ लटकी है, उसे लेकर चबूतरी पर आना। और फिर —" उन्होंने चारों तरफ़ देखा, "— और फिर मेरी दुकान के पीछे वाले कमरे में आना। मेरे पास तेरे दादा का टूटा पहिया है, तेरे पास उसका कुछ और है। दोनों को साथ रखेंगे। और फिर हम दोनों बैठकर उस पहिये को मशीन पर चढ़ाएँगे।"
"मशीन?" फ़ैज़ ने कहा, और उसकी आवाज़ काँप गई। "पर मशीन… वो तो…"
"मशीन है।" उस्ताद ने कहा, और उनकी आवाज़ में कुछ ऐसा था जो सुई के टाँके जैसा था — सीधा, टेढ़ा नहीं, टूटा नहीं। "मशीन है। चलेगी। पचास साल बाद। तेरे दादा के हाथ की सुई से।"
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