The Mysterious Bell – Chapter 1268
"तो यह यहाँ कैसे?"
"कोई लाया है।" उन्होंने कहा। "और वो चाहता है कि मैं इसे ऐसे ही देखूँ, जैसे कोई पुराना हिसाब खुद मेरे हाथ में आ गया हो।"
फ़ैज़ ने तब कपड़े का बंडल खोला।
"अंकुश भैया," उसने कहा, "दादा ने कहा था — पहली रख, फिर आगे। पहली सबसे ऊपर है। और वो पहली मैंने पढ़ी नहीं। मैंने सिर्फ़ लिफ़ाफ़े के बाहर का नाम देखा था, और वो नाम मेरे दादा ने मेरे हाथ से लिखवाया था, बोलकर। कहा था — बेटा, जैसा मैं बोलूँ, वैसा लिख। और मैंने लिखा। और फिर मैं उसे एक बार भी नहीं पढ़ सका।"
उसने पहली चिट्ठी उस्ताद की तरफ़ बढ़ा दी।
"उस्ताद साहब, अब आप। मैं नहीं पढ़ सकता।"
उस्ताद ने चिट्ठी ली। उन्होंने पहले उसे दोनों हाथों से पकड़ा — जैसे कोई भारी चीज़ उठा रहे हों। फिर उन्होंने चश्मा निकाला, कान पर टेप को ठीक किया, और काग़ज़ पास की।
उनका हाथ काँप रहा था।
उन्होंने पढ़ना शुरू किया। आवाज़ उनकी थी, पर कुछ दूसरी थी — जैसे कोई पुराना आदमी बोल रहा हो।
"भाई,
तूने मुझे चोर नहीं कहा। तूने कभी चोर नहीं कहा। मैं खुद ही चोर के रास्ते से भाग गया, हालाँकि मेरे पास कुछ नहीं था। तेरे मुँह से वो शब्द निकला था — बस एक बार, रात को, आग के बाद, जब डिब्बा खाली था और सब हमें देख रहे थे। पर मैंने तेरे उस एक शब्द को सौ बार अपने कान में बजाया। और मैं यह नहीं कहूँगा कि तूने कहा था। मैं यह कहूँगा कि मैंने सुना था। फ़र्क़ जानता हूँ?"
उस्ताद रुके।
मैंने देखा उनके हाथ, जो अब तक काँप रहे थे, एकदम स्थिर हो गए। जैसे पचास साल का कंपन एक पल में मर गया।
उन्होंने आगे पढ़ा।
"बारह रुपये, हाँ, बारह रुपये गए। पर मैंने गिने नहीं थे, बेचने के लिए नहीं उठाए थे। तेरे चार बच्चे थे, उस्ताद। मेरे कोई नहीं था, तब। मैंने सोचा कि यह डिब्बा रोज़ भरता है, रोज़ खाली होता है, तो आज मैं इसमें से निकालकर उन बच्चों को किताब दिला दूँ, जो तेरी दुकान के पीछे बैठकर उँगली से रेत पर अक्षर लिखते हैं। मैंने सोचा कि तू खुश होगा। पर फिर मेरी हिम्मत जवाब दे गई। मुझे लगा, अगर मैंने कहा कि भाई मैं डिब्बे से पैसा लेना चाहता हूँ, तो तू क्या सोचेगा। इसलिए मैंने चुप रहना चुना। और चुप्पी सबसे बड़ी चोरी होती है, भाई। वो आदमी की नहीं, रिश्ते की चोरी होती है।"
मैंने उस्ताद की तरफ़ देखा।
उनकी आँखों में पानी नहीं था। अभी नहीं। पर उनकी आवाज़ का वो लोहा जो दुकान की सिलाई में था, वो अब नहीं था। वो पिघल गया था।
"मैं कायर था, भाई।" उन्होंने पढ़ा, और उनका गला हल्का टूटा। "बस यही। कोई कर्ज़ नहीं, कोई साज़िश नहीं, कोई ज़मीन नहीं। मैं कायर था। और वो कायरता मैंने अपने साथ ले जाकर पचास साल किसी और शहर में पाली। तूने मुझे कभी चोर नहीं कहा। मैंने खुद को हर दिन कहा।"
उस्ताद ने चिट्ठी को सीने से लगा लिया।
वो बैठ गए — चबूतरी पर, वैसे ही, जैसे रात हो गई हो। चिट्ठी उनके सीने से चिपकी थी। उनकी आँखें बंद थीं और होंठ हिल रहे थे, पर कुछ सुनाई नहीं दे रहा था।
शबनम आपा ने अपनी साड़ी का पल्लू सीधा किया, कुछ नहीं कहा।
मीरा ने अपना कैमरा उतार दिया — बंद कर दिया, नीचे रख दिया, जैसे उसने ठान लिया हो कि यह पल किसी की नहीं, बस उनकी है।
पापा ने मुँह फेर लिया। मैं जानता हूँ पापा क्यों मुँह फेरते हैं — क्योंकि वो भी कुछ ऐसा ही अपने अंदर पचास साल से ढो रहे थे, और ऐसे पल में आदमी को लगता है कि उसका अपना सीना भी किसी और की चिट्ठी से भारी हो गया है।
काजल ने मेरी कलाई पकड़ ली — ज़ोर से। जैसे उसे भी अंदर ही अंदर कुछ पकड़ना था।
और मैं चुपचाप बैठा रहा।
यही सबसे अच्छा था जो मैं उस वक़्त कर सकता था।
कुछ माफ़ियाँ देर से आती हैं। पर आती ज़रूर हैं। पचास साल देर से, दो रुपये कम, एक चिट्ठी ज़्यादा — पर आती हैं। और जब आती हैं, तो हिसाब का ढेर नहीं लगता, सिर्फ़ एक चिट्ठी काफ़ी होती है।
फिर उस्ताद ने आँखें खोलीं।
उन्होंने चिट्ठी को झोल से निकाला, सीधा किया, और उसे दोनों हाथों से ऊपर उठाया — जैसे चबूतरी पर बैठे सबको दिखा रहे हों।
"सुना?" उन्होंने कहा। आवाज़ नीची थी पर साफ़ थी। "सुना, तुम सबने? बारह रुपये। बारह रुपये, और मैंने पचास साल उसे चोर समझकर बैठा रहा। मैंने उसकी दुकान बंद करवाई। मैंने उसकी माँ के घर से उसका नाम मिटाया। और वो सिर्फ़ इसलिए भागा क्योंकि मैंने एक रात, आग के बाद, उसका हाथ झटक दिया था।"
उन्होंने चिट्ठी को फिर सीने से लगाया।
"इलाही बक्श," उन्होंने कहा, "तू सुन रहा है तो सुन ले — मैं तुझे चोर नहीं कहता। आज नहीं। और आज से पहले भी नहीं कहता। मैं तुझे भाई कहता हूँ। और मैं माफ़ी माँगता हूँ कि मैंने तुझे भाई कहने में इतनी देर कर दी।"
चबूतरी पर कोई नहीं बोला।
फिर फ़ैज़ ने अपनी आवाज़ निकाली, बहुत धीरे।
"उस्ताद साहब।"
"हाँ, बेटा।"
"दादा ने… दादा ने आज तक सिलाई मशीन का टूटा पहिया संभालकर रखा है। पीतल की उस पेटी में। जो मेरे पास है।" उसने पेटी की तरफ़ इशारा किया, जो उसने चबूतरी के नीचे रखी थी। "कहते थे — यह मेरा नहीं है। यह मेरे भाई का हिस्सा है। जब वो मिले, इसे देना।"
उस्ताद ने आँखें चौड़ी कीं।
"पहिया?"
"हाँ। कहते थे — इसी पहिये के टूटने के बाद मशीन का ताला लगा था। बाक़ी मशीन तो उन्होंने बेच दी थी, अपने इलाज के लिए। पर यह पहिया वो नहीं बेच सके। कहते थे — यह मेरा हिस्सा नहीं, भाई का है, जो मैंने चुराया था।"
उस्ताद ने फ़ैज़ की तरफ़ देखा। उनकी आँखें एक पल में भर आईं।
"उसने पहिया बचाकर रखा।" उन्होंने कहा, फुसफुसाकर। "उसने पहिया बचाकर रखा, और मैंने चिट्ठी बचाकर नहीं रखी। मैंने उसका पहला ख़त आज पढ़ा। आज। पचास साल बाद।"
"अभी ग्यारह और हैं।" फ़ैज़ ने कहा, और उसकी आवाज़ में भी कुछ टूट रहा था। "वो सब भी… वो सब भी बताना है। पर आज सिर्फ़ पहली। दादा ने कहा था — एक बार में एक चिट्ठी। उन्हें हिसाब से पढ़ना है।"
उस्ताद ने मुँह पोंछा। उन्होंने चश्मा निकाला और आस्तीन से साफ़ किया, और वो साफ़ करने में भी कुछ देर लगी, जैसे आस्तीन आज कुछ ज़्यादा काम कर रही हो।
मैंने उसी रात की बात सोची।
कभी मैंने सोचा था कि मरम्मत सिर्फ़ मशीन की होती है — तार जोड़ना, पहिया सीधा करना, चेन जोड़ना। पर आज मैंने देखा कि कोई आदमी अगर पचास साल चुप रहा, तो उसका सबसे बड़ा तोड़ा हुआ हिस्सा मशीन का पहिया नहीं था। वो उसका अपना हाथ था, जिसने उस पल उसका हाथ छोड़ दिया। और उस हाथ की मरम्मत चिट्ठी से हो रही थी — धीरे-धीरे, एक-एक लाइन।
मीरा ने कुछ चुपचाप पूछा — मुझे सुनाई नहीं दिया। उस्ताद ने सिर हिलाया।
"आगे पढ़ूँ?" उन्होंने पूछा।
"पढ़ो।" शबनम आपा ने कहा। "पूरी पढ़ो।"
मैंने भी अपनी तरफ़ से सिर हिलाया।
उस्ताद ने चिट्ठी फिर खोली, और उसकी आख़िरी लाइन पढ़ी।
उनकी आवाज़ में कुछ बदल गया था — जैसे कोई डूबता पकड़ा गया हो। और सब सुन रहे थे।
"और भाई, एक बात है जो मैंने पचास साल सीने में रखी है, और जो तू कभी खुद खोलकर नहीं बोला। दुकान की ज़मीन जोड़ की ज़मीन है। उस पर कोई एक नहीं, दोनों का हक़ है। मेरा, तेरा, और यह कोठरी भी — जिसमें हमने पहली बार घंटी खोली थी। उस ज़मीन को कभी बेचना नहीं। न मैंने बेचा। न तू। और अगर कभी कोई बेचने आए, तो समझ लेना — वो हमारा नहीं, किसी और का आदमी है।"
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