The Mysterious Bell – Chapter 127
"पर पहले इस बाप-बेटे का भरोसा जोड़ना पड़ेगा।"
कमरा चुप हो गया।
शाहिद ने अपना सिर मोड़ा। उसके होंठ हिले पर आवाज़ नहीं निकली। यूसुफ़ मियाँ की उँगलियाँ कुर्सी की बाँह पर और कस गईं।
मेरी जेब में घंटी ठंडी थी। बहुत ठंडी। और फिर, किसी के सुने बिना, बहुत धीमी आवाज़ में, मेरे कान के अंदर उसने कहा —
दो पहिये एक हो रहे हैं। पर पहले दो पापा अलग हैं। सुन, तेरे घर का चौथा सच — दीवार के इस पार नहीं, तेरे ही दरवाज़े पर खड़ा है।
मैंने पीछे मुड़कर देखा। दरवाज़े पर पापा खड़े थे। पापा — जो अभी तक एक शब्द नहीं बोले थे। उनका हाथ अभी भी दरवाज़े के चौखट पर टिका था, और उनकी आँखों में उस तस्वीर की तरफ़ देखते हुए कुछ ऐसा था जो मैंने पहले कभी नहीं देखा।
वो रणवीर के पोस्टर को देख रहे थे।
और मुझे पहली बार लगा कि मेरे पापा की चुप्पी मेरे घर की सबसे बड़ी चीज़ नहीं है।
उससे भी बड़ी चीज़ कोई है, जो उनके अंदर बैठी है — और वो बाहर आने की जगह ढूँढ रही है।
॥
पापा दरवाज़े पर खड़े थे और रणवीर के पोस्टर को ऐसे देख रहे थे जैसे कोई पुराना हिसाब देख रहा हो। उनका हाथ चौखट पर टिका था और उँगलियाँ धीरे-धीरे लकड़ी को खुरच रही थीं, जैसे बच्चा दीवार पर रेखा खींचता है।
मैंने दो बार आवाज़ दी।
"पापा।"
दूसरी बार में उन्होंने सिर घुमाया, पर आँखें थोड़ी देर बाद आईं। जैसे गाड़ी का पहिया पहले घूमता है और आवाज़ बाद में आती है।
"हाँ," उन्होंने कहा। बस हाँ।
"आप ठीक हैं?"
उन्होंने चश्मा ठीक किया, जो कान पर टेप से बँधा है। टेप पुराना हो गया है, किनारे से छूट रहा है और कान के पीछे छोटा सा लटक रहा है।
"ठीक हूँ," वो बोले। फिर एक शब्द और जोड़ा, "अंदर चल।"
अंदर चले। माँ पहली मंज़िल के दूसरे कमरे में बेड पर लेटी थीं। उनकी साँस अब भी थोड़ी तेज़ चल रही थी, पर होंठों का नीलापन हल्का हो गया था। उनके सिरहाने काजल खड़ी थी, डॉक्टर इसरानी की बीवी का सफ़ेद कोट पहने हुए, जो उसके कंधों से बड़ा था, और गले में पुराना स्टेथोस्कोप लटका हुआ था। वो बीच-बीच में स्टेथोस्कोप को हाथ से पकड़ लेती थी, जैसे किसी ने उसे उधार दिया है और वो कहीं गिर न जाए।
माँ ने मुझे देखा और तुरंत बोलीं, "अंकुश, तीन बजे का टिफ़िन आया?"
"माँ, अभी तो दो ही बजे हैं।"
"तो जल्दी जाओ। यहाँ का खाना मुझे नहीं खाना। इनकी खिचड़ी में नमक नहीं, और मेरे यहाँ दाल में पानी नहीं मिलता, और बात में भी नहीं।"
काजल ने आँखें ऊपर कर लीं।
"अम्मा, आपको आराम करना है।"
"मैं कर रही हूँ। मैं लेटी हूँ। क्या लेटना भी आराम नहीं है? अब ज़ुबान से न लेटूँ तो क्या करूँ, दिल से लेट जाऊँ?"
मैं हँस दिया। पापा कुर्सी खींचकर बेड के पास बैठ गए और माँ के हाथ पर हाथ रख दिया। बस इतना। न कोई शब्द, न कोई हलचल। माँ ने उनका हाथ देखा और फिर अपनी आँखें बंद कर लीं, जैसे कह रही हों कि ठीक है, तुम यहीं रहो।
मैं बाहर गलियारे में आया। गलियारा लंबा है, छत नीची, दीवार पीली, और बीच में पुरानी ट्यूबलाइट जो कभी जलती है, कभी झपकती है, कभी बस बुझी पड़ी रहती है। फ़र्श पर फिनाइल की बदबू और किसी के खाने की भाप। कोने में प्लास्टिक की तीन कुर्सियाँ पड़ी हैं, और उन्हीं में से एक पर यूसुफ़ मियाँ बैठे थे।
वही लोहे की कुर्सी। टूटा पहिया। मुड़ी तीलियाँ। और चरचराती बॉल बियरिंग, जो हर बार घूमने पर ऐसी आवाज़ करती है जैसे कोई पुराना दरवाज़ा खुल रहा हो।
शाहिद उनके सामने खड़ा था। उसके हाथ में एक काग़ज़ था, जिसे वो बार-बार मोड़ रहा था और फिर सीधा कर रहा था। मोड़े जाने की वजह से काग़ज़ का कोना चीरा जा चुका था।
"पापा," शाहिद बोला, "ये तीसरी बार है। हर हफ़्ते नया काग़ज़ थमा देते हैं। पिछले हफ़्ते दवा का दाम बढ़ गया, इस हफ़्ते जाँच जुड़ गई। अगर ऐसे ही चलेगा तो मेरी मज़दूरी पूरी दवा में लग जाएगी और घर का किराया कहाँ से आएगा?"
यूसुफ़ मियाँ ने कोई जवाब नहीं दिया। वो दीवार की तरफ़ देख रहे थे। दीवार पर पोस्टर लगा था — रणवीर भारद्वाज, हाथ जोड़े, सफ़ेद कुर्ता, और नीचे मोटे अक्षरों में लिखा था, नई शुरुआत, नए सपने।
मुझे लगा कि यूसुफ़ मियाँ पोस्टर नहीं देख रहे। वो उस दीवार के पीछे कुछ देख रहे हैं जो सिर्फ़ उन्हें दिखता है।
शाहिद ने काग़ज़ जेब में ठूँसा और कुर्सी की तरफ़ इशारा किया।
"और ये कुर्सी। इसका पहिया ऐसे घूमता है कि पूरा अस्पताल सुन लेता है। कल मैंने पूछा तो नर्स बोली, नई कुर्सी का काग़ज़ भर दो। तीन सौ रुपये और चार-पाँच रुपये महीने का किराया। पापा, अब बताइए, मैं क्या करूँ?"
यूसुफ़ मियाँ ने सिर हिलाया। बस हिलाया। हाँ जैसे, या ना जैसे, पता नहीं।
तभी सीढ़ियों से तेज़ पदचाप आई और टिंकू गलियारे में घुसा। उसके हाथ में माँ का टिफ़िन था — कपड़े में बँधा हुआ, और उसके मुँह पर पसीना।
"उस्ताद! मैंने कहा था न, मैं खुद लाऊँगा। तीन बजे अभी दो ही बजे हैं, पर मैंने सोचा कि आपको भूख लगी होगी, तो टिफ़िन ले आया। रास्ते में एक बकरी ने मेरी तरफ़ ऐसे देखा, जैसे मैं ही उसका टिफ़िन ले जा रहा हूँ।"
फिर उसकी नज़र कुर्सी पर पड़ी।
"अरे, इस कुर्सी का पहिया…" वो झुक गया और उँगली डाल दी।
"टिंकू, रुक—"
बहुत देर हो चुकी थी। उसकी उँगली तीलियों के बीच फँस गई और चरचराती बॉल बियरिंग ने उसे पकड़ लिया। टिंकू चीखा। सच में चीखा, बिना नाटक के, और पूरा गलियारा हिल गया।
"आआआ! निकल नहीं रही! निकल नहीं रही!"
मैंने उसे पकड़कर खींचा, फिर धीरे से उसकी कलाई घुमाई और उँगली बाहर निकाली। तीनों पोर पर लाल निशान पड़ गया था और ग्रीस की काली लकीर बन गई थी।
"देखा," मैं हँसा, "ये कुर्सी नहीं, इंसान है। ज़रा सब्र से पेश आइए। जब ये बोले तब पकड़िए, अपने आप पकड़ के मत बैठिए।"
टिंकू अपनी उँगली चूम रहा था।
"उस्ताद, आपको हँसी आ रही है?"
"मुझे इसलिए हँसी आ रही है कि तूने कुर्सी से वो सलूक किया जो ये सालों से लोगों से कर रही है। मुझे लगता है ये जानती है कि किसका दर्द कहाँ है। देख, अभी भी सबसे पहले तेरी ही उँगली पकड़ी।"
टिंकू भी हँस दिया। यूसुफ़ मियाँ के चेहरे पर हल्की सी हलचल आई। शाहिद ने भी मुस्कुराने की कोशिश की, पर मुस्कान आधी में अटक गई।
मैंने कुर्सी के पहिये के पास हाथ रखा और जाँचने लगा। बॉल बियरिंग में जंग है। तीलियाँ मुड़ी हैं। रिंग बैठी हुई है। और नीचे की धुरी पर भी दरार है।
तभी मेरी जेब में घंटी गरम होने लगी। गरम — इतनी कि जेब की जीन्स भी गरम लगी। मैंने बाहर से हाथ दबाया। और घंटी ने बहुत धीरे, बहुत छोटे से, मेरे कान के अंदर कहा —
पहले सच। फिर पहिया।
बस इतना। और फिर चुप।
मैंने टिंकू को टिफ़िन पकड़ाया और शाहिद की तरफ़ देखा। वो अब भी काग़ज़ को जेब में दबा रहा था, और उसकी जेब से काग़ज़ का पीला कोना बाहर झाँक रहा था।
"शाहिद भाई," मैंने कहा।
"हाँ।"
"आपकी जेब में जो काग़ज़ है, निकालिए।"
उसका चेहरा उतर गया।
"ये… ये तो बिल है। अस्पताल का हिसाब। इसमें क्या है।"
"अगर बिल है तो निकालिए। मैं आपको इलाज का हिसाब समझा दूँगा, कौन सी लाइन में क्या लिखा है, कौन सी दवा कहाँ से सस्ती मिलेगी। मेरी माँ का इलाज भी यहीं चलता है, उनके काग़ज़ मैंने खुद भरे हैं।"
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