The Mysterious Bell126 / 1504

The Mysterious Bell – Chapter 126

7 min read November 5, 2026

"मैंने कोई काग़ज़ नहीं ढीला छोड़ा," उन्होंने धीरे कहा। "पर मैंने मना भी नहीं किया। और यही मेरी ग़लती थी। मैं साठ पार कर चुका हूँ, अंकुश। मैं मरने से नहीं डरता। मैं इस डर से डरता हूँ कि जब मैं यहाँ नहीं रहूँगा, तो इस दरवाज़े पर ताला लगा होगा और इस मोहल्ले का कोई आदमी अपनी बीवी को लेकर कहीं और जाएगा। कहीं दूर। जहाँ वो उसका नाम भी नहीं जानते होंगे।"

मेरी जेब में घंटी हिली।

बहुत हल्की। बस एक बार। जैसे कोई उँगली उठाकर इशारा कर रहा हो।

मैंने उसे जेब से निकाला। वो ठंडी थी। और मुझे लगा जैसे मेरे कान के अंदर कोई फुसफुसाया है — बहुत दूर से, बहुत धीमा, पर शब्द साफ़।

इस दीवार के पीछे कोई टूटा भरोसा दबा है।

मैंने दीवार की तरफ़ देखा। पीली दीवार। पोस्टर के किनारे से एक दरार नीचे तक जाती थी, जिस पर प्लास्टिक की परत चढ़ गई थी। मैंने हाथ बढ़ाया और दीवार को छुआ।

घंटी फिर हिली। एक बार।

"क्या हुआ?" डॉक्टर ने पूछा।

"कुछ नहीं सर," मैंने कहा और हाथ नीचे कर लिया। "दीवार ठंडी है।"

वो मेरी तरफ़ देखते रहे। फिर बोले, "छह महीने पहले मेरी बीवी यहाँ नर्स थी। वो कहती थी, पीली दीवारें रखना, इसरानी। पीली दीवारें देखकर लोग डरते नहीं, बीमार होने से अच्छे होने की तरफ़ जाते हैं। उसकी बात सही थी। मैंने ये दीवारें आज तक नहीं बदलीं।"

उन्होंने दीवार पर टँगी तस्वीर की तरफ़ देखा और फिर अपने टूटे चश्मे की तरफ़।

उसी वक़्त गलियारे में पहियों की आवाज़ आई।

चरचर। चरचरर।

ऐसी आवाज़ जैसे कोई पुराना लोहा लकड़ी के फ़र्श पर रगड़ रहा हो। फिर एक आदमी की साँस — भारी, थकी, पर कोशिश में लगी हुई। और फिर एक जवान आवाज़।

"संभाल के, अब्बा। धीरे। ये टूटा हुआ पहिया है, अपने आप घूम जाता है।"

कमरे के दरवाज़े से एक कुर्सी अंदर आई।

पुरानी, लोहे की, कहीं-कहीं से ज़ंग लगी। उस पर एक बूढ़ा आदमी बैठा था — सफ़ेद टोपी, गमछा, और उसका एक हाथ कुर्सी की बाँह पर कसकर टिका था। उसके घुटने पर कोई चादर रखी थी जो सरक गई थी। उसकी आँखें बहुत थकी थीं।

कुर्सी को धकेल रहा था एक जवान लड़का। उन्नीस-बीस साल का होगा। पतला, कमर झुकी हुई, हाथों पर सीमेंट के सफ़ेद दाग़। उसका कोई एक पतलून का घुटना फटा हुआ था और वो चप्पल पहने था।

उसे देखते ही मैंने कुछ महसूस किया — वो एहसास जो गुमटी पर रज्जो बाई के चेहरे पर था।

"शाहिद," मैंने धीरे कहा।

लड़के ने मेरी तरफ़ देखा। पहले उसे पहचानने में वक़्त लगा। फिर उसके चेहरे पर एक हल्की सी हँसी आई, बहुत जल्दी मिटने वाली।

"अंकुश भाई," उसने कहा।

बूढ़े आदमी ने अपना सिर उठाया। "कौन है, शाहिद?"

"यही अंकुश भाई हैं, अब्बा। जिनकी दुकान पर मैंने एक बार ब्रेक का तार करवाया था। मैंने आपको बताया था।"

"अंकुश," बूढ़े आदमी ने कहा। उनकी आवाज़ काँप रही थी और उसमें कुछ ऐसा था जो मुझे समझ नहीं आया। "मेरा नाम यूसुफ़ है। मेरा बेटा तुम्हारे यहाँ ब्रेक करवाने आया था। उसने कहा था, दुकान वाला भला लड़का है। पैसे नहीं थे, कह दिया बाद में दूँगा, भला आदमी पहचान के तो संभाल लेता है।"

मेरी जेब में घंटी ठंडी हो गई।

मुझे याद आया। दो महीने पहले। एक लड़का ब्रेक का तार लाया था। दस रुपये थे। उसने कहा था, "पाँच रुपये हैं, पाँच महीने बाद दूँगा।" मैंने बिना देखे कर दिया था। उसका नाम तक नहीं पूछा था।

और अब वो अपने पापा को इस टूटे पहिये वाली कुर्सी पर मेरे सामने लेकर आया है।

मैंने शाहिद की तरफ़ देखा। वो मुझसे नज़र नहीं मिला रहा था। वो अपने पापा के कंधे पर हाथ रखकर खड़ा था, और वो इस तरह खड़ा था जैसे उसे कोई भार उठाना पड़ रहा हो।

"शाहिद," मैंने कहा, "अब्बा क्या —"

"कुर्सी," वो बोला। "अस्पताल आते वक़्त मुड़ जाता है। मैं रोक नहीं पाता। दो दिन से ठीक से घूम नहीं रही।"

डॉक्टर इसरानी ने आगे बढ़कर बूढ़े आदमी की तरफ़ देखा। उन्होंने कुर्सी की तरफ़ नहीं देखा, पहले यूसुफ़ मियाँ के चेहरे की तरफ़ देखा, और फिर उनका हाथ उनके कंधे पर रख दिया।

"यूसुफ़ मियाँ," उन्होंने कहा। "कम से कम दो हफ़्ते से आप नहीं आए।"

"काम पड़ा," बूढ़े आदमी ने कहा, और ये ऐसा झूठ था जो पूरे कमरे में सुनाई दे रहा था।

"और यह पहिया?" डॉक्टर ने कुर्सी की तरफ़ देखा। "मैंने कहा था, बदल देते हैं। दुकान पर मिल जाएगा। तीन सौ का होगा। मैं चार-पाँच रुपये महीने में आपसे ले लूँगा।"

बूढ़े आदमी ने नीचे देखा। शाहिद के कान लाल हो गए।

"डॉक्टर साहब," शाहिद ने धीरे कहा, "मैं सीमेंट ढोता हूँ साहब। चार दिन लगातार काम मिल जाए, तो तीन सौ का इंतज़ाम हो जाए। पर चार दिन बबलू साहब साइट पर नहीं आने देते।"

मैंने डॉक्टर की तरफ़ देखा। उनका चेहरा ग़ुस्से से नहीं, किसी और चीज़ से बदल रहा था। जैसे किसी ने उनके ही घर की दीवार पर कोई लिख दिया हो।

तभी बेड पर माँ ने करवट बदली। मैं दौड़कर उनके पास गया। उनकी आँखें आधी खुली थीं।

"अंकुश," उन्होंने कहा।

"हाँ माँ।"

"वो बूढ़ा आदमी रो रहा है क्या?"

मैंने पीछे देखा। यूसुफ़ मियाँ कुछ रो नहीं रहे थे। पर उनकी एक आँख के कोने में पानी का एक कतरा था, जो टोपी के नीचे छुप गया था।

"नहीं माँ," मैंने कहा।

"झूठ," माँ ने कहा, आँखें बंद करते हुए। "तू बचपन से यही झूठ बोलता है।"

कमरे का दरवाज़ा फिर खुला और काजल अंदर आई। उसके हाथ में परची थी, और उसके पीछे पापा थे।

"डॉक्टर साहब," काजल ने कहा, पूरी तरह व्यवसायिक आवाज़ में, "परची बन गई। नर्स से बात कर ली है। बेड तैयार है, एक बजे दोपहर की दवा शुरू हो जाएगी।"

फिर उसकी नज़र कुर्सी पर पड़ी और उसकी आवाज़ अटक गई।

"शाहिद भाई," वो बोली।

शाहिद ने सिर हिलाया। "बहन जी।"

काजल ने डॉक्टर की तरफ़ देखा, फिर कुर्सी की तरफ़, फिर मेरी तरफ़। उसकी आँखों में एक सवाल था जो उसने नहीं पूछा।

तभी डॉक्टर इसरानी ने कुर्सी की तरफ़ इशारा किया और अपनी आवाज़ थोड़ी सी बढ़ाई। वो कभी आवाज़ नहीं बढ़ाते, इसलिए जब बढ़ाते हैं तो पूरा कमरा सुनता है।

"अंकुश," उन्होंने कहा।

मैं गया। बेड से कुर्सी तक, चार कदम। फिर रुक गया।

"ये पहिया देखा?" उन्होंने कहा।

"देखा सर।"

"जोड़ सकते हो?"

मैंने कुर्सी की तरफ़ झुककर देखा। पहिया मुड़ा हुआ था। तीन तीलियाँ बीच से टेढ़ी हो गई थीं, और बॉल बियरिंग चरचरा रही थी। जंग भी लग गई थी।

"जोड़ सकता हूँ," मैंने कहा। "तीलियाँ सीधी करके, बेयरिंग में थोड़ा तेल, और अगर एक नई रिंग मिल जाए, तो एक घंटे का काम है।"

मैंने उठकर सीधा खड़े होते वक़्त यूसुफ़ मियाँ की तरफ़ देखा। वो अपने बेटे की तरफ़ देख रहे थे, और उनकी आँखों में कुछ ऐसा था जो मैंने अपने पापा की आँखों में कई साल से देखा है। वो देख रहे थे — इस डर से कि कहीं उनका बेटा उन्हें शर्मिंदा न कर दे।

और मैंने देखा कि शाहिद अपने पापा की तरफ़ नहीं देख रहा था। वो दीवार की तरफ़ देख रहा था। रणवीर के पोस्टर की तरफ़।

डॉक्टर इसरानी उठे। उन्होंने अपना टूटा चश्मा मेज़ से उठाया, पहना और फिर से उतार दिया। फिर उन्होंने सीधे मेरी तरफ़ देखा।

"अंकुश," उन्होंने कहा।

"सर।"

"इस कुर्सी का पहिया जोड़ सको तो जोड़ो। पर —"

उन्होंने एक कदम आगे बढ़ा दिया और उनकी आवाज़ वो धीमी, वो तोलकर बोली वाली हो गई जो मैंने पहले सुनी थी।

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