The Mysterious Bell – Chapter 128
शाहिद पीछे हट गया। एक कदम। फिर दूसरा। उसकी एड़ी दीवार से टकराई और टकराते ही वो रुक गया, जैसे दीवार ने भी उसे ठेल दिया हो।
"बिल नहीं है," यूसुफ़ मियाँ ने बहुत धीमी आवाज़ में कहा। उनकी आवाज़ सूखी थी, जैसे बहुत दिनों बाद बोली हो।
सब उनकी तरफ़ देखने लगे।
"यूसुफ़ भाई," डॉक्टर इसरानी कहाँ से आ गए, पता नहीं चला। वो मेरे पीछे खड़े थे, हाथ में टूटा चश्मा। उनकी आवाज़ धीमी थी। "क्या कह रहे हो?"
यूसुफ़ मियाँ ने दीवार से नज़र नहीं हटाई।
"मत पूछो," वो बोले। "बेटा मेरी वजह से फँसा है। मेरी दवा, मेरी कुर्सी, मेरी जाँच, मेरा ही सब कुछ। वो सुबह सीमेंट की बोरी उठाता है और शाम को यहाँ आकर मेरे पैर दबाता है। उसकी उम्र में मैं भी मज़दूरी करता था, पर मैंने अपने बाप के पैर कभी नहीं दबाए, क्योंकि मेरा बाप मेरे पैर पर नहीं बोझ था।"
"पापा," शाहिद ने कहा। उसकी आवाज़ काँप रही थी।
"मैं बोल रहा हूँ," यूसुफ़ मियाँ ने कहा, और यह पहली बार था कि उन्होंने अपने बेटे की तरफ़ देखा।
शाहिद का हाथ जेब की तरफ़ गया। उँगलियाँ काँप रही थीं। उसने काग़ज़ पकड़ा, बाहर निकाला, और काग़ज़—
उसके हाथ से छूट गया।
वो काग़ज़ हवा में धीरे-धीरे घूमकर नीचे गिरा, जैसे कोई पत्ता गिरता है, और फ़र्श पर सीधा पड़ गया, खुला हुआ, जैसे कोई खुद ही अपना सच बता रहा हो।
मैं झुक गया।
काग़ज़ पीला था, ऊपर मोटे अक्षरों में सफ़ेद काग़ज़ पर छपा हुआ। सबसे ऊपर बड़ी मोहर — गोल, नीली स्याही, और उसमें साफ़ पढ़ा जा सकता था, भारद्वाज कंस्ट्रक्शन।
नीचे की लाइनें छोटी थीं। मैंने उँगली से उस पर हल्की धूल हटाई और पढ़ा।
सुविधा के नाम पर, अस्पताल में भर्ती रोगी के परिवार को मुफ़्त इलाज, मुफ़्त दवा और मुफ़्त जाँच की सुविधा दी जाएगी।
और उसके नीचे, बड़े मोटे अक्षरों में —
बदले में अस्पताल की ज़मीन के काग़ज़ पर अंगूठा।
और उसके नीचे एक खाली जगह, जहाँ स्याही की गोली जैसी जगह बनी थी, और उस जगह पर कोई नहीं था। खाली। इंतज़ार कर रही थी।
कमरे में कोई नहीं बोला। ट्यूबलाइट झपकी, फिर जल गई, फिर झपकी।
टिंकू ने काग़ज़ पढ़ने की कोशिश की। उसके होंठ हिले, पर आवाज़ नहीं निकली।
डॉक्टर इसरानी ने काग़ज़ उठाया। उनके हाथ नहीं काँप रहे थे। यही सबसे डरावना था। उन्होंने उसे दोनों हाथों से पकड़ा, बहुत देर तक देखा, और फिर धीरे से बोले, "मुझे भी यह मिला था।"
सबने उनकी तरफ़ देखा।
"दो हफ़्ते पहले," डॉक्टर ने कहा। "उसी सफ़ेद कुर्ते वाले आदमी ने मेरी मेज़ पर रखा था। यही काग़ज़, यही मोहर, यही लाइनें। उसने कहा कि अस्पताल पुराना हो गया है, नई इमारत चाहिए, और मैं वहाँ पहली मंज़िल पर बैठूँगा, बड़ा कमरा, नई मशीन, अपना नाम साथ में। मैंने अंगूठा नहीं लगाया। पर मैंने उसे रोका भी नहीं। और फिर मैंने उन्हें दीवार पर बोर्ड लगाने दिया। मैंने सोचा, क्या फ़र्क़ पड़ता है, बोर्ड है, काग़ज़ नहीं।"
उन्होंने काग़ज़ नीचे किया।
"फ़र्क़ पड़ता है," वो बोले, अपने ही आप से, जैसे कोई डाँट रहा हो। "बोर्ड भी वही काम करता है जो अंगूठा करता है। आदमी को आदत डाल देता है।"
मैंने पीछे देखा। पापा दरवाज़े पर खड़े थे। उनका हाथ अभी भी चौखट पर था। और उनकी आँखें काग़ज़ पर टिकी थीं।
फिर पापा आगे आए। उन्होंने डॉक्टर इसरानी के हाथ से काग़ज़ लिया, अपने चश्मे के पास ले गए, और बहुत देर तक देखा। मैंने सोचा कि उन्हें पढ़ने में दिक्कत हो रही होगी। पर फिर मैंने देखा कि वो पढ़ नहीं रहे थे। वो बस देख रहे थे। वो काग़ज़ जानता था और पापा भी।
"यह काग़ज़ मैं जानता हूँ," उन्होंने कहा।
उनकी आवाज़ सामान्य थी। न धीमी, न तेज़। और यही सबसे भारी थी।
"पापा," मैंने कहा। मेरी आवाज़ कहाँ गई, पता नहीं।
"इसकी स्याही मेरे अंगूठे पर लगी थी," उन्होंने कहा। "पाँच साल पहले। दफ़्तर में। मैंने तुम्हारी माँ के इलाज के लिए अंगूठा लगाया था। काग़ज़ क्या था, मैंने पूछा नहीं। मुझे डर लगा था कि पूछने से सब रुक जाएगा। और जिस चीज़ में सबसे ज़्यादा डर हो, वही सबसे ज़्यादा सच होती है।"
गलियारा चुप हो गया।
शाहिद का चेहरा सफ़ेद पड़ गया था। वो अपने पापा की तरफ़ देख रहा था, और उसकी आँखें सवाल से भरी थीं।
"पापा," वो बोला, "ये काग़ज़ आपने कब देखा?"
यूसुफ़ मियाँ ने दीवार से नज़र हटाई।
"चार दिन पहले," उन्होंने कहा। "तू साइट पर गया था। तेरी माँ मेरे पास बैठी थी। वो सफ़ेद कुर्ते वाला आदमी, जो यहाँ डॉक्टर साहब से बात करने आता है, वो मेरे पास आया और यह काग़ज़ रख दिया। बोला, बस एक अंगूठा, और तेरा इलाज मुफ़्त, तेरी जाँच मुफ़्त, और तेरे बेटे को साइट पर पक्की नौकरी।"
"और आपने?" मैंने पूछा।
"मैंने कहा," यूसुफ़ मियाँ ने आँखें बंद करके कहा, "कि मेरा अंगूठा लगाने से किसी को क्या फ़र्क़ पड़ता है। मैं तो कोई ज़मीन का मालिक नहीं हूँ। मेरे पास ज़मीन कहाँ है।"
"आपने लगाया?" शाहिद की आवाज़ फट गई।
"मैंने काग़ज़ शाहिद को दिया," यूसुफ़ मियाँ ने कहा। "बोला, देख ले, तेरा पापा पढ़ा नहीं जो, तू पढ़ ले। और मैंने यह नहीं सोचा कि वो लाइन — अस्पताल की ज़मीन पर अंगूठा — इसका मतलब क्या है। अंगूठा तो मैं अपना लगाता हूँ, ज़मीन तो अस्पताल की है। मैंने सोचा, बात बन गई।"
"और अब?" मैंने कहा।
"अब मैंने काग़ज़ पढ़वाया शाहिद से," उन्होंने कहा। "उसने पढ़कर मुझे सुनाया। और मैं बैठा रह गया। चार दिन से बैठा हूँ। काग़ज़ वापस देना है या फाड़ देना है, यह भी नहीं तय कर पाया। हर रात सोचता हूँ, सुबह कर दूँगा। सुबह होती है, और मैं कुर्सी पर बैठकर दीवार देखता रह जाता हूँ।"
अब मुझे समझ आया कि वो दीवार क्यों देख रहे थे। वही पोस्टर। वही चेहरा। वही हाथ जोड़े हुए सफ़ेद कुर्ता।
काग़ज़ के कोने पर छोटी सी लाइन और थी, जिसे मैंने पहले नहीं देखा था। मैंने काग़ज़ झुकाया और पढ़ा।
तीस दिन के अंदर अंगूठा।
और उसके नीचे, बहुत छोटे अक्षरों में —
वरना इलाज की सुविधा समाप्त मानी जाएगी।
मेरी जेब में घंटी गरम थी। बहुत गरम। और फिर उसने कहा —
तीस दिन। काग़ज़ आया है। काग़ज़ वापस जाएगा। पर पहले बाप-बेटे के बीच एक सच बाकी है।
मैंने शाहिद की तरफ़ देखा। वो दीवार से टिका खड़ा था, आँखें नीची, और उसके होंठ कुछ कहना चाहते थे पर निकल नहीं रहा था।
"शाहिद भाई," मैंने कहा। "आपने काग़ज़ वापस नहीं किया। क्यों?"
उसने सिर उठाया। उसकी आँखों में पानी था और गुस्सा भी।
"क्योंकि मुझे लगा," उसने कहा, "कि अगर पापा का इलाज मुफ़्त हो जाए, तो मैं चार दिन और मज़दूरी करूँगा, और उस पैसे से अपनी माँ को दवा दिला दूँगा, और कभी किसी से कुछ नहीं माँगूँगा। मुझे यह नहीं सोचना था कि काग़ज़ पर अंगूठा किसका लगेगा। मुझे यही सोचना था।"
वो फिर चुप हो गया। फिर बोला, "और एक बात है। चार दिन पहले, साइट पर, बबलू भाई ने मेरा कंधा पकड़कर कहा था — तेरे पापा अंगूठा लगा दें, तो तेरे लिए पक्की नौकरी। मैंने उससे यह नहीं कहा कि मैं पहले ही काग़ज़ ले आया हूँ। मैंने सोचा, अगर पक्की नौकरी मिल जाए, तो छह महीने में घर की हालत बदल जाएगी।"
"तो तुमने क्यों नहीं कहा?" यूसुफ़ मियाँ ने पूछा।
"क्योंकि आपने काग़ज़ फाड़ने की बात की थी," शाहिद ने कहा। "मैंने डर के मारे छुपा लिया।"
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