The Mysterious Bell – Chapter 1266
"फिर बारह रुपये कहाँ गए?" शबनम आपा ने पूछा, और उनकी आवाज़ में वो तेज़ी लौट आई थी — जो अच्छे वक़्त में होती है।
फ़ैज़ ने अपने कंधे उठाए। "यह दादा ने नहीं बताया। उन्होंने सिर्फ़ इतना कहा — जो पैसा किसी के लिए उठाया जाए, वो ग़ायब नहीं होता। सिर्फ़ जगह बदलता है।"
मैंने उस्ताद की तरफ़ देखा।
वो एकदम स्थिर बैठे थे। आँखें पीपल की जड़ों पर। मुँह बंद। जैसे बाहर से इंसान बैठा हो, पर अंदर वो बाईस साल की उम्र में पहुँच गए हों, और उस कमरे में खड़े हों, और सामने इलाही खड़ा हो, और उन्होंने उसे झूठा कह दिया हो।
मैंने धीरे से कहा, "उस्ताद, अगर डिब्बा उस रात इलाही भाई ने खोला था, तो तीन बार खुलने का हिसाब मिलता है। पर पैसा —"
"पैसा दादा ने लिया।" उस्ताद ने कहा। और उनकी आवाज़ इतनी शांत थी कि डर लगा। "उसने उस रात मुझे नहीं बताया। कभी नहीं बताया। वो पचास साल मेरे साथ रहा, मेरी दुकान में आया-जाया, मेरी बीवी की दवा के लिए पैसे दिए, मेरे बच्चों की शादी में आया — और कभी नहीं बताया कि उस रात इलाही को झूठा किसने कहा था।"
रुके। फिर बोले — "वो बात सही कहता है। जो पैसा किसी के लिए उठाया जाए, वो ग़ायब नहीं होता। बस जगह बदलता है।"
मैंने कहा, "तो पैसा किसके लिए उठा था?"
उस्ताद की आँखें मेरी तरफ़ घूमीं और मुझे लगा कि वो मुझे नहीं, मेरे पीछे किसी को देख रहे हैं।
"मुझे नहीं पता।" उन्होंने कहा। "पर मुझे लगता है कि यही सवाल पचास साल से गली में किसी के दिल में बैठा है, और वो जवाब दादा के साथ चला गया।"
पापा ने पहली बार बोला। उनकी आवाज़ चबूतरी के दूसरे कोने से आई, बहुत धीमी।
"पापा ने कभी नहीं बताया।"
उस्ताद ने सिर हिलाया। "नहीं बताया। और यही बात उसे पापा बनाती है, शंकर। वो चुप रहकर भी एक हिसाब बराबर करना चाहता था। पर उसने गलत तरीक़ा चुना — उसने शांति चुनी, सच नहीं। और शांति हिसाब नहीं होती, शंकर। शांति सिर्फ़ ताक़त देती है, बाक़ी पासा ऐसे ही पड़ा रहता है।"
काजल ने धीरे से कहा, "बाक़ी पासा?"
"यही तेरह चिट्ठियाँ।" उस्ताद ने बंडल की तरफ़ इशारा किया। "पचास साल से इलाही ने हर साल एक लिखी। और हर साल भेजने से पहले सोचा — अगर भेज दूँ, तो भाई को पता चल जाएगा कि मैंने डिब्बा खोला था। तो नहीं भेजी। और यही सिलसिला चलता रहा।"
फिर वो मुस्कुराए और उस मुस्कान में कुछ टूटा हुआ था।
"और मैं — मैं हर साल यह सोचता रहा कि वो नहीं आया। क्योंकि उसने ग़लती नहीं मानी। और वो हर साल यह सोचता रहा कि मैंने ग़लती नहीं मानी। दोनों ने ग़लती मान ली थी, बेटा। दोनों ने। पर दोनों ने यह सोच लिया कि दूसरे का दिल बड़ा है, पहले वो आएगा।"
फिर उन्होंने वो कहा जो मैं भूल नहीं पाऊँगा।
"और इस तरह पचास साल में एक रिश्ता एक ऐसे काग़ज़ की तरह मुड़ा जो कभी खुला ही नहीं, और कभी फेंका भी नहीं गया।"
शबनम आपा ने कुल्हड़ उठाया और उस्ताद के हाथ में दे दिया। "अब पी लो।" उन्होंने कहा। "बहुत बोल लिए।"
उस्ताद ने कुल्हड़ पकड़ा और एक लंबी साँस लेकर पी लिया।
तब तक फ़ैज़ ने दूसरी चिट्ठी उठाई।
"उस्ताद जी, यह पढ़ूँ?"
"पढ़।" उस्ताद ने कहा। "आज सब पढ़ी जाएँगी। सब।"
फ़ैज़ ने दूसरी चिट्ठी खोली। उसकी आवाज़ थोड़ी देर पहले से बेहतर थी — जैसे किसी को रोना रोककर बोलना सिखाया गया हो।
"भाई, अगर तू यह पढ़ रहा है, तो मतलब तूने पहली वाली पढ़ ली। मैं जानता हूँ तू पहली वाली खोलेगा, क्योंकि तू हमेशा ऊपर से पढ़ता था, नीचे से नहीं। तेरी यही आदत थी। यही आदत तेरे झगड़े की जड़ भी थी — तूने कभी नीचे से नहीं देखा।"
उस्ताद के होंठ हिले। "यह सच कहता है।"
फ़ैज़ आगे पढ़ता गया।
"उस रात मैंने डिब्बा इसलिए खोला कि मैं तुझे बताना चाहता था कि अम्मा की दवा के लिए पैसे कम पड़ रहे हैं, और तू बार-बार उन पैसों को गिनता था, इसलिए मैं उनमें से लेना नहीं चाहता था। मैं चाहता था कि तू ख़ुद कहे — ले जा। पर मैंने कहा नहीं। तूने पूछा नहीं। और फिर तूने कह दिया — तूने लिए।"
फ़ैज़ ने चिट्ठी को थोड़ा नीचे किया और देखा।
"फिर दादा लिखते हैं — आज भी जब मैं ताले खोलता हूँ, तो खोलने से पहले अपने हाथ देखता हूँ। क्योंकि जो हाथ ताले खोलते हैं, वो सबके दरवाज़ों को खोलना शुरू कर देते हैं। और मुझे डर लगता है कि कहीं मैं भी तेरी तरह बिना पूछे, बिना सोचे, किसी को झूठा न कह दूँ।"
चबूतरी पर एक बार फिर चुप्पी।
पर इस बार चुप्पी में कुछ और था। पहले चुप्पी में डर था, अब चुप्पी में एक-दूसरे की तरफ़ देखना भी था। शबनम आपा ने मेरी तरफ़ देखा। मीरा ने पापा की तरफ़। पापा ने ज़मीन पर।
और मैं — मैंने अपनी जेब में घंटी पकड़ी और मुझे लगा कि वो अब भी गरम है, पर अब वो गरम नहीं जल रही। वो गरम किसी और की तरह थी — जैसे किसी ने हाथ थाम लिया हो।
तब मैंने एक बात सोची जो मुझे पहले कभी सोचनी नहीं चाहिए थी, पर आज सोचनी पड़ी।
जो तंत्र मुझे मिला, वो सिर्फ़ टूटी चीज़ें नहीं जोड़ता। वो टूटे हुए हिसाब भी जोड़ता है, जिन्हें लोग सौ साल तक अपने सीने में ढोते हैं — और जिन्हें किसी के सामने रखते नहीं, क्योंकि रखने से उन्हें आईना दिख जाता है।
मैंने उस्ताद से पूछा, "उस्ताद, वो धातु का टुकड़ा — जो पेचकस के हत्थे में था — वो क्या था?"
उस्ताद ने एक सेकंड सोचा, फिर बोले, "वो डिब्बे वाला नहीं था, अंकुश। वो घंटी के दो हिस्सों को जोड़ने वाली कड़ी थी। आधी कड़ी इलाही के पास थी, आधी मेरे। जब हम दोनों मिलते, तो कड़ी पूरी होती और घंटी बोलती।"
"मतलब —"
"मतलब जब हम अलग हुए, कड़ी बीच से टूट गई। फ़क़त एक कड़ी नहीं टूटी, अंकुश। भरोसा टूटा। और जो दो टुकड़ों के बीच की कड़ी टूटे, वो आवाज़ नहीं दे सकती। वो सिर्फ़ टन दे सकती है।"
मैंने धीरे से कहा, "तो घंटी कोई जादू नहीं है। वो सिर्फ़ हमारे करने-धरने का हिसाब रखती है।"
उस्ताद ने मेरी तरफ़ देखा और उनकी आँखों में कुछ ऐसा था जो सिर्फ़ चबूतरी पर बैठे बूढ़े आदमी की आँखों में होता है — जिसने बहुत कुछ देखा है, और अब सिर्फ़ सही बात सुनना चाहता है।
"बिल्कुल।" उन्होंने कहा। "और इसीलिए यह गली आज तक जोड़ना नहीं सीख पाई। क्योंकि हमने हर रिश्ते को एक बही की तरह समझा, और हर बही को एक काग़ज़ की तरह। किसी से यह नहीं पूछा कि भाई, तेरे दिल में क्या है। सिर्फ़ यह पूछा कि हिसाब में क्या है।"
फिर उन्होंने बंडल को अपने हाथों से पकड़ा और कपड़े के कोने से ढक दिया।
"बाक़ी चिट्ठियाँ बाद में।" उन्होंने कहा। "अब अगर मैं उन्हें पढ़ता रहूँगा, तो यह पीपल मेरी आवाज़ में बैठ जाएगा। और मुझे आज एक काम करना है।"
"क्या काम?" शबनम ने पूछा।
उस्ताद ने उनकी तरफ़ देखा और फिर घंटी की तरफ़ — मेरी जेब की तरफ़, जहाँ से घंटी की गरमाहट मेरे घुटने तक आ रही थी।
"इससे माफ़ी माँगनी है।"
मैं हिल गया।
"उस्ताद —"
"अंकुश, तू सोचेगा कि मैं पागल हो गया हूँ। घंटी पीतल की है। पर मैंने आज पचास साल में पहली बार यह समझा है कि मैंने इलाही से नहीं, अपनी ही घंटी से बात करना बंद कर दिया था। वो चुप नहीं हुई थी, बेटा। मैंने उसकी आवाज़ सुनना बंद कर दिया था।"
उन्होंने हाथ बढ़ाया।
"घंटी दे।"
मैंने जेब से घंटी निकाली और उनके हाथ में रख दी।
वेबसाइट पर अपनी पसंदीदा कहानियाँ मुफ्त पढ़ें और Story FM App पर उन्हीं कहानियों का शानदार Audio Experience लें।
यह कहानी Story FM app पर ऑडियो में भी सुनें — आगे के एपिसोड सबसे पहले वहीं आते हैं।
Audio mein suno