The Mysterious Bell1265 / 1504

The Mysterious Bell – Chapter 1265

7 min read November 5, 2026

शबनम आपा ने धीरे से कहा, "उस्ताद, चाय ठंडी हो रही है।"

उस्ताद ने अपना सिर हिलाया। "रख दे बेटी। थोड़ी देर में पी लूँगा।"

शबनम ने कुल्हड़ चबूतरी के किनारे रख दिए। उनकी आवाज़ में जो तेज़ी थी, वो आज नहीं थी। आज उनकी आवाज़ भी उस्ताद की तरह धीमी थी।

फिर उस्ताद ने चिट्ठी को अपनी गोद में रखा, दोनों हाथों से सीधा किया, और बोले —

"अंकुश, तू एक बात पूछ रहा था ना — कि घंटी पचास साल से किसके पास थी? और मैंने कहा था — पता करेंगे।"

मैंने कहा, "हाँ उस्ताद।"

"तो अब सुन।" उन्होंने एक लंबी साँस ली, जैसे पचास साल की साँस। "और सिर्फ़ तू ही नहीं, पूरी गली सुने। क्योंकि सुनने का वक़्त आज है। बाद में मैं शायद न बोल सकूँ।"

उन्होंने अपनी सूखी ज़ुबान से होंठ गीले किए और फिर शुरू किया।

"पचास साल पहले, इसी गली में, तीन लोग थे। मैं, मेरा भाई इलाही, और शिवनारायण यादव — यही अंकुश, तेरे दादा।"

मेरे पेट में फिर वो ठंडा उतरा।

"हम तीनों ने मिलकर पीपल के उस पार, छोटी दुकान में एक पाठशाला चलाई थी। मरम्मत की पाठशाला। न कोई किताब, न कोई मास्टर, न कोई फ़ीस। सुबह से शाम तक दरवाज़ा खुला रहता था और जिस बच्चे के हाथ में खाली वक़्त था, वो अंदर आ जाता था।"

उन्होंने बच्चों की तरफ़ देखा — सानिया, गुड्डू, रफ़ीक़, चिंटू — और मुस्कुराए। पहली बार उस शाम मुस्कुराए।

"वहाँ बच्चों को साइकिल ठीक करना सिखाया जाता था। पहिया खोलना, चेन चढ़ाना, बियरिंग में ग्रीस भरना। दादा सिखाते थे साइकिल। इलाही सिखाता था ताला। और मैं सिखाता था सिलाई मशीन।"

काजल ने धीरे से कहा, "ताला?"

"हाँ बेटी, ताला।" उस्ताद ने कहा। "इलाही कहता था कि जो ताला खोलना जानता है, वो दरवाज़ा भी जानता है, और जो दरवाज़ा जानता है, वो रास्ता भी जानता है। उसकी बातें अजीब होती थीं, पर सच होती थीं। उसके पास उस वक़्त पचास-साठ ताले थे, सब टूटे हुए, सब इकट्ठे किए हुए। हम लोग कहते थे — इलाही, तू तालों का कबाड़ी है। वो हँसते हुए कहता था — और तू इंसानों का कबाड़ी है भाई, तेरी दुकान पर जो आता है, वो टूटा हुआ ही आता है।"

फ़ैज़ ने धीरे से कहा, "दादा यही बात सुनाते थे। बिल्कुल यही।"

उस्ताद ने उसकी तरफ़ देखा, फिर नज़र हटा ली।

"तो उस पाठशाला में रोज़ शाम को हिसाब रखा जाता था। एक टिन का डिब्बा था, छोटा, ढक्कन पर ज़ंग लगी थी, और उसमें दिन भर की कमाई डाली जाती थी। दस आने, बारह आने, कभी दो रुपये। बहुत मिलकर तीस-चालीस रुपये महीने में। वो डिब्बा पीपल के उस तरफ़, उस कमरे की दीवार के ताखे पर रखा रहता था।"

मैंने कहा, "किसी की ज़िम्मेदारी थी?"

"सबकी थी बेटा।" उस्ताद ने कहा। "और यही गड़बड़ थी। जब ज़िम्मेदारी सबकी हो, तो किसी की नहीं होती।"

उन्होंने एक कुल्हड़ उठाया और एक घूँट लिया। फिर रख दिया।

"एक दिन — वो भी अभी बरसात का मौसम था — शाम को डिब्बा खुला। बारह रुपये कम। कम नहीं बेटा, ग़ायब। क्योंकि गिनती की होती थी, सुबह और शाम, दोनों वक़्त। मैंने गिना, दादा ने गिना, तीसरी बार इलाही ने गिना। बारह रुपये कम थे।"

चबूतरी पर एक आवाज़ आई — किसी ने साँस भरी, शायद पापा ने।

"उस वक़्त इलाही अकेला वहाँ था।" उस्ताद ने कहा। "वो ही सबसे आख़िर में कमरे में रहा था। दादा ने पूछा तो उसने कहा — डिब्बा मैंने खोला, पर पैसे मैंने नहीं लिए। दादा चुप रहा। मैंने कहा — फिर किसने लिए? वो नहीं बोला। मैंने कहा — तेरे सिवा कौन था?"

उस्ताद ने अपनी आँखें मूँद लीं।

"फिर जो मैंने कहा, वो अब भी मेरे कानों में बजता है। मैंने कहा — तू झूठ बोल रहा है।"

रुके।

"बस इतना कहा। दो शब्द। झूठ बोल रहा है।"

उन्होंने आँखें खोलीं।

"और उस रात इलाही ने अपना बक्सा उठाया, अपने ताले, अपने औज़ार, अपनी सिलाई की सुई — सब। और चला गया। न रोका, न पूछा, न झगड़ा किया। बस चला गया।"

मैंने कहा, "उस्ताद, आपने बुलाया नहीं?"

"बुलाया।" उन्होंने कहा। "सुबह बुलाया। दोपहर बुलाया। तीसरे दिन उसके भांजे से कहलवाया। पर उस वक़्त तक तक मैं बेचारा नहीं था, अंकुश। उस वक़्त मैं ज़िद्दी था। और ज़िद्दी आदमी माफ़ी नहीं माँगता। वो इंतज़ार करता है कि सामने वाला पहले आए।"

फिर उन्होंने बहुत धीरे, अपने ही हाथों को देखते हुए कहा —

"और वो नहीं आया।"

चबूतरी पर कुछ देर तक सिर्फ़ पीपल की आवाज़ थी। पत्ते चल रहे थे, हवा नहीं थी, फिर भी पत्ते चल रहे थे। जैसे पेड़ भी सुन रहा हो और सुनकर अपने ही शरीर को हिला रहा हो।

फिर उस्ताद ने कहा, "और तू एक बात जान ले। उस रात के बाद घंटी ने मेरी आवाज़ नहीं पहचानी।"

मैं रुक गया।

"क्या मतलब?"

"मतलब जो है वही।" उस्ताद ने कहा। "उससे पहले हम दोनों घंटी बजाते थे — कभी मैं, कभी इलाही — और वो दो आवाज़ों में जवाब देती थी। सुबह आठ बजे अगर मैं बजाता, तो वो कहती — भईया आया। और अगर इलाही बजाता, तो वो कहती — छोटा आया। यह अंकुश, हमने उसे नाम नहीं सिखाया था। उसे सिर्फ़ यह सिखाया था कि बजाने वाले को पहचानती है।"

मेरे हाथ में घंटी अब भी गरम थी, पर उसका गरम होना अब अलग लग रहा था। जैसे किसी तेज़ बुखार वाले हाथ को छू लिया हो।

"उस रात के बाद," उस्ताद ने कहा, "वो पहले तो बहुत दिन चुप रही। फिर मैंने बजाया। तो सिर्फ़ टन बजी। बस टन। आवाज़ नहीं। मैंने दोबारा बजाया। फिर टन। मैंने हाथ बदला, तरफ़ बदली, उसे चमकाया, तेल लगाया — कुछ नहीं।"

उन्होंने मेरी तरफ़ देखा।

"बाद में, सालों बाद, मैंने सुना कि वो इलाही के पास बजती थी। और बोलती थी। पर मेरी आवाज़ नहीं पहचानती थी।"

फिर उन्होंने वो बात कही जो मुझे आज तक नींद में जगाएगी।

"अंकुश, मैं यह सोचकर डर गया था कि कहीं मेरी आवाज़ ऐसी न हो गई हो कि वो किसी को पहचान ही न सके। पर फिर मैंने समझा — बात आवाज़ की नहीं थी। बात हाथ की थी। जिस हाथ ने उसे बजाया, उस हाथ पर उस रात के बाद एक शब्द का दाग़ था। और घंटी उस दाग़ को पहचानती थी, आवाज़ को नहीं।"

फ़ैज़ ने धीरे से कहा, "इसीलिए दादा ने कहा था कि मैं पत्र लेकर जाऊँ, घंटी लेकर नहीं।"

उस्ताद ने उसे देखा। "क्यों?"

"क्योंकि घंटी आपको नहीं पहचानती।" फ़ैज़ ने कहा। "और दादा कहते थे — जिस घंटी ने पचास साल मेरी आवाज़ नहीं पहचानी, उसके लिए मैं अपना पत्र भेज दूँगा। जो न माने उसे, उसको वो भेजो जो मानेगा।"

उस्ताद ने एक पल सोचा। फिर उनके गले से एक आवाज़ निकली — न हँसी, न रोना, दोनों के बीच का कुछ। "वो तो बहुत बड़ा तत्वज्ञानी हो गया है बूढ़ा होकर। बिस्तर पर पड़ा-पड़ा लोगों के लिए पहेलियाँ बनाता है।"

"और भी बनाता है।" फ़ैज़ ने कहा, और उसकी आवाज़ हल्की थी। "वो कहते हैं कि एक दिन भाई आएगा, और जब आएगा तो पहले मुझसे कहेगा — इलाही, वो डिब्बा मैंने खोला था। और फिर हम दोनों हँसेंगे।"

उस्ताद ने पूछा, "क्यों हँसेंगे?"

"क्योंकि दादा कहते हैं — दोनों को अब तक पता था कि डिब्बा किसने खोला था।"

चबूतरी पर सन्नाटा छा गया।

"क्या मतलब?" मैंने पूछा। और मेरी आवाज़ में वो उत्सुकता थी जो इंसान को सबसे ज़्यादा मुसीबत में डालती है।

फ़ैज़ ने कहा, "दादा कहते हैं — वो डिब्बा उस दिन तीसरी बार खुला था। पहली बार सुबह। दूसरी बार शाम को। और तीसरी बार — उस रात, जिस रात भाई ने पूछा। वो डिब्बा दादा ने ही खोला था।"

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