The Mysterious Bell – Chapter 1264
उन्होंने मेरी तरफ़ देखा, और पहली बार आज उनकी आँखों में गुस्सा नहीं था। सिर्फ़ थकान थी, पचास साल की थकान।
"उस दिन मैंने तुम्हें बताया था, अंकुश। मरम्मत की पाठशाला। दोनों भाई। एक साँचा। दो चीज़ें।" उन्होंने पट्टी वापस फ़ैज़ की तरफ़ नहीं बढ़ाई, अपनी जेब में नहीं रखी — उन्होंने उसे अपनी हथेली पर रखकर अपने सीने के पास उठाया, छोटी सी आवाज़ में कहा, "मैंने यह हिस्सा माँ की सिलाई की पेटी में देखा था।"
और मुझे वो पचास साल पहले वाली बात याद आई, जो उस्ताद ने पीपल के नीचे सबके सामने कही थी — बारह रुपये का हिसाब, भाई का जाना, माँ की पेटी का ताला।
"फ़ैज़।" मैंने कहा। "तेरे दादा ने तुझे और कुछ दिया?"
फ़ैज़ ने अपना हाथ अपने सीने पर रखा।
"चिट्ठियाँ।" उसने कहा। "तेरह चिट्ठियाँ।"
"अभी निकाल।"
"नहीं।" उस्ताद ने कहा।
मैंने उनकी तरफ़ देखा।
"उस्ताद —"
"अभी नहीं, अंकुश।" उन्होंने अपना हाथ उठाया। "मैं पचास साल का भूखा हूँ। और तू मेरे सामने चिट्ठियाँ रख देगा? पहले यह बता —" उन्होंने फ़ैज़ की तरफ़ मुँह किया — "तेरे दादा ने तुझे यह बताया था कि उन्होंने मुझे क्या लिखा?"
"नहीं।"
"क्यों नहीं?"
"क्योंकि उन्होंने कहा —" और यहाँ फ़ैज़ की आवाज़ पहली बार काँपी। वो रुका। उसने चाय का कुल्हड़ उठाया, नहीं पिया, वापस रख दिया। "उन्होंने कहा कि उस्ताद पहले चिट्ठी नहीं सुनेगा। उस्ताद पहले घंटी की आवाज़ सुनेगा।"
मैं जम गया।
और बिल्कुल उसी पल —
मेरी जेब में घंटी बजी।
अपने आप। बिना हाथ लगाए। बिना हिलाए।
पूरी चबूतरी पर सब सुन्न।
और इस बार उसके अंदर से वो दो आवाज़ें आईं — एक ऊपर से, एक नीचे से — पर पहले से साफ़, पहले से पास, जैसे दो लोग एक ही कमरे के दो कोनों से बोल रहे हों और अब उन्होंने एक-दूसरे की तरफ़ मुँह कर लिया हो।
"भाई का हिस्सा लौट आया है।"
उस्ताद ने मेरी जेब की तरफ़ देखा।
फिर फ़ैज़ ने मेरी तरफ़ देखा।
और फिर, उस्ताद को देखे बिना, फ़ैज़ ने अपनी साइकिल का हैंडल उठाया — वो हैंडल जिसके खाली ब्रैकेट में एक चीज़ लटक रही थी — और उसने उसे उस्ताद की तरफ़ बढ़ा दिया।
वो पीतल की चीज़ थी।
और वो उस वक़्त बिना हवा के, बिना हाथ के, हल्की सी घूम गई।
मैंने अपनी जेब में हाथ डाला और घंटी को बाहर निकाला। वो गरम थी, हथेली में जल रही थी, और उसकी सतह पर वो पुराना फूल अब पहले से गहरा दिख रहा था।
उस्ताद ने अपनी आँखें बंद कर लीं।
"पचास साल।" उन्होंने धीरे से कहा। "पचास साल बाद भी यही ज़िद।"
फिर उन्होंने आँखें खोलीं और सीधे फ़ैज़ से कहा —
"चिट्ठियाँ निकाल।"
और फ़ैज़ ने अपने कुर्ते के भीतर से, कमर पर बँधी हुई रस्सी खोली, और एक मोटा कपड़े में लिपटा बंडल निकाला। उसने उसे दोनों हाथों से उस्ताद की तरफ़ बढ़ाया — सिर्फ़ बढ़ाया, उस्ताद की गोद में रखने की हिम्मत नहीं की — और कहा —
"उस्ताद जी, दादा ने कहा था कि आप पहले चिट्ठी नहीं, घंटी की आवाज़ सुनेंगे। वो सुन चुके। अब यह…" उसने बंडल को और आगे किया। "यह तेरह चिट्ठियाँ हैं। और सबसे ऊपर वाली खुली है। उस पर सिर्फ़ एक लाइन है।"
उस्ताद ने बंडल नहीं लिया।
"क्या लिखा है?"
फ़ैज़ ने अपनी आवाज़ को सँभाला, और उसने वो लाइन पढ़ी, बिना काग़ज़ खोले, याद से, जैसे उसने उसे रट लिया हो —
"भाई, बारह रुपये अब भी बाकी हैं। पर अब मैं उन्हें पैसों से नहीं चुका सकता। तू मुझे माफ़ करके चुका दे।"
चबूतरी पर कोई नहीं बोला।
पीपल में एक पत्ता हिला, पर हवा नहीं थी — जैसे पेड़ खुद हिल गया हो।
और उस्ताद का हाथ, जो अब तक उनकी गोद में स्थिर था, धीरे-धीरे उठा, काँपता हुआ, उस कपड़े के बंडल की तरफ़ बढ़ा।
और जैसे ही उनकी उँगलियों ने उस कपड़े को छुआ, मेरी जेब की घंटी ने एक बार — बस एक बार — बहुत धीमी, बहुत छोटी आवाज़ में कहा —
"शुरू।"
मैंने घंटी को कसकर पकड़ा और मैंने साँस रोक ली।
क्योंकि मुझे पता था — अब जो होगा, वो सिर्फ़ दो भाइयों की चिट्ठियों का मामला नहीं।
अब यह उस गली के हर टूटे हुए हिसाब का मामला था, जिसे पचास साल से कोई नहीं देख रहा था।
और पीपल के दूसरी तरफ़, नाली के पार, छतों के पीछे, सफ़ेद गाड़ी की छत पर एक काली अंगूठी वाला हाथ रखा हुआ था — मैंने उसे सिर्फ़ एक पल को देखा, दूर, दो खिड़कियों के बीच, और फिर वो हट गया।
पर उस एक पल में भी मैंने यह समझ लिया कि आज शाम इस गली में हम अकेले नहीं हैं।
और उस्ताद ने बंडल खोलना शुरू कर दिया।
॥
उस्ताद की उँगलियाँ उस कपड़े की गाँठ पर रुक गईं।
न खोलीं, न हटीं। बस रुक गईं। जैसे गाँठ से भी उन्होंने कुछ पूछ लिया हो और गाँठ चुप हो।
चबूतरी पर कोई नहीं हिला। शबनम आपा के हाथ में सात कुल्हड़ थे, पर उन्होंने एक भी नीचे नहीं रखा — हवा में पकड़े खड़ी रहीं, जैसे कुल्हड़ गरम हों और उनके हाथ ठंडे न हों।
फ़ैज़ ने धीरे से कहा, "उस्ताद जी, गाँठ ऊपर से है। नीचे से खुलेगी।"
उस्ताद ने उसकी तरफ़ देखा। फिर देखा अपने हाथों को। फिर बोले, "पता है। मैंने ही बाँधी थी।"
ये सुनकर मेरे पेट में कुछ ठंडा सा उतर गया।
मतलब बंडल उन्होंने ही बाँधा था। पचास साल पहले। और वो बंडल पचास साल इलाही के पास रहा — बिना खुले।
उस्ताद ने बंडल उलटा किया और नीचे की गाँठ खोली। कपड़ा खुला तो एक गंध उठी — पुरानी स्याही, सूखी धूल, और कुछ ऐसा जो कपूर जैसा था, पर कपूर से ज़्यादा भारी। जैसे किसी पुराने संदूक का दरवाज़ा खुला हो, जिसमें सिर्फ़ कपड़े नहीं, कुछ और भी रखा गया हो।
तेरह चिट्ठियाँ थीं। सब पीली। सब एक ही आकार की। कोनों से थोड़ी टेढ़ी, जैसे लिखने वाले का हाथ काँपता रहा हो।
सबसे ऊपर वाली चिट्ठी खुली थी। एक लाइन। और उसके नीचे, बहुत नीचे, एक तारीख़ — कोई तारीख़ नहीं, सिर्फ़ एक लकीर। जैसे लिखते-लिखते हाथ रुक गया हो और वो उसे पूरा करना ही न चाहे।
उस्ताद ने वो चिट्ठी उठाई।
फिर उन्होंने चारों तरफ़ देखा।
बच्चे चबूतरी के किनारे बैठे थे — सानिया, गुड्डू, रफ़ीक़, चिंटू। चारों के हाथ गोद में, आँखें बड़ी। शबनम आपा खड़ी थीं। मीरा का कैमरा बंद था, थैले में, पर मैंने देखा कि उसकी उँगलियाँ उस थैले के ऊपर थीं, जैसे अंदर से कैमरा खुद बाहर आने की ज़िद कर रहा हो और वो उसे रोक रही हो।
पापा एक कोने में बैठे थे। काजल उनके पास। और मैं — मैं बीच में, जहाँ ज़मीन पर एक ईंट का निशान था, जिस पर मैंने बैठने की आदत डाल ली थी, क्योंकि उस जगह से पूरा पीपल दिखता था और पूरी चबूतरी भी।
उस्ताद ने चिट्ठी खोली।
और पढ़ी।
धीरे। बहुत धीरे। जैसे हर अक्षर उनके मुँह से निकलने के लिए लड़ रहा हो।
"भाई, बारह रुपये अब भी बाकी हैं। पर अब मैं उन्हें पैसों से नहीं चुका सकता। तू मुझे माफ़ करके चुका दे।"
रुके।
फिर आगे पढ़ा।
"वो रात मैंने डिब्बा खोला, यह सच है। पर पैसे मैंने नहीं लिए। तूने पूछा भी नहीं कि मैंने क्यों खोला। तूने सिर्फ़ यह कहा — तूने लिए। बस इतना ही। और मैं चला गया।"
उस्ताद ने चिट्ठी नीचे कर दी।
फिर वो कुछ देर चुप बैठे। उनकी दाढ़ी में हवा नहीं थी, फिर भी हिल रही थी — जैसे साँस अंदर जा रही हो और बाहर न आ रही हो।
मैंने बीच में नहीं टोका। कभी नहीं टोकना चाहिए, जब कोई आदमी पचास साल पुरानी चीज़ अपने सामने खोल रहा हो। वो उस वक़्त अकेले होता है, चाहे चारों तरफ़ सौ लोग बैठे हों।
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