The Mysterious Bell1263 / 1504

The Mysterious Bell – Chapter 1263

7 min read November 5, 2026

और मैंने देखा कि उनका हाथ उस कुर्ते की तरफ़ बढ़ा। धीरे। काँपता हुआ। और फिर उन्होंने अपना हाथ वापस खींच लिया।

"बहुत पुराना है।" उन्होंने कहा। आवाज़ भारी थी। "पचास साल में कपड़ा बदल जाता है।"

"बदला नहीं।" फ़ैज़ ने कहा। "दादा ने कभी बदला नहीं। उन्होंने इसे धोया, पैबंद पर पैबंद लगाया, पर पहना नहीं। कहते थे — यह मेरा नहीं, मेरे भाई का है। जिस दिन वो खुद पहनेंगे।"

अब उस्ताद की आँखें भीग गईं, पर उन्होंने आँसू को गिरने नहीं दिया। बूढ़े आदमी रोते नहीं, वो पत्थर की तरह चुप हो जाते हैं, और वही चुप्पी उनके आँसू को बहने से रोक देती है।

"चल।" उन्होंने कहा। "पीपल के नीचे।"

हम चले।

उस्ताद आगे, फ़ैज़ पीछे — साइकिल उसके साथ — और मैं सबसे पीछे।

जब फ़ैज़ ने साइकिल संभाली और उसका पहिया घूमा, उस पहिये से एक आवाज़ आई जो मैं जानता हूँ। बॉल बियरिंग की चरचर। वही आवाज़ जिसे मैंने पहली रात भूत समझा था।

और हैंडल के उस खाली ब्रैकेट में जो लटक रहा था, वो मेरी आँखों में एक पल के लिए बजा।

नहीं। बजा नहीं।

हिला।

बस हिला, जैसे हवा से।

पर उस वक़्त गली में हवा नहीं थी। मैंने पीपल के पत्ते देखे थे। वो स्थिर थे।

मैंने अपनी जेब में हाथ डाला। घंटी गरम थी।

और मैंने जेब के तले में वो ताला टटोला, जो उस्ताद ने दिया था।

वो ठंडा था।

बिल्कुल ठंडा।

अच्छा है, मैंने मन में कहा। अच्छा है। कोई जल्दी नहीं। कोई शॉर्टकट नहीं।

पीपल के नीचे पहुँचते-पहुँचते आधी गली आ गई थी।

बंसी बाबा चबूतरी के एक कोने से उठकर खड़े हो गए थे। रहमत बाबा ने उन्हें अपने साथ बैठा लिया, जैसे कह रहे हों — फ़िलहाल बैठो, बात अभी शुरू नहीं हुई। शबनम आपा गुमटी से एक ट्रे उठाकर ले आईं — बिना किसी ने पूछे — सात कुल्हड़, गरम चाय।

"बैठो।" उन्होंने फ़ैज़ से कहा, बिल्कुल ऐसे जैसे कोई पुराना रिश्तेदार आया हो। "सफ़र में हो। और सफ़र में चाय के बिना बात नहीं टलती।"

फ़ैज़ ने उनकी तरफ़ देखा। पहली बार किसी ने उससे ऐसे बात की थी जैसे वो दुश्मन का पोता नहीं, किसी की गली का मेहमान हो।

"बैठिए।" मैंने भी कहा। और फिर मैंने चबूतरी के किनारे को झाड़कर उस्ताद के बगल वाली जगह खाली की। "उस्ताद, आप यहाँ। फ़ैज़ भाई, आप सामने।"

"भाई मत कह।" फ़ैज़ ने धीरे से कहा। "अभी नहीं।"

मैं रुक गया।

"ठीक है।" मैंने कहा। "फ़ैज़ साहब। फ़िलहाल यही।"

वो बैठा।

और उसने साइकिल अपने साथ ली — उसे दूर नहीं खड़ा किया, न पीपल से बाँधा। उसका साइकिल उसके घुटनों से सटाकर रहा, क्योंकि हैंडल पर कुछ लटक रहा था और वो उसे अकेला नहीं छोड़ना चाहता था।

मीरा आई।

वो गुमटी के पीछे से निकली, कैमरा लटकाए, बाल सँभालती हुई। उसने एक नज़र गली के मुँह पर डाली, एक नज़र फ़ैज़ पर, एक नज़र मेरे चेहरे पर — और बिना कुछ पूछे उसने अपना कैमरा बैग से निकालकर पीपल की जड़ पर रख दिया, बंद करके।

मैंने उसकी तरफ़ देखा।

"बाद में।" उसने धीरे से कहा। "पहले यह।"

बच्चे भी आ गए। गुड्डू पहले, फिर सानिया, फिर चिंटू जो अब भी दौड़ता हुआ आया, और अंत में रफ़ीक़। टिंकू उनसे पीछे रहा — अभी वो राँची से लौटा नहीं था, यह मुझे याद आया, और याद आते ही मेरे सीने में कुछ हिला। कल सुबह की गाड़ी। कल सुबह का फ़ॉर्म।

पर आज शाम यहाँ टिंकू की कुर्सी खाली थी, और मैंने उस खाली जगह पर नज़र नहीं जाने दी।

सानिया ने फ़ैज़ के जूते देखे, फिर उसके हाथ देखे, फिर मेरे हाथ देखे और उसने कुछ नहीं कहा। पर मैंने उसके चेहरे पर वो गुज़रते हुए भाव देखे जो बच्चों के चेहरे पर तब आते हैं जब वो कोई ऐसी चीज़ पकड़ लें जिसे बड़े नहीं देख पाते।

फिर मेरे पीछे से पापा की आवाज़ आई।

"अंकुश।"

वो चबूतरी के पास खड़े थे, हाथ में एक छोटी पोटली दबाए। माँ भेज रही होंगी। काजल उनके पीछे थी।

पापा ने फ़ैज़ को देखा। और मैंने पापा के चेहरे पर कुछ देखा — पहचान नहीं, पर उसका साया। जैसे उन्होंने इन आँखों को कहीं देखा हो, किसी और चेहरे पर, बहुत पहले।

पापा बिना कुछ बोले चबूतरी के किनारे बैठ गए। जब पापा चुप रहकर किसी के पास बैठते हैं, तो उनका बैठना ही बात होती है।

और फिर उस्ताद ने बात शुरू की।

"फ़ैज़।" उन्होंने नाम ऐसे लिया जैसे जाँच रहे हों कि ज़ुबान पर वो नाम बैठता है या नहीं। "तू मुझे यह बता — तेरे दादा ने तुझे यहाँ भेजने के लिए क्या कहा?"

फ़ैज़ ने अपने घुटनों पर हाथ रखा।

"दादा ने कहा — उस्ताद के पास जाना। उसकी दुकान के सामने रुकना। अंदर जाने से पहले रुकना। और जब वो पूछे कि तू कौन है, तो बताना।"

"और?"

"और दादा ने कहा — वो मुझे गाली देगा।" फ़ैज़ ने एक पल रुका। "उसने कहा कि वो गाली देगा, और तू नहीं बोलेगा। तू बस सुनता रहेगा। और जब वो अपनी सारी गालियाँ खत्म कर ले, तब तू कहेगा — 'उस्ताद जी, चाय ठंडी हो रही है।'"

चबूतरी पर एक पल पूरी चुप्पी छा गई।

और फिर शबनम आपा की हँसी आई, वो छोटी, अधूरी, अपने आप रुक जाने वाली हँसी। उन्होंने अपना सातवाँ कुल्हड़ ट्रे से उठाकर सामने रख दिया, जैसे डील पूरी हो गई हो।

"उस्ताद।" शबनम ने कहा। "इलाही तुम्हें भी जानता है।"

उस्ताद ने शबनम की तरफ़ देखा। उनके चेहरे पर कुछ नरम पड़ा, फिर फिर कसा।

"जानता है, तो आया क्यों नहीं?"

"दादा चल नहीं सकते।" फ़ैज़ की आवाज़ में इस बार वही लगातार थी जो लड़का मुँह से निकलते ही उसे तोड़ देता है। "उस्ताद जी, मैं झूठ नहीं बोल रहा। आप मेरे हाथ देखिए। ये साइकिल ठीक करने के हाथ हैं। मैंने आठ साल अपनी दुकान खोली नहीं। आठ साल मैं दादा के बिस्तर के पास सीकर में बैठा रहा। मैं उनका पैर दबाता हूँ, उन्हें खाते वक़्त उठाता हूँ, उनके पीछे हजामत बनाता हूँ…" उसकी आवाज़ भर आई। "और मैं आपसे यह नहीं कहूँगा कि मैंने किया है, क्योंकि मैंने वही किया जो बेटा करता है। पोता करता है। पर उस्ताद जी, उनकी आँखों में उनका भाई अब भी शाम को आता है। वो सोते वक़्त मुँह से कोई नाम लेते हैं और पहली चिट्ठी मेरे ही नाम से नहीं, आपके नाम से लिखवाते हैं।"

उस्ताद ने कुछ नहीं कहा।

"वो हर साल एक चिट्ठी लिखते थे।" फ़ैज़ ने कहा। "हर साल। तेरह चिट्ठियाँ।"

मैंने उस्ताद की उँगलियाँ देखीं। वो कस गईं।

"तेरह?" उनकी आवाज़ फटी। "तेरह चिट्ठियाँ लिखीं और एक भी…"

"एक भी नहीं भेजी।" फ़ैज़ ने सिर झुकाया। "यह मैं आपसे छिपाऊँगा नहीं। मैंने उन चिट्ठियों को डाक में डालने के लिए दो बार लिया। दोनों बार दादा ने रात में मुझे उठाया और कहा — वापस ले आ। बैठा हूँ। मैंने पूछा कि क्यों, तो वो कुछ नहीं बोले। बस खिड़की से बाहर देखते रहे।"

"फिर आज क्यों भेज रहा है?" उस्ताद ने पूछा। "आज, पचास साल बाद?"

फ़ैज़ ने अपनी जेब में हाथ डाला और वहाँ से एक छोटी मुड़ी हुई सीधी तीलियों वाली शीशे की पट्टी निकाली — पतली, पुरानी, जिसके एक सिरे पर धातु का फ्रेम टूटा हुआ था।

"यह उनके तकिये के नीचे था।" उसने कहा। "एक हफ़्ते पहले। मैंने पूछा कि यह क्या है, तो उन्होंने कहा — इसके दो हिस्से हैं। एक हिस्सा मेरे सीने में है, एक उनके भाई के सीने में। और उन्होंने कहा — जब तक दोनों नहीं मिलते, याद पूरी नहीं होती।"

उस्ताद ने वो पट्टी ली।

और जब उन्होंने उसे उलटा किया, मैंने उनका हाथ रुकते देखा।

"यह…" उस्ताद की आवाज़ चली गई। "यह उसी साँचे का है।"

मैंने तुरंत पूछा, "किस साँचे का, उस्ताद?"

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