The Mysterious Bell – Chapter 1262
मैंने घंटी को जेब में डाला और मैं दौड़ा।
दुकान के भीतर आते वक़्त मेरा पैर ट्रंक से टकराया, औज़ारों की पेटी हिली, कोई पेंच ज़मीन पर गिरा और लुढ़कता हुआ गया, पर मैंने रुककर उसे उठाया भी नहीं। मैंने सीधे उस्ताद की मशीन के पास जाकर अपना हाथ उसकी मेज़ पर रखा और मैंने कहा —
"उस्ताद। तुम्हारा भाई आ गया।"
मशीन रुक गई।
न टिक, न टक। सिर्फ़ सुई के नीचे दबा हुआ कपड़ा, और उस्ताद की उँगली, जो सुई के ऊपर हवा में रुकी हुई थी, जैसे किसी ने वक़्त को ही पकड़ लिया हो।
उस्ताद ने अपनी मोटी चश्मे की डंडी छुई। फिर उतारी। फिर मेज़ पर रखी।
और मैंने देखा कि उनके हाथ काँप रहे हैं। उस्ताद अली बक्श के हाथ। जो पचास साल से सुई चलाते आए हैं और जिनकी सुई कभी नहीं काँपी।
"क्या बोला तूने?" उन्होंने पूछा। आवाज़ सूखी थी, जैसे किसी ने गले से ही काग़ज़ निकाल लिया हो।
"गली के मुँह पर साइकिल से उतरा है। पुराना कुर्ता पहने है। हाथ में कुछ पीतल जैसा है। और साइकिल के हैंडल पर…" मैं रुका। "हैंडल पर खाली ब्रैकेट है, उस्ताद। और उसमें कुछ लटक रहा है।"
उस्ताद उठे।
धीरे। बहुत धीरे। जैसे उनके घुटने उनसे पूछ रहे हों कि इतने साल बाद इस वक़्त खड़े होने की इजाज़त है या नहीं।
उन्होंने अपनी मेज़ से लाठी उठाई, फिर लाठी वापस रख दी। जैसे कह रहे हों — आज नहीं। आज मैं खुद चलूँगा।
और वो बाहर आए।
गली में शाम की आख़िरी रोशनी थी। पीपल की छाया लंबी होकर नाली के पुल तक आ गई थी, और उस छाया में, गली के मुँह पर, वो खड़ा था।
धूल भरे जूते। मुड़ी हुई पतलून। कुर्ता ढीला, बहुत ढीला — किसी बड़े कद के आदमी का कुर्ता, जो इस लड़के के कंधों पर बैठा नहीं, लटक रहा था। कुर्ते के कोने पर एक पैबंद था, हाथ से लगाया हुआ, टेढ़ा। और उस कुर्ते से एक गंध आ रही थी — न साबुन की, न धूप की — कुछ और। पुरानी अलमारी की गंध। नीम के पत्तों की गंध।
लड़का पच्चीस-छब्बीस का रहेगा। दुबला। आँखें उतरी हुईं, जैसे कई रातें सफ़र में काटी हों। होंठ सूखे। और उसके हाथ — उसके हाथों पर ग्रीस के निशान थे।
मैंने अपने हाथ देखे। मेरे हाथ पर भी वही निशान थे।
वो गली में नहीं आया। वो ठीक उस लकीर पर खड़ा रहा जहाँ गली शुरू होती है — जैसे किसी ने उससे कह रखा हो कि पहले इजाज़त, फिर कदम।
उस्ताद उसके सामने जाकर रुके। तीन कदम पहले।
"तू कौन है?" उस्ताद की आवाज़ में वो कड़कपन था जो पचास साल की चुप्पी से आता है।
लड़के ने साइकिल का हैंडल छोड़ा। उसने दोनों हाथ जोड़े — ऐसे जोड़े जैसे किसी को मंदिर में नहीं, किसी बुज़ुर्ग के सामने खड़े होकर जोड़ते हैं, कमर से थोड़ा झुककर।
"मैं फ़ैज़ बक्श हूँ। इलाही बक्श का पोता।"
गली में हवा रुक गई।
मैंने उस्ताद का चेहरा देखा। और मुझे लगा कि मैंने उनके चेहरे पर एक साथ दो चीज़ें होते देखीं — पहले कुछ टूटा, फिर वो टूटा हुआ कठोर हो गया।
"इलाही का पोता।" उस्ताद ने शब्द मुँह में घुमाकर, तोलकर कहे, जैसे कोई पुराना सिक्का हो जिसका असली वज़न पता करना हो। फिर उनकी आवाज़ उठी। "और इलाही? इलाही खुद क्यों नहीं आया?"
फ़ैज़ ने नज़र नहीं चुराई। उसने वहीं, उसी जगह खड़े रहकर कहा, "दादा चल नहीं सकते।"
"क्या?"
"दो साल से बिस्तर पर हैं। कमर से नीचे…" फ़ैज़ ने अपनी जाँघ की तरफ़ देखा, जैसे वहीं जवाब लिखा हो। "कमर से नीचे कुछ नहीं चलता। हाथ हिलते हैं, ज़ुबान चलती है, याद पूरी है। पर पैर…" उसने साँस ली। "पैर उनके साथ नहीं गए, उस्ताद जी।"
उस्ताद कुछ नहीं बोले।
बहुत देर तक कुछ नहीं बोले।
और मैं वहीं खड़ा सोच रहा था कि मैंने क्या कर दिया। मैंने एक बूढ़े आदमी के सामने पचास साल पुराना दरवाज़ा खोल दिया, बिना यह जाने कि उसके पीछे हवा है या दीवार।
"उसने तुझे भेजा?" उस्ताद ने पूछा।
"नहीं। मैं खुद आया।"
"खुद आया।" उस्ताद की आवाज़ में वो हँसी आई जो हँसी नहीं होती, बस ज़ुबान का कड़वा मुड़ना होता है। "पचास साल में इलाही ने एक चिट्ठी नहीं भेजी। एक खबर नहीं भेजी। मैंने उसे हर किसी से पूछा — पुराने बाज़ार में, बिजलीघर की गली में, उसकी दुकान के पत्थर तक से। सबने कहा — गया। मर गया। और आज उसका पोता मेरे सामने खड़ा है और कहता है कि वो बिस्तर पर है।" उन्होंने अपनी मुट्ठी बंद की। "तो उसे मेरे पास खबर भेजने के लिए पचास साल चाहिए थे?"
फ़ैज़ ने सिर झुका लिया।
और मैंने देखा — उसके हाथ में जो पीतल की चीज़ थी, वो उसने अब भी ऊपर नहीं उठाई। वो उसे अपनी हथेली में दबाए खड़ा था, जैसे कोई बच्चा चिड़िया पकड़े खड़ा हो और डरे कि खुली हथेली में वो उड़ न जाए।
"उस्ताद।" मैंने धीरे से कहा। "उस्ताद, पहले पीपल के नीचे बैठिए।"
"मैं नहीं बैठूँगा।"
"उस्ताद —"
"मैं नहीं बैठूँगा, अंकुश।" उन्होंने मेरी तरफ़ देखा, और उनकी आँखों में वो सब था जो पचास साल से जमा था — बारह रुपये, एक जली हुई दुकान, एक माँ की सिलाई की पेटी, एक टूटा हुआ ताला और एक भाई जो एक रात गायब हो गया था। "जिस आदमी ने मेरी माँ के जाने के दिन मुँह नहीं दिखाया, उसका पोता मेरे यहाँ खड़ा है और मैं यह भी नहीं जानता कि ये सच कह रहा है या कहानी।"
फ़ैज़ ने सिर उठाया।
"उस्ताद जी, मैं कहानी नहीं लाया हूँ।" उसकी आवाज़ पहली बार कसी। "कहानी दादा ने पचास साल पहले छोड़ दी थी। मैं वो लाया हूँ जो वो खुद नहीं ला सके।"
और तभी —
दरवाज़ों के पीछे से आवाज़ें आने लगीं।
मैंने बिना मुड़े सुना। शबनम आपा की गुमटी का चूल्हा बंद हो गया — जिसकी आवाज़ मैं बरसों से सुनता आया हूँ, वो छन-छन अचानक चुप हो गई। उस्ताद की दुकान के बगल से कोई अपना शटर उठा रहा था, आधा, फिर रोक दिया। नाली के पुल पर दो साए आकर खड़े हो गए।
पीपल की चबूतरी से बंसी बाबा की खाँसी आई। फिर रहमत बाबा की लाठी की टक-टक।
गली सुन रही थी।
और मुझे पता था कि आज शाम इस गली में जो कुछ होगा, वो सिर्फ़ उस्ताद की दुकान का मामला नहीं रहेगा। वो सबका मामला बन जाएगा।
"उस्ताद जी।" मैंने उनके कंधे के पास जाकर कहा, इतना धीरे कि सिर्फ़ वो सुनें। "मैं आपसे कुछ नहीं कहूँगा। न सही, न ग़लत। बस याद रखिए — वो लड़का अभी भी गली में नहीं आया है। वो उस लकीर पर खड़ा है। तीन कदम बाहर। मैंने उसे अंदर नहीं आने दिया।"
उस्ताद ने मेरी तरफ़ देखा।
"तूने?"
"मैंने।" मैंने कहा। "क्योंकि यह गली आपकी है, उस्ताद। मेरी नहीं। और जो भी आज यहाँ बोलेगा, वो पीपल के नीचे बोलेगा, खड़े-खड़े नहीं।"
उस्ताद की आँखें थोड़ी सिकुड़ीं। फिर उन्होंने एक लंबी साँस ली — वो साँस जो आदमी तब लेता है जब उसे लगता है कि उसके पैर अब भी उसके साथ हैं।
"ठीक है।" उन्होंने कहा। "पीपल के नीचे।"
और वो मुड़े।
पर तभी फ़ैज़ ने कुछ कहा, और उसकी आवाज़ में पहली बार थोड़ी जल्दी आई —
"उस्ताद जी, एक बात। दादा ने कहा था कि मैं पहले कुर्ता दिखाऊँ, फिर बोलूँ।"
उस्ताद रुके।
"कुर्ता?"
"यह।" फ़ैज़ ने अपने ढीले कुर्ते के पल्ले को हल्का उठाया। "यह दादा का है। उन्होंने पचास साल पहले सिलवाया था। उसी दिन, जिस दिन उन्होंने पहली बार दुकान खोली थी। और उन्होंने कहा — जब भी उस्ताद के सामने जाना, यह पहनकर जाना। वो पहले कुर्ता पहचानेगा, फिर मुझे।"
उस्ताद वहीं जम गए।
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