The Mysterious Bell – Chapter 1260
पापा ने काग़ज़ देखा और उनका चेहरा वैसा हो गया जैसा तब होता है जब कोई अपने ही घर के दरवाज़े की चाबी किसी और की जेब में देख ले।
"मंसूर," उन्होंने धीरे से कहा। "वो ताले वाला।"
"कौन?"
"पुराने बाज़ार का ताले-चाबी बनाने वाला।" पापा ने कहा। "बाबा का दोस्त। मैंने उसके हाथ में एक बार चाबी का गुच्छा देखा था, बचपन में। बाबा के साथ गया था। वो बूढ़ा चाबी के बदले पैसा नहीं लेता था, कहानी लेता था।"
"अब कहाँ है?"
"पता नहीं," पापा ने कहा। "बाबा के जाने के बाद कभी नाम नहीं सुना।"
मैंने काग़ज़ मेज़ पर रख दिया और उसे देखता रहा।
तभी दुकान के बाहर किसी ने खाँसा।
मैं मुड़ा — उस्ताद खड़े थे, हाथ में चाय का गिलास, और उनके पीछे सफ़ेद कपड़े में लिपटा कुछ।
"अंदर आ जाओ," मैंने कहा।
उस्ताद ने गिलास मेज़ पर रखा और उस सफ़ेद कपड़े को खोला।
उनकी सिलाई मशीन थी। वही पुरानी, काली, सुनहरे फूलों वाली।
"आज इसे दुकान पर रखूँगा," उन्होंने कहा। "फिर से।"
"कपड़ा?"
"कपड़ा हटा दिया," उस्ताद ने कहा। "अब कभी नहीं ओढ़ाऊँगा। जो सच एक बार बाहर आ जाए, उसे कपड़े से नहीं ढका जा सकता। बस इतना है कि उसे ढकने की कोशिश में हम खुद कपड़े के नीचे आ जाते हैं।"
उन्होंने मशीन मेज़ पर रखी और उसे सहलाया।
"आज सुबह," उस्ताद ने कहा, "मैंने इसे घर से निकाला, तो मेरी बीवी ने पूछा — कब तक छुपाओगे? मैंने कहा, अब नहीं छुपाऊँगा। उसने कहा, तो जल्दी करो।"
मशीन टिक करके रुक गई। अपने आप।
उस्ताद ने उसे देखा और कुछ नहीं बोले।
फिर बाहर पैरों की आवाज़ आई और मीरा अंदर घुसी। उसके हाथ में एक मोटा लिफ़ाफ़ा था। काग़ज़ का, बड़ा।
"तस्वीर की बड़ी नक़ल," उसने कहा। "रात दो बजे तक एक भाई की दुकान खुली थी, उसी से बनवाई।"
उसने लिफ़ाफ़े से एक बड़ी काली-सफ़ेद तस्वीर निकाली और मेज़ पर रखी।
वही तस्वीर। जो रिकॉर्ड कमरे में मिली थी। जिसमें तीन आदमी थे, और तीसरे को काट दिया गया था।
अब बड़ी तस्वीर में कटा हुआ तीसरा आदमी और साफ़ दिख रहा था। उसका कंधा, उसकी बाँह का हिस्सा, और नीचे एक कोना — जो कटने से बच गया था। नीचे दाहिनी तरफ़ किसी के जूते की नोक।
पापा ने तस्वीर देखी और उनका हाथ मेज़ पर रखे गिलास पर जाकर रुक गया।
"यह तस्वीर," उन्होंने धीरे से कहा, "उसी फ़ोटोग्राफ़र की है।"
"कौन?"
"जो बीस साल पहले नगर निगम के काग़ज़ों वाले कमरे में आता था," पापा ने कहा। "मैं तब वहाँ जाता था। बाबा के काग़ज़ों के सिलसिले में। वो आदमी बिना बोले अंदर जाता, तस्वीरें खींचता, और बाहर चला जाता। किसी ने उसका नाम नहीं पूछा। किसी ने उसे रोका नहीं।"
उन्होंने तस्वीर के उस कटे कोने की तरफ़ उँगली बढ़ाई।
"अगर यह तस्वीर उस फ़ोटोग्राफ़र ने खींची," पापा ने कहा, "तो इसकी एक और कॉपी उसके पास थी। और अगर उसकी एक और कॉपी उसके पास थी, तो उसे रिकॉर्ड कमरे में रखने वाले ने नहीं, उस आदमी ने दी थी।"
मीरा ने अपनी कॉपी खोली।
"यानी," उसने कहा, "तस्वीर किसी तीसरे आदमी के पास भी है। और वो तीसरा आदमी उसे रिकॉर्ड कमरे में ले गया।"
उस्ताद ने तस्वीर को हाथ में उठाया। उन्होंने उसे बहुत देर देखा, फिर उसे वापस मेज़ पर रख दिया।
"यह घर की दीवार है," उन्होंने कहा। "देखो — पीछे जो लकीरें हैं, ये उस पुराने कमरे की दीवार हैं, जहाँ मेरे भाई और मैंने पहली बार घंटी खोली थी। मुझे वो कमरा याद है। वहाँ एक खिड़की थी और खिड़की पर जंग लगी जाली। और इस तस्वीर में… यही जाली है।"
उन्होंने आँखें बंद कर लीं।
"बीस साल पहले," उन्होंने कहा, "मैं उस कमरे में आख़िरी बार गया था। मेरे भाई के जाने के बाद। मैंने वहाँ कुछ नहीं ढूँढा। मैंने बस दरवाज़ा बंद किया और चला आया।"
"उस कमरे को अब कौन जानता है?"
"मैं," उस्ताद ने कहा। "और जो वहाँ आख़िरी बार था।"
तभी दरवाज़े पर टिंकू की आवाज़ आई।
"उस्ताद!"
वो अंदर आया, पीछे सानिया, गुड्डू, रफ़ीक़ और चिंटू। सब हाँफ रहे थे।
"क्या हुआ?"
"हमने पूछा," सानिया ने कहा। "बूढ़ी दाई से। जो गली के मोड़ पर रहती है, जो हमें रोज़ शाम बतियाती है। उससे पूछा कि कोई फ़ोटोग्राफ़र जानता है क्या, जो पुराने बाज़ार में काम करता था?"
"और?"
वो रुकी। फिर बोली —
"उसका नाम गफ़ूर था।"
मैंने पापा की तरफ़ देखा।
"बूढ़ी दाई कहती है," सानिया ने कहा, "कि गफ़ूर मरने से पहले बहुत बीमार था। आँखें चली गई थीं। पर जब वो मरने वाला था, तब भी उसके पास एक सफ़ेद लिफ़ाफ़ा था। कोई उसे लेने आया था, एक साहब। सफ़ेद कुर्ता। काली अंगूठी। बूढ़ी दाई ने कहा — गफ़ूर ने वो लिफ़ाफ़ा उसी को दिया और फिर चुप हो गया।"
कमरे में सन्नाटा छा गया।
मैंने मीरा की तरफ़ देखा। उसका चेहरा सफ़ेद पड़ गया था।
"काली अंगूठी," उसने कहा। "यानी चंद्रेश सक्सेना।"
"या रणवीर," मैंने कहा।
"नहीं," मीरा ने कहा। "बूढ़ी दाई ने सफ़ेद कुर्ता और काली अंगूठी दोनों कहे। रणवीर कभी काली अंगूठी नहीं पहनता — उसके हाथ में सिर्फ़ धागा होता है। काली अंगूठी सिर्फ़ चंद्रेश पहनता है और… और वो सफ़ेद कुर्ते वाला है जो अक्सर आता-जाता दिखता है।"
उस्ताद ने मशीन का हैंडल पकड़ लिया।
"मेरा भाई," उन्होंने धीरे से कहा। "मेरे भाई का पेचकस भी तो किसी को देना था। क्या गफ़ूर ने भी कुछ ऐसा ही किया?"
"गफ़ूर ने लिफ़ाफ़ा दिया," मैंने कहा। "पर वो किसे दिया, और उसमें क्या था — यह कोई नहीं जानता।"
तभी बबलू की आवाज़ आई, दरवाज़े से।
"क्या बात कर रहे हो सब?" वो अंदर आया, आज गले में चेन नहीं थी, पानदान नहीं था, सिर्फ़ एक साधारण कुर्ता और मुँह पर बिना पान का निशान।
उसने सबको देखा। फिर मेरी तरफ़ देखा।
"क्या हुआ? ऐसे क्यों देख रहे हो?"
"बबलू," मैंने कहा। "तुमने साहब की गाड़ी के पिछले हिस्से में सफ़ेद फाइल देखी थी ना?"
उसका चेहरा बदला।
"हाँ।"
"उसमें क्या हो सकता है?"
वो एक पल रुका। फिर बैठ गया, बिना पूछे, बेंच पर।
"मैंने उसे कभी खोला नहीं," उसने कहा। "पर एक बार… एक बार गाड़ी धोने वाला लड़का आया था। उसने सीट साफ़ करते वक़्त फाइल को हटाया था। उसने मुझसे कहा था कि साहब ने डाँट लगाई थी — 'उसे छूना मत।'"
"और?"
"और उस दिन," बबलू ने कहा, "मैंने फाइल के बाहर कुछ देखा था। एक सफ़ेद लिफ़ाफ़े का कोना। बाहर निकला हुआ। जैसे जान-बूझकर उसमें रखा गया हो, फिर से बंद न किया गया हो।"
उसने मेरी तरफ़ देखा।
"अंकुश भाई," उसने कहा। "अगर वो सफ़ेद लिफ़ाफ़ा उसी गफ़ूर का है… तो साहब के पास हमारे पास से ज़्यादा काग़ज़ हैं। और वो हमसे पहले वो काग़ज़ पढ़ चुके हैं।"
"और अगर वो पढ़ चुके हैं," मीरा ने कहा, "तो वो उस काग़ज़ के हिसाब से ही हमें पीछे धकेल रहे हैं।"
कमरे में फिर सन्नाटा छा गया।
फिर उस्ताद उठे।
"पीपल के नीचे चलो," उन्होंने कहा। "अभी। सबको।"
"अभी?" मैंने कहा।
"अभी," उस्ताद ने कहा। "क्योंकि कल सुबह की बात मैं आज करूँगा। कल सुबह वो सबके सामने खोलूँगा — पर आज इस गली को पता होना चाहिए कि कल क्या खुलेगा। अगर वो नहीं जानेंगे, तो कल जब मैं पेचकस खोलूँगा, उन्हें लगेगा कि मैं कुछ छुपा रहा था।"
हम सब पीपल के नीचे पहुँचे।
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