The Mysterious Bell – Chapter 1259
"एक बार," बबलू ने कहा। "गलती से। और उस रात मुझे बुखार आ गया।"
मैंने अपनी कॉपी निकाली।
और उसमें उस रात की पहली लाइन लिखी — "पचास साल का झगड़ा बारह रुपये का था। और उसका सवाल एक नज़र का था।"
फिर मैंने नीचे लिखा — "कल सुबह पीपल के नीचे। सब कुछ।"
मीरा मेरे पीछे आई और उसने कंधे के ऊपर से पढ़ा।
"सब कुछ?" उसने कहा।
"सब कुछ," मैंने कहा। "छिपाने से अब कुछ नहीं बचा। माँ की बीमारी, पापा का अंगूठा, मेरा डर, उस्ताद का भाई, साहब का ताबीज़। कल सुबह पीपल के नीचे अगर कोई कुछ जानता है, तो वो बोल देगा। और जो नहीं जानता, वो सुन लेगा।"
उस्ताद ने मेरी तरफ़ देखा।
उनकी आँखों में कुछ था — शायद वो माफ़ी का इंतज़ार नहीं, वो भरोसा था जो पचास साल के बाद लौट रहा था।
"बेटा," उन्होंने कहा, "कल सुबह जब सब बैठेंगे, तो एक कुर्सी खाली रखना।"
"किसके लिए?"
"मेरे भाई के लिए," उन्होंने कहा। "अगर वो आया, तो बैठेगा। और अगर नहीं आया, तो भी वो कुर्सी खाली क्यों है — यह सब जानेंगे।"
मुझे कुछ कहना था, पर मैंने कुछ नहीं कहा।
बस सिर हिला दिया।
शबनम आपा उठीं और अपना मोटा शॉल कंधे पर रख लिया।
"मैं चलती हूँ," उन्होंने कहा। "सुबह चूल्हा जलाना है। और उस्ताद, तुम आज रात दुकान में मशीन पर कपड़ा मत रखना।"
उस्ताद ने पूछा, "क्यों?"
"क्योंकि जिस दिन कपड़ा रखोगे," शबनम आपा ने कहा, "उस दिन लगेगा कि बंद है। और आज तुम्हारी दुकान बंद नहीं है। आज तुम्हारी दुकान खुल गई है।"
वो निकल गईं।
बबलू भी गया। जाते वक़्त उसने दरवाज़े पर रुककर कहा, "अंकुश भाई।"
"हाँ?"
"उस बूढ़े की आँखें," उसने कहा। "मैंने उनमें डर नहीं देखा था। मैंने उनमें उम्मीद देखी थी। और उम्मीद वाला आदमी खतरनाक होता है, क्योंकि उसके पास खोने को कुछ नहीं बचता।"
वो चला गया।
दुकान में मैं, पापा, मीरा और उस्ताद बचे।
उस्ताद ने अपना गिलास खत्म किया, उसे मेज़ पर रखा, और मेरी तरफ़ देखा।
"पेचकस," उन्होंने कहा।
"कल सुबह," मैंने कहा। "पीपल के नीचे। सबके सामने।"
वो एक पल रुके। फिर सिर हिलाया।
"ठीक है," उन्होंने कहा। "पर एक बात याद रखना। पेचकस औज़ार नहीं है। उसका हत्था खोखला है, और उसके अंदर जो है, वो मेरे भाई ने मेरे लिए छोड़ा था। अगर वो मुझे मिला, तो मैं उसे अकेले नहीं खोलूँगा।"
"किसके साथ खोलोगे?"
उस्ताद मुस्कुराए। पहली बार उस रात।
"तुम्हारे साथ," उन्होंने कहा। "क्योंकि जो भी उसके अंदर है, वो मेरे भाई ने किसी ऐसे के लिए लिखा होगा जो जोड़ सके। और मैं अब तक जोड़ नहीं पाया।"
वो निकले।
मीरा ने अपनी कॉपी बंद की और मेरी तरफ़ देखा।
"तुम ठीक हो?"
"नहीं," मैंने कहा। "पर ठीक होने की जगह है — वो पीपल।"
वो मुस्कुराई और चली गई।
पापा ने शटर धीरे से नीचे किया।
"बेटा," उन्होंने कहा, "मैं आज यहीं रुकूँगा।"
"घर चलो," मैंने कहा।
"नहीं," उन्होंने कहा। "माँ सो रही होगी, काजल उसके पास है। और मुझे आज इस दुकान में सोना है। मुझे लगता है आज रात इस दुकान को भी कोई साथ चाहिए।"
मैं कुछ नहीं बोला।
और जब मैं बाहर निकला, तो गली में हवा ठंडी हो चुकी थी।
मैंने जेब में हाथ डाला, ताले को टटोला।
वो ठंडा नहीं था।
वो गरम भी नहीं था।
वो हिल रहा था।
छोटे-छोटे धक्के। नियम से। जैसे कोई बंद आदमी अंदर से दीवार पर मुट्ठी मार रहा हो, और हर बार जब मुट्ठी पड़ती, मेरे सीने में हल्का-सा दर्द उठता — बाएँ तरफ़, पसलियों के नीचे, ठीक वहीं जहाँ घंटी मेरे गले के पास लटकती है।
मैं रुका।
मैंने ताला जेब से निकाला।
उसे हथेली पर रखा।
वो फिर हिला। एक धक्का। दो। तीन।
और तीसरे धक्के पर, बहुत धीमे, बहुत दबी आवाज़ में, ताले के भीतर से कोई बोला।
"देर मत करना, बच्चा।"
मैंने चारों तरफ़ देखा। गली खाली थी।
सिर्फ़ दूर, पुराने बाज़ार की तरफ़, कोई सिलाई मशीन चल रही थी।
टिक।
टिक।
टिक।
और मैंने अपनी जेब में हाथ डालकर घंटी पकड़ी, तो वो भी हिल रही थी।
पर आवाज़ नहीं कर रही थी।
जैसे वो भी सुन रही हो।
॥
मैंने घंटी जेब से निकाली तो वो हथेली में ठंडी पड़ी थी, बस हिल रही थी — जैसे कोई बंद कमरे में दीवार के उस पार से कोई हाथ धीरे-धीरे सहला रहा हो।
मैंने उसे कान से लगाया।
कुछ नहीं।
सिर्फ़ मेरी ही साँस की आवाज़। अपनी साँस सुनना अजीब होता है, तुमने कभी सुना है? जब रात बहुत चुप हो और तुम जानते हो कि कोई सुन रहा है — तो अपनी ही साँस लगती है कि किसी और की है।
मैंने घंटी वापस जेब में रखी और गली के मुँह की तरफ़ देखा।
पुराने बाज़ार की तरफ़ से सिलाई मशीन की आवाज़ आ रही थी। टिक। टिक। टिक। जैसे कोई बैठा हुआ सिल रहा हो, पर रात के ग्यारह बजे इतनी तेज़?
मैं उस तरफ़ दो कदम बढ़ाया, फिर रुक गया।
घंटी अब भी हिल रही थी, पर रुक गई जब मैंने पहला कदम रखा।
जैसे वो कह रही हो — अभी नहीं। आज नहीं।
मैं वापस मुड़ा और घर की तरफ़ चल दिया।
घर पहुँचा तो बारह बज चुके थे। माँ सो रही थीं, काजल उनके पास बैठी थी और उसकी आँखें खुली थीं। कमरे में सिर्फ़ छोटी लालटेन जल रही थी।
"आ गया?" काजल ने पूछा।
"आ गया।"
"पापा?"
"दुकान पर रुके हैं।"
काजल ने एक पल मेरी तरफ़ देखा, फिर सिर हिलाया और कुछ नहीं पूछा।
मैं दीवार के सहारे बैठ गया। ताला जेब में था, अब भी हिल रहा था — धीरे, नियम से, जैसे बंद आदमी गिनती कर रहा हो।
मेरी आँख लग गई।
सुबह पाँच बजे मेरी आँख अपने आप खुली। बिना किसी की आवाज़ के, बिना किसी के छूने के — जैसे किसी ने अंदर से धक्का दिया हो।
मैं उठा, मुँह धोया, चप्पल पहनी और निकल पड़ा।
गली में सुबह की सीलन थी। पीपल के नीचे अभी अंधेरा था, और उसकी जड़ों के पास कोई झाड़ू दे रहा था — फिर आवाज़ बंद हो गई।
मैंने दुकान का शटर खोला।
अंदर पापा चारपाई पर बैठे थे, चश्मा पहने हुए, और हाथ में वही पुरानी काली जिल्द वाली बही थी।
"सोए नहीं?" मैंने पूछा।
"सोया," उन्होंने कहा। "एक घंटा।"
"बही देख रहे थे?"
"नहीं," पापा ने कहा। "ताले को।"
मैंने उनके हाथ से बही ली और उनके बगल में बैठ गया।
"ताला भी साथ था?"
"हाँ।" उन्होंने कहा। "पूरी रात हिलता रहा। फिर चार बजे रुक गया। मैंने सोचा, सो गया। पर अभी तुम आए, तो फिर हिलने लगा।"
मैंने ताला जेब से निकाला और मेज़ पर रख दिया।
पापा ने उसे देखा। फिर मेरी तरफ़ देखा।
"अंदर कुछ है," उन्होंने कहा। "चाबी के छेद से आगे।"
"कैसे पता?"
"क्योंकि रात भर जब हिलता रहा," पापा ने कहा, "तो लगा जैसे अंदर कोई चीज़ खिसक रही है। अगर सिर्फ़ ताला होता, तो आवाज़ एक जैसी होती।"
मैंने ताला उठाया, छेद की तरफ़ देखा।
अंदर अंधेरा था।
मैंने दुकान की लोहे की अलमारी से एक पतली तार निकाली — जो साइकिल के ब्रेक में लगती है — और उसे छेद में डाला।
तार अंदर गई। फिर अटक गई।
फिर कुछ खिसका।
मैंने तार खींची। उसके सिरे पर काग़ज़ का एक मुड़ा हुआ टुकड़ा आया।
वो पीला था, पर गीला नहीं। पुराना था, पर मैला नहीं। जैसे अंदर ही सूखा रहा हो, बाहर की हवा कभी लगी ही न हो।
मैंने उसे खोला।
उस पर सिर्फ़ एक शब्द लिखा था — "मंसूर"।
और उसके नीचे, बहुत छोटे अक्षरों में, एक तारीख़। पचास साल पुरानी। हमारे बाबा के ज़माने की।
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