The Mysterious Bell – Chapter 1258
"फिर एक दिन हिसाब में फ़र्क़ आया।"
कमरे में सन्नाटा। पापा ने अपनी उँगली से घुटने पर धीरे-धीरे एक लकीर खींची, जैसे ज़मीन पर हिसाब बना रहे हों।
"पूरे बारह रुपये कम निकले," उस्ताद ने कहा। "उस ज़माने में बारह रुपये का मतलब एक हफ़्ते का चूल्हा। मैंने पूछा। सीधा पूछा, भाई — कहाँ गए? और इलाही ने मेरी तरफ़ देखा।"
उनकी आवाज़ काँपी नहीं। बस धीमी हो गई।
"मुझे आज तक वो नज़र याद है," उन्होंने कहा। "उसमें गुस्सा नहीं था। उसमें सवाल था — कि तूने पूछा क्यों। और मैंने उस सवाल को समझा नहीं। मैंने उसे जवाब समझा।"
"और वो चला गया," मैंने कहा।
"वो चला गया," उस्ताद ने कहा। "कुछ नहीं बोला। दूसरे दिन दुकान बंद मिली। तीसरे दिन भी। सातवें दिन मैंने पाठशाला बंद कर दी, औज़ार समेटे, और इस गली में उसी जगह दुकान खोल ली। खुद के लिए। अकेले के लिए।"
उन्होंने फिर छत देखी।
"पचास साल मुझे यही लगता रहा," उन्होंने कहा, "कि उसने धोखा दिया। बारह रुपये के लिए। यही गाँठ मेरे अंदर बैठी रही। मैंने उसका नाम कभी नहीं लिया, ताकि घर में कोई और न ले। मैंने उसे मुर्दा मान लिया, क्योंकि मुर्दे से हिसाब नहीं माँगते।"
वो रुके।
"और आज," उन्होंने कहा, "उस तस्वीर को देखकर लग रहा है कि सवाल गलत था।"
"गलत कैसे?" मीरा ने पूछा।
"क्योंकि मैंने पूछा था — पैसा कहाँ गया," उस्ताद ने कहा। "पूछना यह था — तू ठीक है ना भाई? कुछ तेरे घर में है जो मुझे नहीं बता सकता?"
कमरे में हवा भारी हो गई।
तभी शटर के नीचे से एक हाथ आया, जिसमें स्टील का गिलास था। शबनम आपा। उन्होंने गिलास उस्ताद के हाथ पर रख दिया, बिना कुछ बोले, बिना उनकी तरफ़ देखे।
फिर बोलीं।
"चूल्हा बंद है, यह बात सही है," उन्होंने कहा। "पर एक कुल्हड़ के लिए चूल्हा जल सकता है। और उस्ताद, एक बात सुन लो।"
उस्ताद ने पहली बार घूमकर उन्हें देखा।
"जो आदमी पचास साल से अपनी मशीन पर कपड़ा रखकर बैठा है," शबनम आपा ने कहा, "वो माफ़ी का हिसाब नहीं रख रहा। वो इंतज़ार का हिसाब रख रहा है। और इंतज़ार का हिसाब कभी बराबर नहीं होता — वो हमेशा बाक़ी रहता है।"
उस्ताद ने कुछ नहीं कहा। गिलास पकड़कर बैठे रहे।
मैं सोच रहा था कि अब रात यहीं रुकेगी।
पर तभी शटर के बाहर एक जूता सरका।
और बबलू अंदर आया।
वो आज सुबह से ही अजीब था। चेन नहीं, पानदान नहीं, पान नहीं। बस एक सफ़ेद कुर्ता, जिसकी जेब फटी थी, और हाथ जो किसी चीज़ को पकड़ने के लिए जगह नहीं ढूँढ रहे थे।
वो दरवाज़े के पास ही खड़ा रह गया। न आगे आया, न गया।
"बोल, बबलू," मैंने कहा, "बैठ जा। चाय है।"
"नहीं," उसने कहा। "मैं बैठूँगा तो बता नहीं पाऊँगा।"
मैंने मीरा की तरफ़ देखा। मीरा ने अपनी कॉपी निकाल ली थी, पर पन्ना खोला नहीं।
बबलू ने साँस खींची। उसकी आवाज़ में वो दम नहीं था जो सड़क पर होता है। जो आदमी बाज़ार में सबको डराता है, वो शायद सबसे ज़्यादा डरता था, और आज वो दिख रहा था।
"एक रात," उसने कहा, "मैं साहब के दफ़्तार में था। रात के ग्यारह बजे के बाद। मैं काग़ज़ लेने गया था — उसके दराज़ से।"
"और वहाँ कौन था?" मैंने पूछा।
"एक बूढ़ा।"
उसने कहा और हाथ जोड़ लिए, जैसे बात कहकर ही माफ़ी माँग रहा हो।
"बहुत बूढ़ा," उसने कहा। "मैंने ऐसा आदमी नहीं देखा। हड्डी निकली थी कमीज़ के अंदर से। हाथ में लाठी। आँखों पर मोटा सफ़ेद चश्मा। और वो दो आदमियों के बीच से गुज़रते हुए बार-बार एक ही बात कह रहा था—"
बबलू की आवाज़ रुक गई।
"क्या कह रहा था?" उस्ताद ने कहा। उन्होंने गिलास नीचे रख दिया था।
बबलू ने उनकी तरफ़ नहीं देखा।
"मेरा भाई," उसने कहा। "बस यही। मेरा भाई… मेरा भाई। जैसे किसी को ढूँढ रहा हो और नाम याद न आ रहा हो।"
मेरा सीना ठंडा हो गया।
"फिर?" उस्ताद ने कहा।
"फिर साहब ने उसे चुप करवाया," बबलू ने कहा। "साहब ने उसे चुप करवाया, उसके कंधे पर हाथ रखा, और दो आदमियों को इशारा किया। वो बूढ़े को लाठी टेकाते हुए बाहर छोड़ आए। और मैं — मैं कोने में खड़ा था, साँस भी नहीं ले रहा था।"
"तुमने उसे पहचाना नहीं?" मीरा ने पूछा।
"मैंने पहचानने की कोशिश नहीं की," बबलू ने कहा। "क्योंकि उस आदमी की आँखों में एक बात थी। वो बात पैसे से नहीं खरीदी जा सकती। वो बात सिर्फ़ उस आदमी के पास होती है जिससे कोई चीज़ छिन ली गई हो और उसे वापस माँगने का हक़ न बचा हो।"
वो फिर चुप हो गया।
"उस रात के बाद मैं सोया नहीं," उसने कहा। "सच कहूँ, उस रात से मैं हर रात वो लाठी सुनता हूँ। और साहब के काग़ज़ों पर मेरा दस्तख़त करते वक़्त मुझे वही आवाज़ आती है — मेरा भाई।"
कमरा सन्न।
उस्ताद बहुत देर तक चुप रहे। इतनी देर कि मुझे लगा वो अब कुछ नहीं बोलेंगे, बस उठकर चले जाएँगे।
फिर उन्होंने दोनों हाथों से लकड़ी की स्टूल पकड़ी और खड़े हो गए। जब खड़े हुए तो उनकी कमर एक बार टूटी-सी लगी, फिर सीधी हो गई।
"अगर वो बूढ़ा सच में इलाही था," उन्होंने कहा, "तो उसने पचास साल अपने ही शहर में छिपकर क्यों गुज़ारे?"
किसी के पास जवाब नहीं था।
"पचास साल," उस्ताद ने दोहराया, और इस बार उनकी आवाज़ में कुछ और था — गुस्सा नहीं, हैरानी। "मैं यहाँ बैठा था, इसी गली में, इसी मशीन पर। वो कहीं था — शायद दो गली दूर। और मैंने उसे कभी नहीं देखा। क्योंकि मैंने उसे मरा हुआ मान लिया था और वो मुझे ज़िंदा मानकर भाग रहा था।"
शबनम आपा ने उनके हाथ में फिर गिलास रखा। इस बार उस्ताद ने उसे पकड़ लिया।
"पी लो," उन्होंने कहा। "चाय ठंडी नहीं हुई।"
उस्ताद ने एक घूँट लिया।
और तभी पापा ने मुँह खोला।
वो इतनी देर से इतने चुप थे कि मैं उन्हें भूल ही गया था।
"उस्ताद," पापा ने कहा, "मुझे बही का वो फटा पन्ना याद है।"
उस्ताद ने उनकी तरफ़ देखा।
"बाईस साल पहले मैंने उसे एक बार छूआ था," पापा ने कहा। "बाबा ने मुझे दूर से दिखाया था, कहा था — देख, इस पर हिसाब है। और मैंने उस पर एक लिखाई देखी थी।"
"कैसी लिखाई?" मैंने पूछा।
"झुकी हुई," पापा ने कहा। "बहुत पतली। ऐसी जैसे लिखने वाले की कलम बहुत हल्की हो, और हाथ बहुत काँपता हो।"
उस्ताद ने गिलास नीचे रखा।
"वो लिखाई गफ़ूर की है," उन्होंने कहा।
मैंने मीरा की तरफ़ देखा। मीरा की कलम रुक गई थी।
"कौन गफ़ूर?" मैंने पूछा।
"पुराने बाज़ार का फ़ोटोग्राफ़र," उस्ताद ने कहा। "जो हर आदमी की तस्वीर खींचता था और किसी की नहीं देता था। उसकी दुकान बिजलीघर की गली में थी। आग के बाद वो भी बंद हो गई। मैंने सुना था कि उसने आँखें खराब कर लीं।"
"तो तीन नाम हैं," मीरा ने कहा। उसने अपनी कॉपी में उँगली रखी। "इलाही, मंसूर और अब गफ़ूर।"
"और तीनों के बीच एक ही चीज़ है," मैंने कहा।
सबने मेरी तरफ़ देखा।
"घंटी," मैंने कहा। "इलाही ने उसे बनाया। मंसूर ने उसका ताला बनाया। गफ़ूर ने उसकी तस्वीर खींची। और अब वो मेरी जेब में है।"
"और उसके अंदर?" बबलू ने कहा। उसकी आवाज़ अब भी काँप रही थी।
"उसके अंदर," मैंने कहा, "एक सातवाँ काग़ज़ है। जो साहब के ताबीज़ में सिला है।"
बबलू ने आँखें बंद कर लीं।
"मैं जानता था," उसने कहा। "जिस दिन मैंने साहब को ताबीज़ छूते देखा था, उस दिन मुझे लगा था कि वो कोई पत्थर है। उसमें ऐसी ठंडक थी।"
"तूने उसे छुआ?" मैंने पूछा।
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