The Mysterious Bell – Chapter 1257
तस्वीर मेज़ पर रखी थी। मैंने फ्रेम को फिर उलटा किया और उसकी पीठ पर बनी लिखाई को देखा।
"जोड़ दो का था, एक का नहीं।"
मैंने उस्ताद की तरफ़ देखा।
"उस्ताद, इसका मतलब क्या है?"
उन्होंने लंबी साँस ली।
"मतलब यह है," उन्होंने कहा, "कि जो हमने कभी सोचा भी नहीं — यह घंटी मेरी नहीं थी। मेरे भाई की नहीं थी।"
"तो?"
"दोनों की।" उन्होंने कहा। "आधी-आधी। पचास साल से मैं इसे अपनी समझ रहा था। और शायद वो भी अपनी समझ रहा था।"
उन्होंने मेरी तरफ़ देखा।
"बेटा, मैं जब छोटा था तो मेरे पिता ने हम दोनों को घंटी बनाना सिखाया। मैंने ढाला। इलाही ने तराशा। यह फूल उसने खोदा। यह घंटी हम दोनों की मेहनत थी।"
वो रुके।
"पर हमें कभी नहीं बताया गया कि इसे एक साथ रहना है। हमें यह कहा गया — बाँट लो। और हमने बाँट लिया।"
मीरा ने पूछा, "तो फिर यह घंटी आपको कैसे मिली?"
उस्ताद ने धीरे से कहा, "इलाही ने दी थी। आग के बाद। मेरे हाथ में रख दी और बोला — ले, तू रख। फिर कभी नहीं लौटा।"
कमरे में फिर चुप्पी।
"तो अब," मीरा ने धीरे से कहा, "यह तस्वीर आपकी दराज़ से निकलकर रणवीर के दफ़्तार तक कैसे पहुँची?"
उस्ताद उठे।
वो खिड़की के पास गए। काँच पर उँगली रखी।
"मुझे नहीं पता," उन्होंने कहा। "पर एक बात पता है।"
"क्या?"
"कि मेरी दराज़ का ताला अब भी वही है," उन्होंने कहा। "और ताले की चाबी अब भी मेरे पास है। और उस तस्वीर को उस दराज़ से निकलने के लिए — किसी ने ताले को खोला होगा। या फिर —"
"या फिर?"
"या फिर उसकी दूसरी कॉपी कोई और लाया होगा," उन्होंने कहा। "और उस कॉपी के पीछे वो ही लिखा होगा जो मेरी कॉपी के पीछे है।"
वो मुड़े।
उनकी आँखें मेरी तरफ़ थीं।
"बेटा," उन्होंने कहा, "मेरी तस्वीर के पीछे भी यही लिखा है। मैंने इसे देखा है। पचास साल पहले। उसी रात।"
"तो इसका मतलब —"
"इसका मतलब यह," उस्ताद ने कहा, और उनकी आवाज़ भारी हो गई, "कि यह तस्वीर जिसके भी हाथ में है — वो मेरा भाई ही होना चाहिए।"
कमरा सन्न।
"तो फिर यह तस्वीर यहाँ से वहाँ कैसे पहुँची?" उस्ताद ने कहा। "मेरा भाई मरा नहीं है। वो लौट रहा है।"
और उनके हाथ में पड़ा हुआ फ्रेम — धीरे-धीरे, जैसे कोई उसे मेज़ से उठा रहा हो — ज़रा सा सरक गया।
या शायद मुझे लगा।
या शायद उस्ताद ने उसे हिलाया।
पर तस्वीर में दोनों आदमियों के बीच रखी वो घंटी, जो अभी तक पीली पड़ी थी, अब पहले से ज़्यादा चमकती दिख रही थी।
और मेरी जेब में पड़ी घंटी, उस पल, पहली बार, थोड़ी देर के लिए गरम हुई।
फिर वो ठंडी हो गई।
पर उससे पहले, बहुत ही धीरे, बहुत दूर से, जैसे किसी दूसरे शहर से, मुझे एक आवाज़ सुनाई दी।
सिर्फ़ एक शब्द।
"बच्चा।"
मैंने मीरा की तरफ़ देखा।
"तुमने सुना?"
मीरा ने सिर हिलाया, ना में।
शबनम आपा ने मेरी तरफ़ देखा।
बबलू ने भी।
उस्ताद ने भी।
और उन सबने एक साथ, बिना कुछ बोले, मेरी जेब की तरफ़ देखा।
क्योंकि वो घंटी अब भी हिल रही थी।
हालाँकि कोई उसे छू नहीं रहा था।
हालाँकि मैं उसे पकड़े नहीं था।
वो अपने आप हिल रही थी।
और फिर वो रुक गई।
और कमरे में जो सन्नाटा बचा, वो पहले कभी महसूस नहीं हुआ था।
उस्ताद ने बहुत देर बाद अपना मुँह खोला।
"बेटा," उन्होंने कहा, "अब मुझे उस पेचकस की ज़रूरत है। आज रात।"
"मैं जाता हूँ," मैंने कहा।
"और एक बात," उन्होंने कहा। "जब तुम दुकान पहुँचो, तो पहले अपने पापा को साथ लेना। अकेले नहीं।"
"क्यों?"
क्योंकि, उस्ताद ने कहा, और उनकी आवाज़ में वो डर वापस आ गया जो पचास साल से दबा हुआ था, "जब मेरा भाई लौटता है, तो वो अकेले नहीं आता। वो साथ कुछ लाता है। और उसके साथ जो आता है, वो बस देखता नहीं — वो चुनता है।"
"क्या चुनता है?"
उस्ताद ने फ्रेम मेज़ पर धीरे से रखा।
"यह," उन्होंने कहा, "कि कौन सा भाई अंदर जाएगा और कौन सा बाहर रहेगा।"
मैंने एक पल उनकी तरफ़ देखा।
और मैंने अपनी कॉपी निकाली।
फिर उसमें उस रात की पहली लाइन लिखी —
"आज रात उस्ताद ने अपना भाई पहचाना। और मैंने अपनी जेब से एक नाम हटाया — घंटी का नहीं, बल्कि अपने डर का।"
फिर मैंने मीरा की तरफ़ देखा।
"चल," मैंने कहा। "पहले पापा। फिर दुकान।"
और हम निकले।
बाहर गली में हवा ठंडी हो चुकी थी।
और दूर कहीं, बहुत दूर, पुराने बाज़ार की तरफ़, मुझे लगा जैसे कोई पुरानी सिलाई मशीन चल रही है।
टिक।
टिक।
टिक।
जैसे कोई पचास साल बाद पहली बार कुछ सिल रहा हो।
॥
उस रात गली की हवा में नमी थी, पर ठंड नहीं। जैसे कोई पुरानी दीवार साँस ले रही हो और साँस गरम हो।
मैं और मीरा उस्ताद की दुकान से निकले। मेरी जेब में घंटी थी, जो अब चुप थी। और उस चुप्पी में एक बात थी जो मुझे अंदर से खुरच रही थी — इलाही बक्श ज़िंदा है, लौट रहा है, और वो अकेला नहीं आएगा।
मीरा ने चलते-चलते कहा, "कैमरा आज बंद रखा है।"
"अच्छा किया," मैंने कहा। "आज रात गली में कोई सबूत नहीं, सिर्फ़ लोग हैं।"
"तुम्हें कैसे पता कि सबूत नहीं चाहिए?"
"क्योंकि सबूत काग़ज़ से बनते हैं," मैंने कहा, "और काग़ज़ इस गली में बहुत बिक चुका है।"
वो हँसी नहीं। मैं भी नहीं हँसा।
दुकान पहुँचे तो शटर आधा उठा था। अंदर बल्ब जल रहा था, वो ही पुराना, जो गुनगुनाता है। और उसकी पीली रोशनी में पापा बैठे थे — औज़ारों के ट्रंक के पास, दोनों हाथ घुटनों पर, चश्मा टेप से बँधा, आँखें नीची।
पापा मेरे आने पर उठे नहीं। बस इतना कहा, "देर हो गई।"
"उस्ताद की दुकान पर रुकना पड़ा," मैंने कहा। "और पापा, आज उस्ताद ने कुछ ऐसा खोला जो पचास साल से बंद था।"
पापा ने सिर उठाया।
और मेरे पीछे, शटर के नीचे से झुककर, उस्ताद अली बक्श अंदर आए।
वो बिना कुछ बोले आए। उन्होंने दुकान के कोने में रखी लकड़ी की छोटी स्टूल खींची, बैठे, और ऊपर छत की तरफ़ देखने लगे।
उन्होंने बहुत देर तक देखा।
इतनी देर कि मैंने सोचा कहीं वो कुछ कहना भूल गए हैं, या छत पर कुछ लिखा है जो सिर्फ़ उन्हें दिखता है।
मीरा ने मेरी तरफ़ देखा। मैंने कंधे उठाए।
फिर उस्ताद ने मुँह खोला।
"पचास साल पहले," उन्होंने कहा, आवाज़ बहुत धीमी, "इसी गली में एक छोटी पाठशाला चलती थी।"
मैं चुप हो गया।
"मरम्मत की पाठशाला," उन्होंने कहा। "कोई इमारत नहीं थी। बस चबूतरी के पास दो चारपाइयाँ, एक लकड़ी की मेज़, और एक औज़ारों का बक्सा। मैं और इलाही बैठते थे। गली के बच्चे आते थे। कोई टूटा ताला लाता, कोई साइकिल की चेन, कोई माँ की घड़ी। हम सिखाते थे — पहले देखो, फिर खोलो, फिर जोड़ो। और जो बच्चा अपनी चीज़ जोड़ लेता, वो उस घंटी को बजाता।"
उन्होंने मेरी जेब की तरफ़ देखा।
"यही घंटी?" मैंने पूछा।
"यही घंटी," उस्ताद ने कहा। "वो पाठशाला का निशान थी। दरवाज़े पर टँगी रहती थी। हमने उस पर ऐसा फूल खोदा था जो सिर्फ़ हम दोनों को पता था। और उसका मतलब था — जो टूटा, वो जुड़ा।"
उन्होंने हाथ उठाकर हवा में एक आकार बनाया, फिर हाथ नीचे गिरा दिया।
"हिसाब वहीं से शुरू हुआ," उन्होंने कहा। "जो बच्चा आता, वो पैसा नहीं देता। कोई दो आने देता, कोई कुछ नहीं। मैं कहता — भाई, यह पैसा कहाँ जाएगा? इलाही कहता — जहाँ जाना है वहाँ जाएगा। मैं हँसकर छोड़ देता।"
उन्होंने साँस ली।
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