The Mysterious Bell – Chapter 1256
"यह लिखाई —"
"किसकी है?"
उस्ताद ने अपना सिर धीरे-धीरे हिलाया।
"मेरी नहीं," उन्होंने कहा। "मेरे भाई की नहीं।"
"फिर किसकी?"
उस्ताद ने जवाब नहीं दिया।
वो फ्रेम को उलटा-पुलटा कर देखते रहे।
फिर उन्होंने काँच पर हाथ फेरा।
फिर धीरे से फ्रेम को अपनी छाती से लगा लिया।
और रो पड़े।
मैंने उस्ताद को पहले कभी रोते नहीं देखा। पचास साल के बुज़ुर्ग को नहीं देखा। गली में सबसे ज़्यादा तराज़ू में तोलकर बोलने वाले आदमी को।
आज वो रो रहे थे।
और उनका रोना बूढ़े आदमी का रोना था। धीमा। बिना आवाज़ के। बस कंधे हिलते थे, और साँस टूट रही थी।
शबनम आपा तुरंत उनकी तरफ़ बढ़ीं, पर उन्होंने हाथ से रोक दिया।
"नहीं, बैठो," उन्होंने कहा।
वो फिर चारपाई पर बैठ गए।
और फिर उन्होंने कमरे में सबकी तरफ़ देखा।
"तुम लोग नहीं समझोगे," उन्होंने कहा। "मैंने यह तस्वीर किसी को नहीं दिखाई। पचास साल। एक बार भी नहीं।"
"क्यों?" शबनम आपा ने पूछा।
"क्योंकि," उस्ताद ने कहा, "इसे दिखाने का मतलब था — मैं हार गया। और मैंने खुद को यह नहीं कहा था।"
वो रुके।
"मैंने खुद को यह नहीं कहा कि मैं हार गया," उन्होंने दोहराया। "मैंने खुद को यह कहा कि मैं अभी लड़ रहा हूँ। पचास साल से अभी लड़ रहा हूँ।"
मीरा ने धीरे से पूछा, "उस्ताद, यह तस्वीर कहाँ की है?"
"यह दुकान के पीछे की है," उन्होंने कहा। "यह वही जगह है जहाँ आज हम बैठे हैं। यहीं यह मेज़ थी। यहीं मैंने पहली सिलाई सीखी थी। और यहीं मेरे भाई ने मुझे पहली बार हथौड़ा पकड़ना सिखाया था।"
उन्होंने फ्रेम फिर मेज़ पर रखा।
"यह तस्वीर छपवाई थी हमने। पुराने बाज़ार के पास वाले ज़ुबैर स्टूडियो से। सात रुपये की थी। हम दोनों ने आधे-आधे दिए। दोनों की एक-एक कॉपी बनी।"
"दो कॉपी?" मैंने पूछा।
"हाँ।" उस्ताद ने कहा। "एक मेरी। एक उसकी।"
"तो फिर —"
"तो फिर," उस्ताद ने कहा, "यह कॉपी किसी ने किसी को दी है।"
कमरा फिर सन्न रह गया।
मैं बैठ गया। मेरे घुटने कमज़ोर लग रहे थे।
मीरा ने अपनी कॉपी निकाली।
"उस्ताद," उसने कहा, "अगर मैं गलत पूछ रही हूँ तो माफ़ कीजिए। पर — यह तस्वीर आपने किसकी दराज़ में रखी थी?"
"नहीं, यह मेरी दराज़ में थी," उन्होंने कहा। "पुराने बाज़ार की दुकान में। उसी दुकान में जो आग के बाद बंद हो गई।"
"पर वो दुकान —"
"वो दुकान बंद है," उस्ताद ने कहा। "ताला लगा है। और ताला अब तक वही है, जो मैंने पचास साल पहले लगाया था।"
"तो कोई अंदर गया होगा," बबलू ने कहा। पहली बार। उसकी आवाज़ सूखी थी।
उस्ताद ने उसकी तरफ़ देखा।
"कोई भी अंदर नहीं जा सकता," उन्होंने कहा। "मैं हर महीने उस ताले को देखने जाता हूँ। और आज भी गया था। ताले पर आज तक कोई निशान नहीं आया।"
कुछ देर चुप्पी छाई रही।
पापा ने उठकर एक कदम आगे बढ़ाया।
"उस्ताद," उनकी आवाज़ भारी थी। "क्या मैं?"
उस्ताद ने उनकी तरफ़ देखा। और फिर धीरे से सिर हिलाया।
पापा मेज़ के पास आए।
उन्होंने फ्रेम को छुआ।
और उनकी उँगली काँपने लगी।
बहुत धीरे। जैसे किसी चीज़ को छूने से पहले आदमी डरता है — कि वो टूट जाएगी। या कि वो खुद टूट जाएगा।
"मेरे बाबा," पापा ने फुसफुसाया। "और यह —"
"इलाही बक्श," उस्ताद ने कहा। "मेरा भाई।"
पापा ने उनकी तरफ़ देखा।
दोनों आदमी एक-दूसरे को देख रहे थे। दोनों की आँखों में पानी था।
"उस्ताद," पापा ने कहा। "मैंने यह चेहरा पहले देखा है।"
"कब?"
"पता नहीं," पापा ने कहा। "बचपन में। किसी पुरानी तस्वीर में। पर —"
"पर क्या?"
पापा ने अपनी जेब से कुछ निकाला। वो मुड़ा हुआ काग़ज़ था, जो उन्होंने रात में बाहर वाली चौखट पर पाया था। वो एक ही पीली पर्ची थी — पर अब उसके साथ एक और काग़ज़ था।
पापा ने उसे मेज़ पर रखा।
"मुझे यह आज शाम मिला," पापा ने कहा। "शटर के नीचे।"
मैंने काग़ज़ उठाया।
उस पर सिर्फ़ एक लाइन थी।
"वही दो लकीरें। वही बिंदु।"
वो मेरे घर का नाम लिखने की शुरुआत थी।
मैंने काग़ज़ शबनम आपा की तरफ़ बढ़ाया।
"आपा, आपने यह निशान पहले कहीं देखा है?"
शबनम आपा ने देखा। फिर उन्होंने फ्रेम की तरफ़ देखा।
"हाँ," उन्होंने कहा। "यह निशान मेरे पापा के पुराने बोर्ड पर भी था।"
"क्या बोर्ड?"
"पुराना बोर्ड," शबनम आपा ने कहा। "जो मेरी गुमटी के पीछे की अलमारी में रखा है। जो मेरे पापा ने उधार में लिए ठेले पर लगाया था। जिस पर लिखा था — हाशिम और हरनाम। साइकिल के पुर्ज़े। पुराना बाज़ार।"
मैंने उनकी तरफ़ देखा।
"वो बोर्ड कहाँ है?"
"मेरे पास ही," शबनम आपा ने कहा। "अब तक मुझे समझ नहीं आया कि वो बोर्ड क्यों मैंने संभालकर रखा हुआ है। अब लगता है — था कुछ।"
मीरा ने अपनी कॉपी में तेज़ी से कुछ लिखा।
"तो अब तक निशान के तीन जगह होने की बात आई," उसने कहा। "चूल्हे के पीछे वाले दरवाज़े पर। घंटी के छल्ले पर। और शबनम आपा के बोर्ड पर।"
"चार," उस्ताद ने कहा।
सबने उनकी तरफ़ देखा।
"मेरे भाई के औज़ारों पर भी था," उन्होंने कहा। "उसने अपने पेचकस के हत्थे पर यह निशान खोदा था।"
पापा ने मेरी तरफ़ देखा।
"पर वो पेचकस —" उनकी आवाज़ रुकी। "वो पेचकस मेरे पास था। वो मैंने रणवीर के दफ़्तार में छोड़ा था। और वो अब —"
"अब वो लौट आया है," मैंने कहा। "बक्से के तले में मिला।"
उस्ताद उठे। सीधे खड़े। जैसे कमरे में कुछ बदल गया हो।
"तुम्हारे पास मेरे भाई का पेचकस है?"
"हाँ।"
उस्ताद ने एक हाथ मेज़ पर रखा। उनकी उँगलियाँ काँप रही थीं।
"तो मुझे देना," उन्होंने कहा। "आज रात।"
"उस्ताद —"
"मुझे देना, बेटा," उन्होंने दोहराया। "क्योंकि मेरे भाई ने उस पेचकस से जो लिखा है, वो मुझे खुद पढ़ना है।"
मैंने पापा की तरफ़ देखा। पापा ने सिर हिलाया।
"कल सुबह ले आऊँगा," मैंने कहा। "दुकान से।"
"नहीं," उस्ताद ने कहा। "अभी।"
"अभी?"
"अभी।"
मैं उठा। मीरा भी उठी।
"अंकुश," बबलू ने कहा। वो अब तक चुप खड़ा था। "मैं चलूँ?"
उस्ताद ने उसकी तरफ़ देखा।
"तू क्यों चलेगा?"
"क्योंकि," बबलू ने कहा, "उस पेचकस को मैंने एक बार हाथ में पकड़ा था। साहब के दफ़्तार में। और उस वक़्त मुझे पता नहीं था कि वो किसका है। अगर उस पर उँगली के निशान हैं — मेरे हैं। और मैं चाहता हूँ कि मेरे निशान पर कोई सवाल न उठे।"
कमरे में फिर चुप्पी।
शबनम आपा ने उसकी तरफ़ देखा।
"तू ठीक कह रहा है," उन्होंने कहा। "आज तू साफ़ बोल रहा है।"
बबलू ने सिर नीचा कर लिया।
पापा उठे। "मैं चलता हूँ," उन्होंने कहा। "मैं दुकान पर मिलूँगा।"
"पापा, आप —"
"मैं ठीक हूँ," उन्होंने कहा। "और आज मुझे यह सुनना है कि उस पेचकस में क्या लिखा है। चाहे जो हो।"
वो उठे। दरवाज़े की तरफ़ बढ़े।
फिर रुके।
"अंकुश," उन्होंने कहा।
"हाँ?"
"अगर उस पेचकस में मेरे बाप का लिखा हुआ कुछ है," उन्होंने कहा, "तो मुझे पहले बताना। सबसे पहले। चाहे वो कुछ भी हो।"
"पापा —"
"मैं झूठ नहीं बोल रहा," उन्होंने कहा। "अब मैंने तुमसे एक बात कह दी है — तो अब जो भी होगा, वो हम साथ सुनेंगे। अकेले नहीं।"
मैंने सिर हिलाया।
वो बाहर निकल गए।
उस्ताद कुर्सी पर बैठे रहे।
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