The Mysterious Bell – Chapter 1255
वो रुके।
— अंकुश, उन्होंने कहा, मुझे लगता है कि इस तस्वीर में एक और आदमी है।
कमरे में फिर चुप्पी।
— क्या?
— नहीं, तस्वीर में नहीं, पापा ने कहा। इस तस्वीर के पीछे। इस तस्वीर के बनने के बाद।
वो उठे।
— जब मैंने उसे छुआ, उन्होंने कहा, तो लगा कि दोनों के पीछे कोई खड़ा है। और मुझे लगा कि वो वही आदमी है जिसने हम सबको यहाँ तक पहुँचाया है।
— तुम्हें कैसे पता?
— मुझे नहीं पता, पापा ने कहा। पर अब जब मैं अपने बाबा की आवाज़ याद करता हूँ, तो एक बात याद आती है।
— क्या?
— वो कभी अकेले नहीं हँसते थे।
कमरे में सन्नाटा।
— पचास साल पहले, पापा ने कहा, जब मैं बच्चा था, मैंने अपने बाबा को अकेले हँसते कभी नहीं देखा। हँसते वक़्त वो हमेशा किसी की तरफ़ देखते थे। जैसे किसी को साथ लेकर हँस रहे हों।
वो रुके।
— और एक दिन मैंने पूछा — बाबा, आप हँसते वक़्त किसकी तरफ़ देखते हैं? और वो चुप हो गए। और फिर बोले — मेरे एक भाई की तरफ़।
मैंने उस्ताद की तरफ़ देखा।
वो दरवाज़े पर खड़े थे, सफ़ेद पगड़ीनुमा टोपी, मोटा चश्मा, कान पर पेंसिल, और उनका हाथ दरवाज़े की चौखट पर था।
वो मुड़े।
और उन्होंने धीरे से, बहुत धीरे से, अपनी आवाज़ में कहा — शायद वो हँस रहा था। जब वो हँसते थे, तो दुनिया हँसती थी। जब वो चुप हुए, तो दुनिया चुप हो गई। और मैंने सोचा — जब मरूँगा, तो क्या पता उस शहर में कोई हँसेगा भी या नहीं।
वो रुके।
— और मैं आज भी यहाँ खड़ा हूँ, उन्होंने कहा, और मेरा भाई कहीं और है।
वो दरवाज़े से बाहर गए।
मीरा ने मेरी तरफ़ देखा।
— अंकुश, उसने कहा, ये — ये क्या हो रहा है?
मैंने तस्वीर की तरफ़ देखा।
मैंने उस्ताद को बाहर देखा।
मैंने अपनी जेब की तरफ़ देखा।
— पता नहीं, मैंने कहा। पर एक बात पता है।
— क्या?
— अब दो हिस्से बचे हैं, मैंने कहा। एक ताबीज़ में। एक उसके गले में।
— और तीसरा?
— तीसरा, मैंने कहा, वो जो अभी-अभी मेरे पापा ने कहा।
— क्या?
— वही। कि उस तस्वीर में एक और आदमी है। और वो कोई ऐसा है जिसके बारे में हम सब भूल गए हैं।
मैं उठा।
मैं उठा।
कुर्सी पीछे खिसकी। फ़र्श पर चरचराहट हुई। मीरा ने तुरंत अपना कैमरा उठाया, फिर मेरी तरफ़ देखा, और वापस नीचे रख दिया।
पापा कुछ कहने वाले थे। मैंने हाथ उठाकर उन्हें रोका।
"अंदर चलिए," मैंने कहा। "गली में नहीं।"
कोई कुछ नहीं बोला।
हम सब दुकान के पीछे वाले कमरे में गए। वही कमरा जहाँ औज़ारों का ट्रंक था, चारपाई थी, और लोहे की अलमारी जिसका दरवाज़ा हमेशा की तरह ठीक से बंद नहीं होता था।
कमरे में एक ही बल्ब जल रहा था। गुनगुनाता हुआ। पुराना। जैसे वो भी आज की रात से थक गया हो।
मैंने दरवाज़ा बंद किया। कुंडी चढ़ाई।
तो वो क्या था जो मैं दरवाज़े के पीछे लगा रहा था?
डर था। साफ़ कहूँ तो डर था। क्योंकि जो मैं अब दिखाने जा रहा था, वो सिर्फ़ एक काग़ज़ नहीं था। वो एक आदमी की आवाज़ थी। एक आदमी की आवाज़ जो पचास साल से किसी की दराज़ में बंद थी।
उस्ताद चारपाई के किनारे बैठ गए। उन्होंने अपना मोटा चश्मा उतारा, कमीज़ से पोंछा, फिर पहन लिया। मेरी तरफ़ देखा।
"निकालो," उन्होंने कहा।
मैंने जेब से वो चीज़ निकाली।
लकड़ी का छोटा फ्रेम था। चारों कोनों पर पीतल की पतली पट्टियाँ लगी थीं, पर दो कोनों की पट्टियाँ टूट चुकी थीं। काँच पर एक तरफ़ ज़रा सी दरार थी, जैसे किसी ने इसे जल्दी में कहीं रखा हो और फिर भूल गया हो।
मैंने फ्रेम मेज़ पर रखा।
शबनम आपा दरवाज़े के पास खड़ी थीं। उन्होंने अपना मोटा शॉल कंधे पर सँभाला और मेज़ के करीब आईं।
बबलू एक कोने में खड़ा था। आज उसके गले में सोने की चेन नहीं थी, न पान का डिब्बा। सिर्फ़ एक सस्ती सफ़ेद कमीज़, जिसकी जेब फटी थी। वो खुद को किसी तरह खड़ा रख रहा था, पर उसके हाथ कमीज़ के किनारे को कसकर पकड़े हुए थे।
मीरा मेरे बगल में आकर बैठी।
पापा सबसे दूर, चारपाई के दूसरे सिरे पर। चुप। जैसे वो भी इंतज़ार कर रहे थे कि अब क्या होगा।
मैंने फ्रेम पर पड़ी धूल को हाथ से साफ़ किया।
और मैंने काँच के भीतर देखा।
दो जवान आदमी खड़े थे।
दोनों की उम्र तीस से ज़्यादा नहीं होगी। दोनों सफ़ेद कुर्ते में। दोनों के हाथ में मिस्त्री के औज़ार — एक के हाथ में पेचकस, दूसरे के हाथ में छोटा हथौड़ा।
बीच में एक लकड़ी की मेज़ थी।
और मेज़ पर रखी थी वो घंटी।
मेरे भीतर कुछ हिला।
मैंने तस्वीर को और करीब लाया। मिट्टी के रंग में छपी पुरानी तस्वीर थी, किनारे पीले पड़ गए थे, पर चेहरे साफ़ थे।
दाहिनी तरफ़ का आदमी — लंबा, घने बाल, मुँछों के नीचे हल्की मुस्कान। मैंने उसका चेहरा पहले कहीं देखा था। कहीं नहीं — हर जगह। उसी के नाम से रजिस्टर में सात नाम लिखे थे, उसी के नाम से अस्पताल की ज़मीन की रसीद थी, उसी के नाम से मेरे पापा की आँखें भर आती थीं।
शिवनारायण यादव।
मेरे परदादा।
मैंने बाईं तरफ़ देखा।
और मेरा हाथ फ्रेम पर जम गया।
बाईं तरफ़ का आदमी — दुबला, मझोले कद का, थोड़ा झुका हुआ, जैसे हमेशा काम में लगा रहता हो। उसके कान पर पेंसिल थी। गले में नापने का फीता था। और उसकी आँखों में वो हँसी थी, जो कोई पचास साल में भी नहीं बदलती।
पीछे बैठे उस्ताद ने कुर्सी पकड़ी।
कैंची उनके हाथ से फिसली और फ़र्श पर गिरी।
ठन्।
कमरे में आवाज़ बहुत तेज़ लगी। जैसे किसी ने पीतल का ताला फ़र्श पर दे मारा हो।
उस्ताद ने अपना चेहरा दोनों हाथों में लिया।
"यह —" उनकी आवाज़ फट गई। "यह मेरी तस्वीर है।"
मैंने उनकी तरफ़ देखा।
"यह तस्वीर," उस्ताद ने धीरे से कहा, "पचास साल से मेरी दराज़ में बंद थी।"
मैंने फ्रेम को पलट दिया, ताकि सबके सामने रहे।
उस्ताद ने अपनी आँखें मसली।
"यह," उन्होंने उँगली उठाकर बाईं तरफ़ दिखाया, "इलाही बक्श है।"
कोई नहीं बोला।
"मेरा भाई," उस्ताद ने कहा। "मेरा बड़ा भाई।"
शबनम आपा ने होंठ भींचे।
"उस्ताद —" उन्होंने कुछ कहना चाहा।
"इसकी घंटी," उस्ताद ने कहा, और उनका हाथ फ्रेम पर पहुँचा। "यह घंटी इलाही बक्श की थी।"
मेरे भीतर कुछ ठंडा फैल गया।
मैंने अपने जेब की तरफ़ देखा। घंटी वहीं थी। ठंडी। पूरी तरह चुप।
पर अब वो मेरी नहीं लग रही थी।
अब वो किसी और की लग रही थी।
तस्वीर पर उसकी नज़र बनी हुई थी।
मैंने काँच के पीछे देखा। दोनों आदमियों के बीच, लकड़ी की मेज़ पर, वो घंटी रखी थी। मैंने अपनी जेब से घंटी निकाली और तस्वीर के पास रख दी।
दोनों एक जैसी दिख रही थीं।
बिल्कुल एक जैसी।
एक तस्वीर में, एक जेब में। दोनों एक ही ढाँचे की, एक ही रंग की, एक ही खुदाई वाली।
उस्ताद ने अपनी आँखें बंद कर लीं।
"बेटा, यह मैंने किसी को नहीं दिखाई," उन्होंने धीरे से कहा। "पचास साल। किसी को नहीं।"
"तो फिर यह यहाँ से वहाँ कैसे पहुँची?"
आवाज़ मेरी थी। पर सवाल बहुत बड़ा था।
कोई नहीं बोला।
मैंने फ्रेम को उठाया और उलट दिया।
पीठ पर एक छोटी, नीली स्याही की लिखाई थी।
बहुत पुरानी। पीली पड़ चुकी थी। पर पढ़ी जा सकती थी।
मैंने ज़ोर से पढ़ा।
"जोड़ दो का था, एक का नहीं।"
कमरा सन्न रह गया।
उस्ताद उठे। एक हाथ से उन्होंने मेज़ पकड़ी, दूसरे हाथ से चश्मा उतारा और फिर लगाया। फिर उन्होंने फ्रेम मेरे हाथ से लिया और उसे अपनी आँखों के पास कर लिया।
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