The Mysterious Bell – Chapter 1254
— क्योंकि, उन्होंने कहा, और उनकी आवाज़ में एक ऐसी शांति थी जो मुझे डरा गई, मेरे भाई का आदमी मेरी दराज़ खोल सकता है। और दराज़ खोलने के लिए ज़िंदा होना पड़ता है।
वो उठे।
— और एक बात और।
— क्या?
— वो तस्वीर, उन्होंने कहा, मेरी दराज़ में पचास साल से थी। और उस पर ये लिखा था — जोड़ दो का था। एक का नहीं। ये उसने लिखा था। मेरे भाई ने। और मैंने ये वाक्य पचास साल में कभी नहीं पढ़ा क्योंकि मैंने तस्वीर पलटी ही नहीं थी।
वो रुके।
— ये वाक्य, उन्होंने कहा, मेरे भाई का वादा था।
मीरा ने पूछा — कैसा वादा?
उस्ताद ने तस्वीर को देखा।
— कि वो कभी अकेला नहीं करेगा।
वो फिर मेरी तरफ़ देखने लगे।
— और मैंने, उन्होंने कहा, पचास साल पूरे अकेले काटे हैं।
कमरे में सन्नाटा था।
और उस सन्नाटे में मुझे कुछ सुनाई दिया।
नहीं — मुझे कुछ महसूस हुआ।
मेरी जेब का ताला गरम हो रहा था।
मैंने हाथ जेब पर रखा।
गरम था।
बहुत गरम।
मीरा ने मेरी तरफ़ देखा — क्या हुआ?
— ताला, मैंने कहा।
— क्या?
— गरम हो रहा है।
उस्ताद ने मेरी तरफ़ देखा।
— निकालो, उन्होंने कहा।
मैंने ताला निकाला।
वो पहले से भी ज़्यादा गरम था।
मैंने उसे मेज़ पर रखा।
और जैसे ही उसे मेज़ पर रखा, घंटी — जो मेरी जेब से आकर मेज़ पर पड़ी थी — अपने आप बजी।
टिन।
बहुत हल्की।
और फिर एक आवाज़ आई।
धीमी।
दबी।
जैसे कोई मेरी ही आवाज़ में बोल रहा हो।
— दो का था, उसने कहा। एक का नहीं।
मेरे रोंगटे खड़े हो गए।
मैंने उस्ताद की तरफ़ देखा।
उनका मुँह खुला था।
— ये, उन्होंने कहा। ये मेरी आवाज़ है।
— क्या?
— यही मेरी आवाज़ है, उन्होंने कहा। जो मैंने पचास साल पहले बोली थी।
वो कुर्सी से उठने की कोशिश कर रहे थे, पर उनके पैर साथ नहीं दे रहे थे।
— बेटा, उन्होंने कहा। घंटी मेरी आवाज़ कैसे बोल रही है?
मैंने कुछ कहने की कोशिश की, पर आवाज़ नहीं निकली।
उसी वक़्त आवाज़ फिर आई।
— मुझे लौटना है।
कोई नहीं बोला।
— तुम्हारे बाबा का हिसाब अभी पूरा नहीं हुआ।
और फिर घंटी चुप हो गई।
वो फिर ठंडी थी।
बर्फ़ जैसी ठंडी।
कमरे में कुछ देर तक कोई नहीं बोला।
मैंने बस उस्ताद को देखा।
उन्होंने अपना हाथ मेज़ पर रखा, और अपना माथा उस पर टिका दिया।
फिर उन्होंने मेरी तरफ़ देखा।
— बेटा, उन्होंने कहा। जब मेरा भाई आएगा, तो ये सारी चीज़ें समझ आएँगी। पर आज रात एक और काम है।
— क्या?
— ये तस्वीर, उन्होंने कहा, मुझे चाहिए।
— क्यों?
— क्योंकि, उन्होंने कहा, मेरे भाई की लिखाई मेरे हाथ में होगी, तो वो कहीं भी छुपा हो, मैं उसे पहचान लूँगा।
मैंने तस्वीर की तरफ़ देखा।
मेरे पास मेरे बाबा का एक हिस्सा था। और मेरे दादा का एक हिस्सा था। और अब एक तीसरा हिस्सा भी था, जिसे उस्ताद ने पचास साल छुपाकर रखा था।
मैंने तस्वीर उस्ताद की तरफ़ बढ़ाई।
उन्होंने ली।
और उसे अपने सीने से लगा लिया।
शबनम आपा उठीं।
— अब बहुत हो गया, उन्होंने कहा। अब मैं चाय बनाती हूँ। कोई कुछ भी कहे, कोई पीएगा।
उन्होंने गुमटी की तरफ़ जाने की जगह मेज़ की तरफ़ देखा।
— केतली यहीं है? उन्होंने पूछा।
मैंने सिर हिलाया।
— है। पीछे, अलमारी के पास।
— तो फिर मैं यहीं बनाती हूँ।
वो उठीं और पीछे चली गईं।
मीरा ने मेरी तरफ़ देखा।
— अंकुश, उसने धीरे से कहा। सात बजे — चंद्रेश की गाड़ी — फाइल — वही पीतल की डिब्बी —
मैंने सिर हिलाया।
— मैं जानता हूँ।
— तो फिर? वो रुकी। तुम यहाँ बैठे हो?
मैंने उस्ताद की तरफ़ देखा।
— मीरा, मैंने कहा, वो मेज़ अब भी वहाँ है। फाइल अब भी वहाँ है। और उस डिब्बी में जो है, वो मेरी याद नहीं है। वो मेरे बाबा का हिसाब है। और मुझे लगता है कि आज रात वो हिसाब खुद खुलेगा।
— पर तुम यहाँ हो।
— हाँ।
— क्यों?
मैंने उसकी तरफ़ देखा।
— क्योंकि आज रात मुझे पता चला कि मेरे बाबा ने सब कुछ पहले से देख रखा था। और उन्होंने मुझे कुछ दिया था। ये घंटी नहीं। ये घंटी तो मेरे पास पहले से थी। उन्होंने मुझे एक नाम दिया था।
— कौन सा नाम?
— ये नाम नहीं, मैंने कहा। ये कहानी है।
मैंने घंटी उठाई।
— और आज रात, मैंने कहा, मुझे पता चला कि ये कहानी मेरी अकेली की नहीं है। ये दो भाइयों की है। और उनका एक-दूसरे से कुछ कहना बाकी है।
उस्ताद ने मेरी तरफ़ देखा।
— क्या कहना है? उन्होंने पूछा।
— वही, मैंने कहा, जो आपने पचास साल में नहीं कहा।
उस्ताद की आँखें फिर भर आईं।
— बेटा, उन्होंने कहा। तुम मुझसे कह रहे हो कि मैं अपने भाई से माफ़ी माँगूँ?
— नहीं, मैंने कहा। मैं ये कह रहा हूँ कि आप अपने भाई से मिलें।
— वो कहाँ है?
— नहीं पता, मैंने कहा। पर मैं इतना जानता हूँ कि ये तस्वीर, रास्ता, ये निशान — ये सब किसी ने गढ़ा है। कोई है जो चाहता है कि ये सब सामने आए।
उस्ताद ने गहरी साँस ली।
— तो फिर, उन्होंने कहा, हमें उसका इंतज़ार करना चाहिए?
— नहीं, मैंने कहा।
— तो?
मैंने घंटी उनकी तरफ़ बढ़ाई।
— आप इसे पकड़िए।
उन्होंने देखा।
— मैं?
— हाँ।
— क्यों?
— क्योंकि, मैंने कहा, अगर ये घंटी आपके भाई की है, तो इसका सच भी आपके हाथ में होना चाहिए।
कुछ पल वो चुप रहे।
फिर उन्होंने हाथ बढ़ाया।
और घंटी उनके हाथ में पड़ी।
कुछ नहीं हुआ।
कोई आवाज़ नहीं।
कोई गरमाहट नहीं।
बस एक बूढ़े आदमी के हाथ में एक पुरानी घंटी।
वो उसे देखते रहे।
फिर बोले।
— मेरे भाई की घंटी, उन्होंने कहा, मेरे हाथ में है।
— हाँ।
— और ये चुप है।
— हाँ।
— क्यों?
— क्योंकि, मैंने कहा, ये मेरी है। और अभी ये सिर्फ़ मेरी आवाज़ पहचानती है।
उस्ताद ने सिर हिलाया।
— तो चुप है, उन्होंने कहा। अच्छा है। चुप रहना सीख लिया इसने।
उन्होंने घंटी मुझे लौटा दी।
और वो उठे।
— मीरा, उन्होंने कहा।
— जी?
— तुम्हारा कैमरा अभी क्या कर रहा है?
मीरा ने उसे देखा।
— कुछ नहीं। बंद है।
— अच्छा, उन्होंने कहा। आज इसे बंद रहने दो। जब मेरा भाई आएगा, तब खोलना।
वो दरवाज़े की तरफ़ बढ़े।
— उस्ताद, मैंने कहा। आप कहाँ जा रहे हैं?
— दुकान के बाहर, उन्होंने कहा। मुझे हवा चाहिए।
वो रुके।
— और एक बात, उन्होंने कहा।
— क्या?
— तुम्हारे पापा की तरफ़ देखो।
मैंने पापा की तरफ़ देखा।
वो वही बैठे थे, सीधे, हाथ गोद में।
लेकिन अब उनके होंठ नहीं हिल रहे थे।
वो सिर्फ़ देख रहे थे।
— पापा? मैंने कहा।
उन्होंने धीरे से सिर उठाया।
और उनकी आवाज़ ऐसी थी जैसे किसी ने पत्थर में से निकाली हो।
— अंकुश, उन्होंने कहा। उस रात मैंने ये तस्वीर सिर्फ़ दरवाज़े से देखी थी। कभी छुई नहीं थी। पचास साल से सोचता रहा कि उसे छूने का हक़ मेरा नहीं है।
वो रुके।
— आज छुई। तो लगा, जैसे मैंने खुद को छू लिया।
मैंने कुछ नहीं कहा।
— और एक बात, पापा ने कहा। मुझे उस तस्वीर में एक चीज़ और दिखी।
— क्या?
— तस्वीर के दाएँ कोने में, उन्होंने कहा। ज़मीन पर — वो हल्की सी लकीर देख रहे हो?
मैंने देखा।
हल्की लकीर थी। जैसे तस्वीर के किनारे पर किसी ने हल्की सी स्याही से लकीर खींच दी हो।
— ये क्या है?
— तारीख़, पापा ने कहा।
— तारीख़?
— हाँ। धुँधली पड़ गई है। पर जब मैंने देखा, तो लगा — ये वही तारीख़ है जो बही के आख़िरी पन्ने पर थी। जिस रात आग लगी थी, उससे पहले की तारीख़।
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