The Mysterious Bell – Chapter 1253
— और मैंने उसे उठाया, मैंने कहा। मैंने खुद उठाया था। उस दराज़ में ये बाकी काग़ज़ों के साथ पड़ी थी। ऊपर नहीं। नीचे। सबसे नीचे, एक रस्सी में बँधी हुई।
— बँधी हुई? उस्ताद ने पूछा।
— हाँ, मैंने कहा। बहुत पुरानी रस्सी। किसी ने उसे बाँधकर रखा था। जैसे कोई गठरी हो।
उस्ताद ने आँखें बंद कर लीं।
— रस्सी, उन्होंने कहा।
— क्या हुआ?
— मेरी दराज़ में भी, उन्होंने कहा, वो रस्सी में बँधी थी। और मैंने उसे कभी नहीं खोला। मैंने सिर्फ़ महसूस किया कि वो वहाँ है।
वो फिर चुप हो गए।
मैंने उन्हें देखा।
और मुझे समझ आया कि ये सिर्फ़ एक तस्वीर नहीं है। ये एक हाथ का निशान है। कोई इस तस्वीर को एक जगह से दूसरी जगह ले जा रहा है, और वो चाहता है कि हर जगह कोई न कोई उसे देखे।
मीरा ने तस्वीर उठाई।
— उस्ताद, उसने कहा, इसके पीछे कुछ लिखा है।
उस्ताद ने उसकी तरफ़ देखा।
— पढ़ो।
मीरा ने पलटी।
कमरे का बल्ब उसके चेहरे पर पड़ा।
और उसकी आवाज़ बदल गई।
— नीली स्याही में, उसने कहा। बहुत पुरानी। और लिखा है —
वो रुकी।
— पढ़ो, उस्ताद ने कहा। उनकी आवाज़ अब बहुत धीमी थी।
मीरा ने गला साफ़ किया।
और पढ़ा।
— जोड़ दो का था। एक का नहीं।
कमरे में सन्नाटा छा गया।
शबनम आपा ने अपना माथा हाथ में रख लिया।
बबलू ने अपना पानदान बंद किया, और उसका हाथ काँप रहा था।
पापा ने आँखें बंद कर लीं।
और उस्ताद — उस्ताद ने अपना हाथ मेज़ पर रखा और उस पर अपना माथा टिका दिया।
वो कुछ देर वैसे ही बैठे रहे।
फिर धीरे से बोले।
— दो का था, उन्होंने कहा। एक का नहीं।
वो उठे।
— मुझे याद है, उन्होंने कहा। ये मेरी लिखाई नहीं है। ये मेरे भाई की है। और उसने ये तब लिखा था, जब हमने घंटी बनाई थी। और मैंने उससे कहा था कि ऐसा क्यों लिखते हो, ये तो दुकान का हिसाब है। और उसने कहा था — भाई, ये हिसाब नहीं है। ये वादा है।
उस्ताद ने कुर्सी पकड़कर खुद को सँभाला, क्योंकि उनके घुटने अब भी काँप रहे थे, और वो एक पल के लिए ऐसे झुके जैसे गिर जाएँगे।
मैं उठा।
— उस्ताद—
— बैठ, उन्होंने कहा। बैठ जा, बेटा। मैं गिर नहीं रहा। मैं सिर्फ़ — मैं सिर्फ़ ये नहीं सँभाल पा रहा कि ये नाम आज मुझे किसी कमरे में मिल रहा है।
वो फिर बैठ गए।
और फिर उन्होंने तस्वीर अपनी तरफ़ खींची।
उनके हाथ अब भी काँप रहे थे, पर उन्होंने उसे दोनों हाथों से पकड़ा।
— दोनों बैठे हैं, उन्होंने कहा। वो देखो। मेरे भाई का हाथ मेज़ पर है। और मेरा हाथ साइकिल के हैंडल पर। और बीच में — ये घंटी।
वो रुके।
— वो घंटी नहीं रखते थे, उन्होंने कहा। वो कहते थे घंटी मेज़ पर ठीक नहीं लगती। मैंने कहा था — फोटो के लिए रख लो। और वो हँसे थे। और मैंने कहा — मुझे वो हँसी हमेशा याद रहेगी।
उनकी आवाज़ फँस गई।
— और वो, उस्ताद ने कहा, वो हँसी पचास साल से याद है। हर बार जब मैंने दुकान खोली, हर बार जब मैंने सुई बदली, हर बार जब कोई कुर्ता सिलकर गया, मुझे लगा कि वो दरवाज़े पर खड़ा है और वापस आ जाएगा।
पापा ने — पापा ने फिर उस तस्वीर को छुआ।
इस बार उन्होंने काँच नहीं छुआ।
उन्होंने उस्ताद का हाथ छुआ।
उस्ताद ने उनकी तरफ़ देखा।
और कुछ देर दोनों एक-दूसरे को देखते रहे।
फिर उस्ताद ने सिर हिलाया।
— तुम्हारे बाबा, उन्होंने पापा से कहा, मेरे साथ बैठते थे। यहाँ। इसी गली में। मेरी दुकान के बाहर, उस लकड़ी की मेज़ पर जो अब नहीं है। और वो ये तस्वीर जेब में रखते थे। और मैं उनसे कहता था — जगदीश, ये तस्वीर तेरे पास क्यों है, ये तो मेरी भी है। और वो हँसते थे।
मैं चुपचाप सुनता रहा।
मीरा ने अपनी कलम उठा ली थी, पर कुछ लिख नहीं रही थी। वो भी सुन रही थी।
— और एक दिन, उस्ताद ने कहा, मेरा भाई मेरी दराज़ खोलकर ये तस्वीर लेकर चला गया। और मेरे सामने तुम्हारे बाबा आए — और उन्होंने कहा था कि तेरे भाई ने मेरे घर से ये तस्वीर ले ली।
वो रुके।
— कितना बेवकूफ़ हूँ मैं, उन्होंने कहा। मैंने उस पर यक़ीन कर लिया।
अब उनकी आवाज़ अब और धीमी थी।
— और मैंने अपने भाई को बोलना बंद कर दिया।
शबनम आपा ने अचानक कहा — उस्ताद, रोइए मत।
— मैं रो नहीं रहा, बेटी, उन्होंने कहा। पर उनकी आँखें साफ़ कह रही थीं कि वो रो रहे थे।
— मैं, उन्होंने कहा, बस सोच रहा हूँ कि ये तस्वीर यहाँ से वहाँ कैसे पहुँची। मेरी दराज़ से रिकॉर्ड कमरे तक। पचास साल में।
उन्होंने कमरे में हर आदमी की तरफ़ देखा।
और उनकी आवाज़ में जो आई, वो मैंने पहले कभी नहीं सुनी।
— मेरी दराज़ का ताला मैंने आज शाम खोला, उन्होंने कहा। और उसमें कुछ भी नहीं था। तस्वीर नहीं थी। कुछ नहीं था।
बबलू ने धीरे से कहा — तो कोई है जो आपकी दराज़ खोल सकता था।
— हाँ, उस्ताद ने कहा।
वो फिर खड़े हुए।
और इस बार उनके पैर नहीं काँप रहे थे।
वो सीधे खड़े थे।
उनकी आवाज़ अब बैठी हुई नहीं थी।
— मैंने पचास साल तक सोचा, उन्होंने कहा, कि मेरा भाई भाग गया। कहीं चला गया। मर गया। अब मुझे समझ आ रहा है कि वो नहीं भागा था। उसे भगाया गया था।
उन्होंने मेरी तरफ़ देखा।
— जिस किसी ने ये तस्वीर मेरी दराज़ से निकाली, उसने ये चाहा कि ये मुझ तक न पहुँचे। और फिर आज, अचानक, ये एक ऐसी जगह पड़ी मिलती है जहाँ मुझे ही नहीं, मेरे भाई के ख़ून और अनजान बच्चे को भी मिल सकती थी।
— मतलब, मीरा ने धीरे से कहा, किसी ने इसे आप तक पहुँचाना चाहा।
— नहीं, उस्ताद ने कहा। किसी ने इसे अंकुश तक पहुँचाया। मुझ तक नहीं। मैं इस कमरे में आज इसलिए हूँ क्योंकि अनकुश ने मुझे बुलाया था।
वो मेरी तरफ़ मुड़े।
— बेटा, तुमने आज शाम मुझे क्यों बुलाया था?
मैंने कुछ नहीं कहा।
— मुझे आज बताया गया था, उन्होंने कहा, कि दुकान पर कोई पुरानी चीज़ मिली है और उसे देखने मैं आऊँ। और मैं आया, और तुमने मुझे वो सुई दी जिसमें तुम्हारे बाबा का नाम था। और फिर ये तस्वीर।
वो रुके।
— कोई चाहता है, उन्होंने कहा, कि मैं आज इस कमरे में बैठूँ।
कमरे में फिर चुप्पी।
पर ये चुप्पी अलग थी। इसमें हवा नहीं बंद थी। इसमें डर नहीं था। इसमें कुछ और था — कुछ जो होने वाला था।
मैंने तस्वीर की तरफ़ देखा।
दो जवान आदमी। एक की उम्र के बारे में सोच रहा था — पच्चीस, तीस। दोनों के चेहरे पर मुस्कान।
पीछे एक दुकान। कम ऊँचाई का शटर। बाहर एक लकड़ी की मेज़। उस पर बिखरे पुर्ज़े। और बीच में, ठीक बीच में, वही घंटी।
ठीक वैसी, जैसी अभी मेरी जेब में पड़ी है।
मैंने घंटी फिर निकाली।
वो अब भी ठंडी थी।
पर उस पर उँगली रखने पर, मुझे लगा कि वो साँस ले रही है। नहीं — शायद मैं था जो साँस ले रहा था और मुझे ऐसा लग रहा था।
मैंने उसे मेज़ पर रखा।
उस्ताद ने देखा।
— रख दिया, उन्होंने कहा।
— हाँ।
— अच्छा किया।
वो फिर कुर्सी पर बैठे।
और उन्होंने अपनी आँखें उस तस्वीर पर टिका दीं।
कुछ देर ऐसे ही बैठे रहे।
फिर, धीरे-धीरे, जैसे कोई आदमी अपने नाम की कीमत बता रहा हो, वो बोले।
— बेटा, उन्होंने कहा। मेरा भाई मरा नहीं है।
कमरे में हर आदमी हिल गया।
— क्या? बबलू ने कहा।
उस्ताद ने उसकी तरफ़ देखा।
— मेरा भाई मरा नहीं है, उन्होंने दोहराया।
— उस्ताद, आप कैसे कह सकते हैं — मैंने कहा।
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