The Mysterious Bell – Chapter 1252
उनकी उँगली तस्वीर के काँच पर पड़ी।
और काँपी।
मैंने पापा को ऐसे काँपते पहले कभी नहीं देखा था। न माँ के अस्पताल में, न उस रात जब उन्होंने अंगूठा लगाया था, न कभी भी।
उनकी उँगली काँच पर फिसलती रही, जैसे किसी चेहरे को पहचानने की कोशिश कर रही हो।
— शिवनारायण, पापा ने फुसफुसाया।
— हाँ, उस्ताद ने कहा।
— ये मेरे बाबा हैं।
— हाँ।
— और ये दूसरा — पापा की आवाज़ रुकी।
— ये, उस्ताद ने कहा, मेरा भाई है।
मैंने अपनी कुर्सी की बाँह पकड़ ली।
मेरे पीछे कोई हिला। मीरा थी। उसने अपना फटा बैग गोद में रख लिया, जैसे उसे पकड़कर खुद को सँभालना हो।
— उस्ताद, मैंने कहा, आपने कभी नहीं बताया कि आपका भाई भी—
— मैंने कभी नहीं बताया, उन्होंने कहा, क्योंकि मैं खुद भूलने की कोशिश करता रहा।
वो उठे।
धीरे।
एक हाथ मशीन पर, दूसरा मेज़ पर।
और वो तस्वीर के पास आए।
उन्होंने बबलू की तरफ़ देखा।
— हटो।
बबलू तुरंत हट गया, जैसे उस पर कोई चीज़ गिरने वाली हो।
उस्ताद तस्वीर के सामने खड़े हुए और बहुत देर तक कुछ नहीं बोले।
मैं चुपचाप देखता रहा।
मैं उनके चेहरे को पढ़ने की कोशिश कर रहा था, पर पढ़ नहीं पा रहा था। उनकी आँखों से सिर्फ़ पानी आ रहा था, और उनके होंठ हिल रहे थे, पर आवाज़ नहीं निकल रही थी।
फिर वो बोले।
— पचास साल, उन्होंने कहा। पचास साल से ये तस्वीर मेरी दराज़ में बंद है।
मेरा गला सूख गया।
— क्या?
— मेरी दराज़ में, उस्ताद ने कहा। इस मशीन के नीचे वाली दराज़। ताले में। और मैंने इसे किसी को नहीं दिखाया। मैंने इसे खुद भी नहीं देखा, बेटा। कभी-कभी ताला खोलकर सिर्फ़ हाथ नीचे डालकर महसूस किया कि ये वहाँ है। और फिर बंद कर दिया।
— तो फिर — मैंने कहा। मेरी आवाज़ भी अब फँसने लगी थी। तो ये यहाँ कैसे—
— वही सवाल, उस्ताद ने कहा।
वो पलटे।
उनकी आँखें कमरे में हर आदमी पर एक-एक करके पड़ीं।
— ये तस्वीर मेरी दराज़ से निकली, और स्कूल के रिकॉर्ड कमरे की दराज़ में पहुँची। मेरी दराज़ वहाँ से तीन किलोमीटर दूर है। मेरी दराज़ का ताला किसी ने तोड़ा नहीं — मैंने खुद आज शाम देखा। इसलिए ये चोरी नहीं थी। ये किसी ने मुझसे लिया, या किसी ने मुझे बेच दिया, या —
वो रुके।
— या कोई और था जो इसे वहाँ रख सकता था।
शबनम आपा ने पहली बार कुछ कहा।
— उस्ताद, आप क्या कह रहे हैं?
— मैं कह रहा हूँ, उस्ताद ने कहा, कि इस दुनिया में सिर्फ़ एक आदमी था जो मेरी दराज़ का ताला कभी भी खोल सकता था, बिना तोड़े। और वो मेरा भाई था।
कमरे में हवा की आवाज़ भी बंद हो गई।
— पचास साल पहले, उस्ताद ने कहा, धीरे-धीरे, जैसे हर शब्द किसी दूर की खदान से निकाल रहे हों, हम दोनों ने एक दुकान में घंटी बनाई थी। मैं उससे उम्र में बड़ा था, इसलिए ये मान लिया गया कि बड़ा हिस्सा मेरा। पर उसने कभी शिकायत नहीं की। उसने कहा — भाई, तू हिसाब रख, मैं हाथ रखता हूँ।
उन्होंने तस्वीर पर उँगली रखी, ठीक उस घंटी पर।
— और फिर आग लगी।
मीरा कुछ लिख रही थी। मैंने देखा — उसकी कलम रुक गई थी, काग़ज़ पर स्याही की बूँद फैल गई थी।
— आग के बाद, उस्ताद ने कहा, हमने एक-दूसरे पर इल्ज़ाम लगाया। हिसाब जला। तीसरा आदमी आया — वही सफ़ेद कुर्ते और चमकते जूतों वाला — और उसने हवा में एक बात छोड़ी। बस एक बात। और वो बात ऐसी बैठी कि मेरा भाई मेरी दराज़ से वो तस्वीर लेकर चला गया, और मैंने उसे कभी माफ़ नहीं किया।
— और वो घंटी? मैंने पूछा। ये घंटी मेरी जेब में है, उस्ताद। ये मेरी घंटी है।
— जानता हूँ, उन्होंने कहा।
— तो ये इलाही की कैसे हुई?
उस्ताद ने मेरी तरफ़ देखा।
और उनकी आवाज़ बदल गई।
— बेटा, वो दो घंटियाँ थीं। जुड़वाँ। एक जीभ वाली, एक बिना जीभ वाली। मैंने उसे बेचा, या उसने मुझे — पचास साल का धुंध है, और अब सच याद नहीं। पर इतना याद है कि दोनों एक ही साँचे से बनी थीं। एक ही पीतल। एक ही फूल। और उस फूल के नीचे हम दोनों ने अपने हाथ के नाखून से एक छोटा निशान काटा था — जो सिर्फ़ हमें पता था।
मैंने अपनी जेब से घंटी निकाली।
वो ठंडी थी। बर्फ़ जैसी नहीं, पर ठंडी।
मैंने उसे उस्ताद की तरफ़ बढ़ाया।
उन्होंने नहीं लिया।
— देखो, बेटा, उन्होंने कहा। फूल के नीचे।
मैंने घंटी पलटी।
कमरे के बल्ब की पीली रोशनी उस पर पड़ी।
और मैंने देखा।
फूल की पंखुड़ियों के नीचे, एक छोटी सी जगह में, दो हल्की लकीरें थीं। इतनी हल्की कि इतने साल में घिस गई थीं। पर थीं।
— मैंने ये नहीं काटा, मैंने कहा।
— नहीं, उस्ताद ने कहा। ये किसी ने काटा था जो इसे अपनी समझता था।
वो कुर्सी पर वापस बैठे।
कमरा धीरे-धीरे बोलने लगा — जैसे हर आदमी के अंदर कुछ चल रहा हो और आवाज़ के लिए जगह ढूँढ रहा हो।
बबलू ने पहले बोला।
— उस्ताद, उसने कहा, उसकी आवाज़ चरमरा रही थी। साहब का ताबीज़ —
— क्या?
— उस पर भी एक फूल है। और साहब उसे कभी नहीं उतारते। कभी नहीं। न नहाने में, न सोने में।
मैंने पूछा — तुमने उसे कभी करीब से देखा है?
बबलू ने कुछ देर सोचा।
फिर उसने अपना पानदान — जो अब भी उसकी जेब में था — बाहर निकाला, और उसे खोलकर मेज़ पर रख दिया।
— मैं कोई जासूस नहीं हूँ, उसने कहा। मैं बस उसके कमरे में सालों खड़ा रहा। एक बार वो खाँस रहे थे और ताबीज़ हिल गया, और मैंने देखा कि पीछे की तरफ़ कुछ खुदा है। मुझे समझ नहीं आया था तब।
— क्या खुदा था?
— एक आदमी का नाम, उसने कहा। या दो नाम। मैंने पढ़ा नहीं, बस दूर से देखा था। पर आज — तस्वीर देखकर — मुझे लगता है कि वो नाम श्रीनारायण जैसा कुछ था।
— शिवनारायण, मैंने कहा।
बबलू ने सिर हिलाया।
— हाँ, उसने कहा। शायद। हाँ।
मैंने पापा की तरफ़ देखा।
पापा बैठे थे, बिल्कुल सीधे, हाथ गोद में, और उनके होंठ धीरे-धीरे हिल रहे थे — जैसे वो कोई पुरानी प्रार्थना दोहरा रहे हों, या कोई नाम।
— पापा, मैंने कहा।
उन्होंने मेरी तरफ़ नहीं देखा।
— पापा।
फिर उन्होंने देखा।
और उनकी आँखों में वो चीज़ थी जो मैंने उनमें कभी नहीं देखी थी। डर नहीं। ग़म नहीं। कुछ और। कुछ गहरा। जैसे कोई आदमी बाईस साल बाद अपनी लिखी हुई किताब का आख़िरी पन्ना पढ़ रहा हो, और देख रहा हो कि आख़िरी पन्ना उसने नहीं लिखा था।
— ये तस्वीर, पापा ने कहा, ये मेरे बाबा की दराज़ में थी। उनकी दुकान की दराज़ में।
— क्या?
— मैं छोटा था, उन्होंने कहा। मुझे याद है। वो रात में अकेले बैठकर इस तस्वीर को देखते थे, और मैं दरवाज़े से झाँकता था। वो मुझे कभी पास नहीं बुलाते थे। कभी नहीं। और एक दिन, जब दुकान जल गई थी, और हम किसी और जगह बैठे थे, मैंने उनसे पूछा — बाबा, वो तस्वीर कहाँ गई? और वो चुप रहे। बस चुप।
— तो तस्वीर यहाँ से गई, उस्ताद ने कहा। उनकी आवाज़ में अचानक एक लकीर आ गई थी। तुम्हारे बाबा की दराज़ से।
— हाँ, पापा ने कहा।
— और मेरी दराज़ में आई।
— हाँ।
— तो बीच में कौन था? उस्ताद ने कहा।
पापा ने सिर हिलाया। धीरे।
— मुझे नहीं पता, उन्होंने कहा।
मीरा ने पहली बार बीच में बोला।
— उस्ताद, उसने कहा, एक बात है।
उस्ताद ने उसकी तरफ़ देखा।
— ये तस्वीर आज शाम को रिकॉर्ड कमरे की दराज़ में थी, है ना?
— हाँ।
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