The Mysterious Bell – Chapter 1250
कमरे में एक भी आवाज़ नहीं आई।
"मैंने इसे किसी को नहीं दिखाया," उस्ताद ने कहा। "न अपने परिवार को, न अपने भाई को, न किसी को। ये मेरी दराज़ में थी। मेरी दुकान की, उस दराज़ में — जिसकी चाबी सिर्फ़ मेरे पास है।"
उन्होंने मेरी तरफ़ देखा।
"मैंने आज सुबह उस दराज़ को खोला था।"
मेरे रोंगटे खड़े हो गए।
"क्यों?"
"क्योंकि कुछ दिन पहले मुझे लगा था कि कोई मेरी दुकान में आया है," उस्ताद ने कहा। "कुछ चीज़ें अपनी जगह पर नहीं थीं। ट्रंक खुला था। मैंने सोचा, शायद मुझे भ्रम हुआ। पर आज सुबह जब मैंने दराज़ खोली —"
उन्होंने रुककर फ्रेम को देखा।
"तस्वीर वहाँ नहीं थी," उन्होंने कहा। "दराज़ खाली थी। सिर्फ़ एक चौकोर धूल का निशान बचा था — जहाँ तस्वीर पचास साल पड़ी रही थी।"
कमरे में एक और सन्नाटा उतरा।
शबनम आपा ने पहली बार अपनी केतली ज़मीन पर रखी और मेज़ के पास आईं।
"उस्ताद," उन्होंने कहा, "आपने किसी को नहीं बताया?"
"किसे बताता?" उस्ताद ने कहा। "किसे? ये तस्वीर मेरे लिए कोई तस्वीर नहीं थी, बेटी। ये मेरे भाई का चेहरा था — जिसे मैंने पचास साल से देखा नहीं, और जिसे रोज़ रात अपनी दराज़ में बंद करके सोता था। अगर मैं किसी को बताता कि तस्वीर खो गई है, तो मुझसे पूछा जाता — कौन सी तस्वीर?" उन्होंने काँपती आवाज़ में कहा। "और मैं जवाब नहीं दे सकता था।"
मैंने पापा की तरफ़ देखा।
वो अब भी अपनी उँगली फ्रेम पर रखे थे।
"उस्ताद," मैंने कहा, "ये तस्वीर मुझे रिकॉर्ड कमरे की दराज़ से मिली।"
उन्होंने मेरी तरफ़ देखा।
"रिकॉर्ड कमरे की दराज़ से?"
"हाँ। उस रात, जब काग़ज़ जल रहे थे। मैंने बंडल उठाया, और साथ में ये — फ्रेम — भी चुपके से उठा लिया।"
उस्ताद ने आँखें बंद कर लीं।
फिर खोलीं।
और उन्होंने वो कहा जो मैं सुनने के लिए तैयार नहीं था।
"अंकुश," उन्होंने कहा, "ये तस्वीर मेरी दराज़ से निकली। और ये रिकॉर्ड कमरे की दराज़ में पहुँची। तस्वीर चलती नहीं है, बेटा। तस्वीर को कोई ले जाता है।"
मैं चुप हो गया।
"मेरी दुकान की दराज़, जिसकी चाबी सिर्फ़ मेरे पास थी," उस्ताद ने कहा। "उसे कोई ऐसे नहीं खोल सकता।"
"तो कौन खोल सकता था?" मीरा ने पूछा।
उस्ताद ने उसकी तरफ़ देखा। उनकी आँखों में वो पहली चमक लौट रही थी — नहीं, वो पुरानी चमक नहीं थी। कुछ और। कुछ सख़्त।
"कोई जिसके पास पचास साल पुरानी चाबी हो," उस्ताद ने कहा।
उन्होंने तस्वीर की तरफ़ हाथ बढ़ाया।
और फिर उन्होंने फ्रेम पलट दिया।
तस्वीर की पीठ।
लकड़ी के पीछे, काग़ज़ की एक परत चिपकी थी — पुरानी, नीली स्याही से लिखी हुई। कुछ अक्षर घिस गए थे, पर एक पंक्ति साफ़ पढ़ी जा सकती थी।
उस्ताद ने उसे पढ़ा।
और उनकी आवाज़ रुक गई।
मैंने गर्दन आगे की।
पंक्ति थी —
"जोड़ दो का था — एक का नहीं।"
कमरे में फिर सन्नाटा।
पर इस बार सन्नाटा कुछ और था। कुछ गहरा।
शबनम आपा ने पहली बार मेरी तरफ़ देखा। "इसका क्या मतलब है?"
मैंने उस्ताद की तरफ़ देखा।
वो चुप थे।
"उस्ताद?"
उन्होंने आँखें उठाईं।
"इसका मतलब," उन्होंने धीरे से कहा, "यह है कि घंटी मेरी अकेली नहीं थी। न कभी रही।"
"मतलब?"
"घंटी दो हिस्सों की थी," उस्ताद ने कहा। "मैंने तुम्हें बताया था — दो बक्श, दो दुकानें, दो घंटियाँ। पर ये —"
उन्होंने तस्वीर की तरफ़ देखा।
"ये उससे पुरानी बात है, बेटा।"
मैंने कुर्सी खींचकर बैठा।
"उस्ताद," मैंने कहा, "आज रात आपको सब बताना पड़ेगा।"
उन्होंने मेरी तरफ़ देखा। लंबा, गहरा — जैसे पचास साल की चुप्पी से बाहर निकलने वाला हर शब्द उनके अंदर तोला जा रहा हो।
"जो मैंने कभी किसी को नहीं बताया?"
"हाँ।"
"क्योंकि?"
"क्योंकि आज रात," मैंने कहा, "मैं रणवीर के मैदान में खाली हाथ लौटा हूँ, पर आपकी दराज़ से चोरी हुई तस्वीर मेरी जेब में है। और जो इसे ले गया —"
मैंने रुककर उस्ताद की तरफ़ देखा।
"— वो हमें जानता है। हमसे पहले जानता है।"
उस्ताद ने एक लंबी साँस ली।
"ठीक है," उन्होंने कहा।
उन्होंने फ्रेम उठाया और उसे अपनी गोद में रख लिया।
"मेरे भाई का नाम," उन्होंने कहा, "इलाही बक्श था। हम दोनों पैदा हुए थे उसी दिन, उसी घर में, पर मैं पाँच साल बड़ा था। वो मेरे पीछे-पीछे चलता था — दुकान तक, बाज़ार तक, हर जगह। हमारे पापा ने हमें इसी बात पर हँसाया था — कि हम दोनों एक ही साँस से जीते हैं।"
उन्होंने मेरी तरफ़ देखा।
"मैंने तुम्हें बताया था कि हमने साथ तंत्र चलाया था।"
"हाँ।"
"वो सच था।" उन्होंने धीरे से कहा। "पर उससे पहले — उससे बहुत पहले — हमने वो घंटी बनाई थी। इलाही और मैंने नहीं — उसे शिवनारायण यादव और इलाही ने बनाया था।"
मेरी साँस रुक गई।
"मेरे परदादा और आपके भाई?"
"हाँ।"
"कब?"
"पचास साल पहले से भी ज़्यादा," उस्ताद ने कहा। "वो दोनों मिस्त्री थे — पुराने बाज़ार के। एक ही गली में, दोनों की छोटी दुकानें। शिवनारायण यादव साइकिलें बनाते थे। इलाही बक्श पुर्ज़े। और एक दिन —"
उन्होंने फ्रेम को अपने हाथ से सहलाया।
"एक दिन उन्होंने तय किया कि ये घंटी बनाएँगे। ऐसी घंटी जो सिर्फ़ एक बार बजेगी — और उसके बाद कभी नहीं।"
"क्यों?"
"क्योंकि," उस्ताद ने कहा, "वो दोनों यह चाहते थे कि उनकी दोस्ती एक बार ऐसी बजे कि आगे कोई भी टूटन उसे न तोड़ सके।"
कमरे में रोशनी धीमी हो रही थी। पुराना बल्ब गुनगुनाने लगा, जैसे वो भी सुन रहा हो।
"उन्होंने घंटी बनाई," उस्ताद ने कहा, "और उसे दो हिस्सों में ढाला। एक हिस्सा शिवनारायण ने रखा, दूसरा इलाही ने। और उन्होंने तय किया कि उनके बेटे — जब वो बड़े हों — इसे जोड़ेंगे।"
मेरी आँखें लगीं पापा पर।
पापा बैठे थे — पत्थर होकर।
"तो फिर," मैंने कहा, "ये घंटी मेरे पास कैसे पहुँची? अगर ये इलाही बक्श का हिस्सा था —"
"अंकुश," उस्ताद ने कहा, "मैंने तुम्हें कभी नहीं बताया कि मेरा भाई मरा है।"
मेरी साँस अटक गई।
"मैंने सिर्फ़ ये कहा था कि मैंने उसे खो दिया। खोना और मरना एक बात नहीं है।"
शबनम आपा ने मुँह पर हाथ रख लिया।
"मैंने तुम्हें बताया था," उस्ताद ने कहा, "कि पचास साल पहले हमारे बीच झगड़ा हुआ और हम बिछड़ गए।"
"हाँ।"
"वो झगड़ा," उस्ताद ने कहा, "घंटी का नहीं था।"
उन्होंने रुककर मेरी तरफ़ देखा।
"वो झगड़ा मेरी माँ के इलाज का था।"
कमरा एक और ज़्यादा चुप हो गया।
"माँ के इलाज के लिए पैसे चाहिए थे," उस्ताद ने कहा। "इलाही ने कहा — घंटी बेच दो। मैंने कहा — नहीं, कभी नहीं। उसने कहा — माँ पहले, घंटी बाद में। मैंने कहा — घंटी माँ से पहले नहीं, पर घंटी माँ के बाद भी नहीं। बात बढ़ी, हम लड़े, हमने एक-दूसरे से ऐसी बात कह दी जो कोई भाई भाई से नहीं कहता। फिर दवा देर से आई, और माँ चली गई। और मैंने इलाही से बोलना बंद कर दिया।"
उनकी आवाज़ छोटी हो गई थी। छोटी और थकी हुई।
"फिर एक दिन," उस्ताद ने कहा, "इलाही दुकान पर आया। वो मेरी दुकान पर कभी नहीं आया था। वो आया, दरवाज़े पर खड़ा रहा, बोला नहीं। सिर्फ़ घंटी उतारकर मेज़ पर रख दी। फिर वापस मुड़कर चला गया।"
मेरा गला सूख गया।
"और फिर?"
"और फिर," उस्ताद ने कहा, "अगले दिन बाज़ार में आग लगी।"
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