The Mysterious Bell – Chapter 1249
मीरा ने मेरी तरफ़ देखा।
मैंने अपनी कमीज़ की जेब टटोली।
वहाँ, कपड़े के एक मैले टुकड़े में लिपटा हुआ, एक छोटा सा लकड़ी का फ्रेम था।
वो फ्रेम मैंने रिकॉर्ड कमरे की दराज़ से उठाया था — उस रात, जब काग़ज़ जल रहे थे और मैंने सिर्फ़ बंडल और गठरी पर ध्यान दिया था। ये फ्रेम मेरी नज़र से छूट गया था, फिर भागते हुए मेरी उँगलियों में आ गया, और मैंने उसे वहीं कपड़े में लपेटकर जेब में डाल दिया — बिना देखे।
अब देखने का वक़्त था।
"चल," मैंने कहा। "उस्ताद की दुकान।"
मीरा ने कुछ नहीं पूछा। उसने बस कैमरा बंद किया और मेरे पीछे चल दी।
गली में लौटते वक़्त सन्नाटा था, पर वो सन्नाटा डर का नहीं था। वो सन्नाटा इंतज़ार का था। हर दरवाज़े के पीछे, हर शटर के नीचे, हर खिड़की के परदे के पीछे — लोग जाग रहे थे।
मैं जानता था कि सुबह होते-होते पूरी गली को पता चल जाएगा। पर आज रात, सिर्फ़ कुछ लोगों को पता होना चाहिए था।
उस्ताद की दुकान का शटर आधा उठा हुआ था। अंदर से पीली रोशनी की पतली लकीर बाहर आ रही थी।
मैंने शटर उठाया और अंदर गया।
पीछे वाले कमरे में सब पहले से बैठे थे।
उस्ताद अपनी सिलाई मशीन के पास, उसी लकड़ी की छोटी स्टूल पर। उनके सामने, फ़र्श पर, ट्रंक खुला पड़ा था — जिसे वो अभी बंद नहीं कर पाए थे। शबनम आपा दरवाज़े के पास खड़ी थीं, हाथ में चाय की केतली पकड़े — जो अब तक ठंडी हो चुकी थी। बबलू कोने में बैठा था, सिर झुकाए, बिना चेन, बिना पानदान। और पापा — पापा सबसे दूर, दीवार से टिककर, चुप, जैसे पिछले कुछ घंटों से एक भी शब्द न बोले हों।
मैंने देखा — टिंकू नहीं था। बच्चे नहीं थे। ये सही था। आज रात का काम बच्चों का नहीं था।
मैंने कमरे में कदम रखा।
"क्या हुआ?" शबनम आपा ने पूछा। उनकी आवाज़ में वो तेज़ी नहीं थी जो आम तौर पर होती थी। आज उनकी आवाज़ में थकान थी।
"कुछ नहीं मिला," मैंने कहा। "फाइल खाली थी। सातों पन्ने सफ़ेद।"
बबलू ने सिर उठाया।
"तो साहब ने —"
"साहब ने वही किया जो वो हमेशा करते हैं," मैंने कहा। "हमें खाली हाथ लौटा दिया।"
मैंने जेब से वो कपड़े में लिपटा फ्रेम निकाला।
"पर मैं खाली हाथ नहीं लौटा," मैंने कहा।
सबकी नज़रें मेरे हाथों पर आ गईं।
मैंने फ्रेम टेबल पर रखा — उस्ताद की सिलाई मशीन के बगल वाली लकड़ी की मेज़ पर, जहाँ उन्होंने पचास साल से कपड़े काटे थे।
फिर मैंने कपड़ा खोला।
एक लकड़ी का फ्रेम था। छोटा, हथेली भर से बड़ा। किनारे घिसे हुए, पर अंदर काँच साफ़ — जैसे किसी ने इसे बहुत संभालकर रखा हो।
काँच के अंदर एक काली-सफ़ेद तस्वीर थी।
मैंने फ्रेम उठाकर रोशनी के करीब किया।
तस्वीर में दो जवान आदमी खड़े थे।
पहला — लंबा, पतला, कंधे सीधे, बाल घने, और आँखों में एक चमक जो आज भी काग़ज़ से बाहर निकलकर मुझे देख रही थी। उसके हाथ में एक पीतल का औज़ार था, कमर पर एक फटा एप्रन बँधा था। मैंने उसे कभी नहीं देखा था, पर मैं जान गया कि वो कौन था। उसकी आँखें मेरी आँखों जैसी थीं।
शिवनारायण यादव।
मेरे परदादा।
मेरी साँस थोड़ी भारी हुई।
और दूसरा आदमी — दूसरा आदमी थोड़ा छोटा, थोड़ा गोल चेहरे वाला, माथे पर एक छोटा सा तिल, और मुस्कान ऐसी जैसे अभी किसी की बात पर हँसा हो। उसका एक हाथ शिवनारायण के कंधे पर था।
मैंने उसकी तरफ़ देखा।
और मेरे हाथ से फ्रेम फिसलता हुआ उस्ताद की तरफ़ बढ़ गया।
उस्ताद ने फ्रेम लिया।
उन्होंने देखा।
और उनकी साँस रुक गई।
कमरे में अचानक इतनी चुप्पी फैली कि मुझे अपनी साँस भी तेज़ सुनाई दी।
उस्ताद की उँगलियाँ फ्रेम पर कस गईं। उनका चेहरा — मैंने उन्हें कभी ऐसा नहीं देखा था। वो हमेशा सीधे बैठते थे, चश्मे के पीछे से सबको नापते थे, हर बात तोलकर बोलते थे। आज उनका चेहरा किसी बच्चे जैसा हो गया था।
उनके हाथ से कैंची गिरी।
टन।
लकड़ी के फ़र्श पर। जो आवाज़ कमरे में गूँजी, वो आधी कैंची की थी और आधी किसी बड़ी चीज़ के टूटने की।
उस्ताद ने कुर्सी पकड़ी और अपने को सँभाला।
"उस्ताद?" मैंने कहा।
वो नहीं बोले।
उन्होंने फ्रेम को आँखों के और करीब किया। उसके काँच पर उनकी साँस की भाप जम गई।
फिर।
"ये," उन्होंने धीरे से कहा, "ये घंटी…"
मैंने फ्रेम में फिर देखा।
तस्वीर के बीच में, दोनों आदमियों के बीच, एक छोटी लकड़ी की मेज़ थी। उस मेज़ पर — मैंने पहले नहीं देखा था — एक पीतल की घंटी रखी थी।
और वो घंटी मेरी जेब में पड़ी घंटी जैसी थी।
वही आकार। वही फूल। वही पीतल।
मैंने जेब से अपनी घंटी निकाली। ठंडी थी, फिर भी उँगली में फिट हो गई।
मैंने उसे उस्ताद की तरफ़ बढ़ाया।
उस्ताद ने फ्रेम में देखा। फिर मेरी हथेली में देखा। फिर फिर फ्रेम में।
और उनकी आँखें भर आईं।
"ये घंटी," उन्होंने कहा, और उनकी आवाज़ काँप रही थी — वो आवाज़ जो पचास साल से चट्टान जैसी थी, अब बालू जैसी हो गई थी — "ये घंटी मेरे भाई की है।"
कमरे में हवा जम गई।
शबनम आपा ने केतली नीचे रखी — धीरे से, जैसे कहीं कुछ टूट न जाए।
बबलू ने सिर उठाया।
मीरा ने कुछ लिखने के लिए कॉपी निकाली, फिर रोक दी — उसकी कलम हाथ में थी, पर वो नहीं चली।
"उस्ताद," मैंने धीरे से कहा, "आपका भाई?"
"इलाही," उस्ताद ने कहा।
नाम ऐसे निकला जैसे पचास साल से ज़ुबान पर रखा था, और आज पहली बार बाहर आया।
"इलाही बक्श," उन्होंने कहा। "मेरा छोटा भाई।"
मैंने पापा की तरफ़ देखा।
पापा अब भी दीवार से टिके बैठे थे। पर उनका चेहरा — उनका चेहरा स्थिर नहीं था। वो फ्रेम की तरफ़ देख रहे थे, और उनकी आँखों में कुछ ऐसा चल रहा था जिसे मैंने उनकी आँखों में कभी नहीं देखा था।
डर नहीं।
कुछ और।
वो धीरे से उठे।
उनके घुटने सीधे होने में देर लगी — पिछले कुछ दिनों में वो और झुक गए थे।
वो मेज़ तक आए।
उन्होंने हाथ बढ़ाया।
उनकी उँगली फ्रेम के काँच पर रुकी।
और काँपी।
पापा ने कभी ऐसे नहीं छुआ था किसी चीज़ को। वो हमेशा सीधे पकड़ते थे, कसकर — औज़ार हो या चाबी, चाय का गिलास हो या मेरा कंधा। पर अब उनका हाथ वैसे ही काँप रहा था जैसे सूखी टहनी हवा में।
"पापा?" मैंने धीरे से कहा।
वो नहीं बोले।
उन्होंने फ्रेम को उँगली से सहलाया — शिवनारायण यादव के चेहरे से शुरू करके, बीच की मेज़ तक, और फिर उस दूसरे आदमी के चेहरे पर रुक गए।
"ये मैंने देखा है," पापा ने धीरे से कहा।
कमरे में सबने उनकी तरफ़ देखा।
"कब?" मैंने पूछा।
"मैं छोटा था," उन्होंने कहा। "दुकान के पीछे एक बक्सा था। बाबा उसमें कुछ रखते थे। एक दिन उन्होंने मुझे उसमें से यही तस्वीर निकालकर दिखाई थी। फिर वापस रख दी, और कहा — बड़े होकर देखना।"
उन्होंने अपनी उँगली वापस खींची।
"मैं बड़ा हो गया," उन्होंने कहा, "पर तस्वीर फिर नहीं देखी।"
मैंने उस्ताद की तरफ़ देखा।
उनका चेहरा अब सँभल रहा था — धीरे-धीरे, जैसे किसी मशीन को ठंडा होने दिया जाए।
"उस्ताद," मैंने कहा, "आपने कहा ये घंटी आपके भाई की है।"
"हाँ।"
"तो फिर — मेरे पास कैसे आई?"
उस्ताद ने फ्रेम को मेज़ पर रखा।
उन्होंने बैठने की कोशिश की, पर कुर्सी पीछे सरक गई थी। मैंने कुर्सी पकड़कर उनकी तरफ़ बढ़ाई। उन्होंने बैठकर एक लंबी साँस ली।
"ये तस्वीर," उन्होंने कहा, "पचास साल से मेरी दराज़ में बंद थी।"
वेबसाइट पर अपनी पसंदीदा कहानियाँ मुफ्त पढ़ें और Story FM App पर उन्हीं कहानियों का शानदार Audio Experience लें।
यह कहानी Story FM app पर ऑडियो में भी सुनें — आगे के एपिसोड सबसे पहले वहीं आते हैं।
Audio mein suno