The Mysterious Bell – Chapter 1248
मैंने लिफ़ाफ़ा पकड़ा।
उस पर कोई नाम नहीं था। कोई मोहर नहीं।
मैंने उसे खोला।
अंदर एक काग़ज़ था — छोटा, मुड़ा हुआ।
मैंने उसे खोला।
और उस पर सिर्फ़ इतना लिखा था —
"आज सात बजे, अगर तुम मेज़ पर पहुँचे — तो पहली बात तुम्हारी। अगर नहीं पहुँचे — तो आख़िरी बात भी तुम्हारी नहीं।"
मैंने काग़ज़ पापा की तरफ़ बढ़ाया।
"किसकी लिखाई है?"
पापा ने देखा।
और उनका चेहरा बदल गया।
"यह," उन्होंने धीरे से कहा, "मेरे बाप की लिखाई है।"
मैंने उनकी तरफ़ देखा।
"पर बाबा तो —"
"हाँ," पापा ने कहा। "वो मर चुके हैं। पर उनकी लिखाई ज़िंदा है।"
मैंने काग़ज़ फिर पढ़ा।
"और यह," मैंने कहा, "आज सुबह लिखा गया है।"
पापा ने मेरी तरफ़ देखा।
"तो इसका मतलब," पापा ने कहा, "कोई है जो तुम्हारे बाबा की लिखाई में लिखता है। और वो आज सुबह यहाँ था।"
मैंने काग़ज़ मोड़कर जेब में रखा।
और मैंने मीरा की तरफ़ देखा।
"चल," मैंने कहा। "अब कोई इंतज़ार नहीं।"
हम भागे।
पुराने अस्पताल के मैदान की तरफ़।
और मेरे पीछे, गली के मुँह पर, एक साया खड़ा था — सफ़ेद कुर्ता, चमकते जूते, और कान के पास एक काली अंगूठी।
पर मैंने पलटकर नहीं देखा।
क्योंकि मुझे अब पता था — जो पीछे है, उसे देखने का वक़्त अब नहीं है।
अब सामने देखने का वक़्त है।
और सामने पुराने अस्पताल का मैदान था।
जहाँ एक मेज़ थी।
और मेज़ पर एक फाइल।
और फाइल के ऊपर एक पीतल की डिब्बी।
और डिब्बी पर वो निशान।
दो लकीरें।
और बीच में बिंदु।
मेरे घर का नाम।
जिसे अब मैं खुद खोलने जा रहा था।
॥
मैदान का लोहे का गेट खुला मिला।
यही पहली बात थी जिसने मुझे अंदर घुसने से पहले एक पल रोका। पुराने अस्पताल का पिछला मैदान, जहाँ आम दिन में कुत्ते सोते थे और बच्चे कभी कभी पतंग उड़ाने आ जाते थे, आज किसी और रंग में था।
अंदर घुसते ही धूल उठी। पुराने खंभे पर लगे एक बल्ब की पीली रोशनी में वो धूल सुनहरी दिख रही थी।
मैदान के बीच में एक लंबी लकड़ी की मेज़ रखी थी। मेज़ पर सफ़ेद कपड़ा बिछा था।
और कपड़े के ऊपर, ठीक बीच में, वही सफ़ेद फाइल।
फाइल के ऊपर पीतल की वो छोटी डिब्बी।
मैंने मीरा की तरफ़ देखा। उसने अपना कैमरा नीचे कर लिया था।
“अंकुश,” उसने धीरे से कहा। “यह जाल है।”
“हो सकता है,” मैंने कहा। “पर जाल में चीज़ भी रखी है।”
हम आगे बढ़े।
मेज़ के पीछे, अंधेरे में, दो कुर्सियाँ रखी थीं। एक पर चंद्रेश बैठा था। दूसरी खाली थी।
चंद्रेश ने हमें देखा और मुस्कुराया, जैसे कोई बड़ा भाई स्कूल से लौटे छोटे भाई को देखकर मुस्कुराता है।
“आ गए,” उसने कहा। “मैंने कहा था न, ठीक सात बजे।”
“आपने कहा था कि साहब सारी फाइलें खुली मेज़ पर रखेंगे,” मैंने कहा। “यह तो एक ही फाइल है।”
“साहब आ रहे हैं,” चंद्रेश ने कहा। “उनके साथ बाक़ी भी हैं।”
“तो हम इंतज़ार करें?”
“नहीं,” चंद्रेश ने कहा। “तुम बैठ जाओ। तुम्हारे पैर थक गए होंगे।”
“मेरे पैर नहीं थके,” मैंने कहा। “बस मेरी जेब में एक ताला है, जो बेवजह गरम हो रहा है।”
चंद्रेश हँसा। हँसी में कोई मज़ाक नहीं था, सिर्फ़ आदत।
“जेब की चीज़ें,” उसने कहा, “कभी बेवजह गरम नहीं होतीं।”
मीरा ने मेरी कलाई दबाई। मैं समझ गया। वो कह रही थी, बात कम करो।
तभी सफ़ेद गाड़ी की आवाज़ आई। पहले इंजन की धीमी घरघराहट, फिर पहियों के नीचे कुचलती धूल की आवाज़, फिर वो चमकदार रोशनी जो एक झटके में पूरे मैदान को सफ़ेद कर गई।
गाड़ी से रणवीर भारद्वाज उतरा।
सफ़ेद कुर्ता, सफ़ेद पाजामा, सफ़ेद जूते, इतने साफ़ कि मुझे लगा ये जूते इस मैदान की धूल से लड़कर जीते हैं।
और उसके गले में वो पीतल का अंडाकार ताबीज़।
जिस दिन मैंने उसका बटन खुला देखा था, उस दिन भी यही ताबीज़ दिखा था, पर आज वो ज़्यादा चमक रहा था। पीली रोशनी में लग रहा था कि ताबीज़ के भीतर कोई छोटा दीया जल रहा है।
रणवीर ने मेरी तरफ़ देखा और हाथ जोड़े।
मैंने भी हाथ जोड़ लिए।
“नमस्ते साहब,” मैंने कहा। “इतनी रात को, इतनी धूल में? आपकी सेहत का ख़याल रखना चाहिए।”
वो हँसा। एकदम खुलकर। ऐसे जैसे मैंने उसके मुँह से कोई पुराना मज़ाक दोहरा दिया हो।
“अंकुश यादव,” उसने कहा। “तुम्हें देखकर अच्छा लगता है। तुम्हारे बाप कैसे हैं?”
मेरी जेब में ताला गरम हुआ। मैंने जान-बूझकर हाथ जेब के पास नहीं ले जाया।
“पापा ठीक हैं,” मैंने कहा। “और आपके काग़ज़ों पर अंगूठा नहीं लगाएँगे।”
रणवीर मुस्कुराया।
“काग़ज़ों वाली बात पुरानी हो गई,” उसने कहा। “अब मैं काग़ज़ नहीं देता।”
“तो क्या देते हैं?”
“सच,” उसने कहा। “आज रात सिर्फ़ सच।”
वो मेज़ के पास आया। उसने सफ़ेद कपड़े को हल्का सा छुआ, फिर फाइल उठाई।
“यह है वो फाइल,” उसने कहा। “जिसका इंतज़ार तुम कर रहे थे।”
उसने फाइल खोली।
मैंने गर्दन आगे की।
पन्ने।
खाली पन्ने।
एक, दो, तीन, चार, पाँच, छह, सात। सब खाली।
न कोई नाम, न कोई मुहर, न कोई तारीख़। बस पीले काग़ज़ की सफ़ेदी।
मीरा ने धीरे से कहा, “यह…”
“यह ‘याद’ है,” रणवीर ने कहा। “और याद काग़ज़ पर नहीं लिखी जाती। याद ताले में बंद होती है।”
उसने मेरी जेब की तरफ़ देखा।
“तुम्हारी जेब में जो है,” उसने कहा, “वो मुझे दे दो। बदले में मैं तुम्हें तुम्हारी याद लौटा दूँगा।”
मैदान में सन्नाटा छा गया। एक पल के लिए सिर्फ़ दूर कहीं कुत्ते के भौंकने की आवाज़ आई।
“आपके पास क्या है?” मैंने पूछा।
“यह,” रणवीर ने कहा, और उसने गले का ताबीज़ हल्का सा ऊपर उठाया। “सातवाँ काग़ज़ इसके अंदर सिला है। और तुम्हारी याद इसे खोलने पर मिलेगी।”
“कैसे?”
“सच बोलकर,” रणवीर ने कहा। “जो सच तुमने कभी किसी को नहीं बताया।”
मैं हँसा। सच में हँसा।
“साहब,” मैंने कहा, “मुझे अगर सच बोलने का मौक़ा चाहिए, तो मैं आपको आज रात ही बोल सकता हूँ। बस आप सुनने को तैयार हो जाइए।”
रणवीर की मुस्कान एक पल के लिए रुकी।
फिर वापस आई।
“मुझे लगा था तुम डरोगे,” उसने कहा।
“डर तो रहा हूँ,” मैंने कहा। “बस डर मेरी जेब में है, मेरे दिमाग़ में नहीं।”
रणवीर ने फाइल बंद की। उसने मेज़ पर रखी।
“कल सुबह दस बजे,” उसने कहा, “भवन में। घंटी लाओ, याद ले जाओ।”
“और अगर न लाऊँ?”
“तो याद किसी और की हो जाएगी,” उसने कहा। “और तुम वहीं रह जाओगे, जहाँ तुम हो। हमेशा के लिए।”
चंद्रेश उठा। दोनों गाड़ी की तरफ़ बढ़े।
रोशरोशनी धीरे-धीरे दूर होती गई।
गाड़ी गली के मोड़ से मुड़ी, और उसकी लाल बत्ती पीपल के पत्तों के पीछे छिप गई। मैदान में सिर्फ़ मैं और मीरा बचे थे। मेज़ पर वो फाइल पड़ी थी, सात खाली पन्नों वाली, और उसके ऊपर पीतल की छोटी डिब्बी — जो अब खुली थी, खाली थी।
मैंने डिब्बी उठाई।
मेरी उँगलियों के नीचे वो ठंडी थी। पहले जो गरम होती थी, अब बिल्कुल चुप, बिल्कुल ठंडी। जैसे उसने भी आज रात साथ छोड़ दिया हो।
मीरा ने अपना कैमरा नीचे किया।
"कुछ नहीं मिला," उसने धीरे से कहा।
"नहीं," मैंने कहा।
मैंने फाइल उठाई। सात खाली पन्ने। सात सफ़ेद सपने जो किसी ने पहले ही जला दिए थे।
"वो यही चाहता था," मीरा ने कहा। "हमें खाली हाथ लौटाना।"
मैंने सिर हिलाया।
"पर मैं खाली हाथ नहीं लौट रहा," मैंने कहा।
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