The Mysterious Bell – Chapter 1247
"तुम्हारे साथ," चंद्रेश ने कहा, "एक याद गई।"
मैंने उसकी तरफ़ देखा।
"वो याद," मैंने कहा, "मेरे पास वापस आएगी।"
"आएगी," चंद्रेश ने कहा। "पर तब नहीं जब तुम वो चीज़ करोगे जो साहब चाहते हैं। तब आएगी जब तुम वो चीज़ करोगे जो तुम्हारे बाबा नहीं कर पाए थे।"
"क्या?"
चंद्रेश ने कोई जवाब नहीं दिया।
उसने सिर्फ़ फाइल अपने बगल में रखी, और गाड़ी का इंजन शुरू कर दिया।
"जाते-जाते एक बात," उसने कहा, और अपना सिर खिड़की से बाहर निकाला।
"यह काग़ज़ आज मेरी जेब में है," उसने कहा। "पर तुम्हारी याद नहीं है।"
मेरी साँस रुकी।
"तुम्हारी याद," उसने कहा, "कहीं और सिली हुई है।"
मैंने कुछ कहना चाहा, पर आवाज़ नहीं निकली।
चंद्रेश ने मेरी तरफ़ देखा।
"अब सुनो आख़िरी बात," उसने कहा, और उसका चेहरा एक पल के लिए बदल गया — पुराना, थका, वो सब जानने वाला।
"वो याद जिसने गिरवी रखी," उसने कहा, "उसने उस दिन अपना पूरा हिसाब ख़त्म कर दिया था।"
वो रुका।
"और वो दिन था —"
उसने एक पल मेरी आँखों में देखा।
"आग की रात।"
गाड़ी चली।
सफ़ेद रोशनी गली के मुँह की तरफ़ मुड़ी और फिर ग़ायब हो गई।
मैं वहीं खड़ा रहा।
पाँच सेकंड। दस सेकंड। पंद्रह।
मेरे पीछे मीरा की आवाज़ आई।
"अंकुश।"
मैंने कुछ नहीं कहा।
"अंकुश।"
"हाँ," मैंने धीरे से कहा।
"क्या कहा उसने?"
मैंने मुड़कर उसकी तरफ़ देखा।
"उसने कहा," मैंने कहा, "कि मेरी याद कहीं और सिली हुई है। और उस याद को गिरवी रखने वाले ने — आग की रात अपना हिसाब ख़त्म कर दिया था।"
मीरा की आँखें फैल गईं।
"आग की रात," उसने कहा। "मतलब पचास साल पहले वाली आग?"
"नहीं," मैंने कहा। "मतलब जिस रात उस्ताद का भाई इलियास गायब हुआ था। जिस रात बिजलीघर के बक्से बने थे। जिस रात हकीम साहब की कॉपी जली थी।"
मैंने घंटी जेब से निकाली।
वो ठंडी थी।
"आग की रात," मैंने कहा। "हर बात वहीं जाकर रुकती है।"
मीरा ने अपना कैमरा कंधे पर सीधा किया।
"अब?"
मैंने सात बजे की तरफ़ देखा। आसमान नारंगी हो रहा था।
"अब," मैंने कहा, "हमें उस आदमी को ढूँढना है जो उस रात बच गया था।"
"कौन?"
"खल्लू भाई," मैंने कहा। "पापा जिसका नाम बुदबुदाते रह गए थे। वो आदमी जो उन चमकते जूतों में आता था। जो हर महीने के आख़िर में दादा की दुकान पर आता था। जो वो सब बनाता है जो पानी से नहीं मिटता।"
मीरा ने कुछ कहना चाहा, पर रुक गई।
"अंकुश," उसने कहा। "तेरे पास घंटी है। घंटी को बजा। पूछ — खल्लू भाई कौन है।"
मैंने घंटी को हाथ में उठाया।
बजाया।
एक पल चुप्पी।
फिर — घंटी गरम हुई, और उसने कहा —
"नाम नहीं। निशान।"
मैंने मीरा की तरफ़ देखा।
"निशान," मैंने कहा। "यही निशान। दो लकीरें और बिंदु। यह किसी का नाम नहीं है। यह किसी का काम है।"
"काम?"
"मोहर बनाने वाले का," मैंने कहा। "या काग़ज़ सिलने वाले का। या —"
मैं रुक गया।
"या — जो काग़ज़ बनाता है," मीरा ने कहा।
मैंने उसकी तरफ़ देखा।
"एक आदमी था," मैंने धीरे से कहा। "जो शहर में काग़ज़ बनाता था। पुराने बाज़ार में। बीस साल पहले। उसकी दुकान आज भी बंद पड़ी है।"
मीरा ने मेरी तरफ़ देखा।
"तू उसे जानता है?"
"नहीं," मैंने कहा। "पर उस्ताद जानते हैं।"
मैंने अपनी जेब में हाथ डाला। ताला वहीं था, अब भी गरम। मैंने उसे उँगलियों से दबाया।
और मैंने मीरा की तरफ़ देखा।
"अभी चल," मैंने कहा। "सात बजे से पहले हमें उस्ताद की दुकान तक पहुँचना है।"
मीरा ने कुछ कहना चाहा, पर तभी उसकी जेब से फोन बजा।
उसने निकाला।
"टिंकू," उसने कहा।
उसने सुना।
और उसका चेहरा बदल गया।
"अंकुश," उसने कहा। "टिंकू कह रहा है कि उस्ताद की दुकान का शटर खुला है।"
मेरे पाँव रुके।
"और?"
"और अंदर उस्ताद का पुराना ट्रंक खुला पड़ा है," मीरा ने कहा। "जिस पर ताला था। जो कोई कभी नहीं खोलता।"
मेरे हाथ में घंटी फिर गरम हुई।
और उसने धीरे से कहा —
"वो खुला।"
"क्या खुला?"
"जो बंद था," घंटी ने कहा। "और जो बंद था, वो अब भी बंद है।"
मैंने घंटी को जेब में रखा। और मैंने मीरा की तरफ़ देखा।
"चल," मैंने कहा। "अब दौड़।"
हम भागे।
गली के मुँह पर, पुराने बाज़ार के मोड़ पर, पीपल के नीचे — लोग खड़े थे। उनके चेहरों पर वो भय नहीं था जो दोपहर में था। अब कुछ और था।
उम्मीद।
या शायद डर से भी बड़ी कोई चीज़।
जब हम उस्ताद की दुकान के पास पहुँचे, तो शटर आधा खुला था। अंदर से पीली रोशनी आ रही थी।
मैंने मीरा को पीछे रुकने का इशारा किया। वो रुकी।
मैंने अंदर झाँका।
दुकान के बीच में, फर्श पर, वो पुराना लोहे का ट्रंक खुला पड़ा था। उसका ढक्कन उठा हुआ था, और उसके अंदर से कुछ चीज़ें बाहर निकली हुई थीं — कुछ कपड़े, कुछ काग़ज़।
और ट्रंक के पास, फर्श पर, उस्ताद अली बक्श बैठे थे।
उनके हाथ में कुछ था।
मैंने उनकी तरफ़ देखा।
"उस्ताद?"
वो मेरी तरफ़ देखकर मुस्कुराए।
"आ गए, बेटा," उन्होंने कहा। "बैठ जाओ।"
"उस्ताद, ट्रंक —"
"ट्रंक नहीं खुला," उस्ताद ने कहा। "ट्रंक खुद खुला।"
"क्या मतलब?"
उन्होंने अपना हाथ उठाया। उस हाथ में एक पुरानी सिलाई की सुई थी, और उस सुई में एक पीली रेशमी चुनरी का टुकड़ा फँसा हुआ था।
"मेरी माँ की सुई," उन्होंने कहा। "उनकी आख़िरी सुई। जो उन्होंने उस रात हाथ से गिरा दी थी।"
मैंने उनकी तरफ़ देखा।
"उस्ताद, यह क्या है?"
"यह," उन्होंने कहा, "वो नाम है जो ताले में बंद है।"
उन्होंने सुई मेरी तरफ़ बढ़ाई।
"तुम्हारा नाम है, बेटा," उन्होंने कहा। "तुम्हारे बाबा ने इसे यहाँ छिपाया था। और आज वो ताले से खुद निकल आया।"
मैंने सुई की तरफ़ देखा।
और उस चुनरी के टुकड़े पर, पीली ज़मीन पर नीली स्याही में, छोटे-छोटे अक्षरों में एक नाम लिखा था।
मैंने वो नाम पढ़ा।
और मेरी साँस रुक गई।
क्योंकि वो नाम मेरा नहीं था।
वो नाम — जगदीश यादव का था।
और उसके नीचे, छोटे अक्षरों में, एक और लाइन थी —
"इसे बेटे को देना। जब वो जोड़ना सीख जाए।"
उस्ताद ने मेरी तरफ़ देखा।
"बेटा," उन्होंने कहा, "तुम्हारे बाबा ने यह सब पहले से जानकर छिपाया था।"
"क्यों?"
"क्योंकि," उस्ताद ने कहा, "वो जानते थे कि एक दिन तुम यहाँ तक पहुँचोगे। और उस दिन तुम्हें कोई चीज़ ऐसी चाहिए होगी जो तुम्हें अकेले न छोड़े।"
मैंने सुई उनके हाथ से ली।
मेरे हाथ काँप रहे थे, पर मैंने उसे कसकर पकड़ा।
उस्ताद ने मेरी तरफ़ देखा।
"अब जाओ," उन्होंने कहा। "सात बजने वाले हैं।"
"उस्ताद —"
"जाओ, बेटा," उन्होंने कहा। "और गली में जो डरा हुआ है, उसे बताओ कि जगदीश यादव का नाम अभी ज़िंदा है।"
मैंने उनके पैर छुए।
और मैं दुकान से बाहर निकला।
बाहर मीरा खड़ी थी। उसने मेरी आँखों में देखा, और कुछ नहीं पूछा। बस अपना कैमरा सीधा किया।
"चल," मैंने कहा।
और हम भागे।
गली के मुँह पर पहुँचकर मैंने ऊपर देखा। आसमान अब और नारंगी था। सात बजने में बस कुछ पल।
और उसी वक़्त मुझे दूर से आवाज़ आई।
"अंकुश!"
मैं मुड़ा।
पापा थे। वो भागकर आ रहे थे। उनके हाथ में कुछ था — एक पीली लिफ़ाफ़ा, फटा हुआ, जल्दी से खोला गया।
"पापा?"
वो मेरे पास पहुँचे। उनकी साँस फूली हुई थी।
"यह," उन्होंने कहा, और लिफ़ाफ़ा मेरी तरफ़ बढ़ाया। "यह अभी तुम्हारी दुकान के शटर के नीचे मिला।"
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