The Mysterious Bell – Chapter 1246
"बड़ा?" उसने कहा। "बेटा, बड़ी चीज़ें फाइल में नहीं होतीं। बड़ी चीज़ें उस आदमी के दिमाग में होती हैं जो फाइल खोलता है। फाइल में सिर्फ़ इशारा होता है।"
उसने रसीद उठाई और मेरी तरफ़ बढ़ाई।
"यह पढ़ो।"
मैंने रसीद पकड़ी। काग़ज़ सूखा था, पर उँगलियों के नीचे ऐसा लगा जैसे किसी पुराने कपड़े को छुआ हो। ऊपर कुछ नाम, नीचे कोई रकम, और किनारे पर वो निशान — दो लकीरें और बीच में बिंदु।
"यह मेरे घर का निशान है," मैंने कहा।
"हाँ," चंद्रेश ने कहा।
"तो ये रसीद मेरे घर की है।"
"नहीं," उसने कहा। "ये रसीद तुम्हारे घर की नहीं है। ये रसीद उस काग़ज़ की है जो इस रसीद से जुड़ा है।"
"मतलब?"
चंद्रेश ने दूसरा काग़ज़ — वो फटा हुआ आधा पन्ना — उठाया।
"यह काग़ज़," उसने कहा, "इसका मालिक तुम नहीं हो।"
"मैं जानता हूँ," मैंने कहा। "मैं इसे ढूँढ रहा हूँ।"
"नहीं, बेटा," चंद्रेश ने कहा। "तुम नहीं समझे। तुम इसे ढूँढ रहे हो, यह अलग बात है। पर यह काग़ज़ तुम्हारा नहीं है।"
वो एक पल रुका।
"यह काग़ज़," उसने कहा, "तुम्हारे बाबा ने खुद लिखवाया था।"
मेरा गला सूख गया।
सच में सूख गया। जैसे किसी ने अंदर से एक मुट्ठी रेत डाल दी हो। मैंने अपनी जीभ तालू से लगाई और कुछ नहीं मिला।
"मेरे बाबा," मैंने कहा। आवाज़ नरम थी, पर टूटी नहीं। "मेरे बाबा जगदीश यादव।"
"हाँ," चंद्रेश ने कहा। "वही जिनका नाम आज भी तुम्हारे घर की दीवार पर पेंट के नीचे दबा है। वही जिनका अंगूठा इस काग़ज़ पर है।"
मैंने फटे काग़ज़ को देखा। आधे पन्ने पर कुछ लाइनें थीं, कुछ नीली स्याही में, और नीचे एक गोल अंगूठे का निशान। जर्जर, पुराना, फीका।
"तो ये काग़ज़ मेरे बाबा ने लिखवाया," मैंने कहा। "किससे?"
"यही तो सवाल है, बेटा," चंद्रेश ने कहा।
"और जवाब?"
"जवाब मेरे पास नहीं है," उसने कहा। "जवाब उस काग़ज़ के दूसरे आधे हिस्से में है। जो तुम्हारे बाबा ने कहीं और रखा था।"
मैंने काग़ज़ को गौर से देखा।
और मैंने पूछा — "मेरी याद? मेरी याद किसी ने चुराई कैसे?"
चंद्रेश हँसा।
वो हँसी मीठी थी, पर उसमें वो सब नहीं था जो मीठी हँसी में होना चाहिए। उसमें बस एक थकान थी — वो थकान जो बहुत सालों की बातें जानने वाले की आँखों में होती है।
"चुराई किसी ने नहीं, बेटा," उसने कहा।
"तो?"
"गिरवी रखी गई थी," उसने कहा।
मैंने उसकी तरफ़ देखा।
"गिरवी?"
"हाँ," चंद्रेश ने कहा। "जैसे कोई साइकिल गिरवी रखता है। जैसे कोई घड़ी गिरवी रखता है। तुम्हारी याद को गिरवी रखा गया। बदले में कुछ लिया गया।"
"क्या लिया गया?"
"यह तो तुम्हारे बाबा ही बता सकते थे," चंद्रेश ने कहा। "और वो अब नहीं हैं।"
"और गिरवी रखने वाला?"
चंद्रेश ने मेरी तरफ़ देखा।
"वो," उसने कहा, "कोई बाहर का नहीं था।"
मेरे हाथ में पकड़ा काग़ज़ हल्का-सा काँपा।
"मतलब — घर का था?"
"घर का नहीं," चंद्रेश ने कहा। "पर घर से दूर भी नहीं।"
मैंने काग़ज़ को मेज़ पर वापस रख दिया।
और मैंने सोचा।
मैंने सोचा कि चंद्रेश जो कह रहा है, वो झूठ है। या आधा सच है। या ऐसा सच है जिसमें सच को झूठ जैसा दिखाया गया है। पर मैंने भी उस वक़्त अपनी आवाज़ नहीं बदली। मैंने अपना चेहरा नहीं बदला।
मैंने सिर्फ़ इतना कहा — "जो गिरवी रखा गया, उसे छुड़ाना भी हमारा ही काम होगा।"
चंद्रेश ने मेरी तरफ़ देखा।
वो एक पल रुका। फिर उसने कहा —
"तुम ठीक वैसे ही बोलते हो, बेटा। जैसे तुम्हारे बाबा बोलते थे।"
"आप मेरे बाबा को जानते हैं?"
"मैंने उन्हें देखा है," चंद्रेश ने कहा। "बहुत साल पहले। एक शाम। जब वे अपनी दुकान पर बैठकर किसी काग़ज़ पर अंगूठा लगा रहे थे, और उनके हाथ काँप रहे थे।"
मेरी आँखें झुक गईं।
"पर," चंद्रेश ने कहा, "वो बात अब पुरानी हो गई।"
उसने फाइल बंद की।
"अब सुनो," उसने कहा। "आज शाम सात बजे, साहब तुम्हारे सामने सारी फाइलें रखेंगे। सारे काग़ज़। सारे हिसाब। और वो तुमसे एक चीज़ माँगेंगे।"
"क्या?"
"तुम जानते हो," चंद्रेश ने कहा। "वो तुम्हें घंटी देना चाहते हैं, तुम्हें अपनी याद देना चाहते हैं — पर बदले में तुम्हें अपनी गली देनी पड़ेगी।"
"मैंने उन्हें मना किया है।"
"मना करने से क्या होता है, बेटा?" चंद्रेश ने कहा। "मना करने से सिर्फ़ इतना होता है कि तुम देर से हारते हो।"
वो एक पल रुका।
और फिर उसने कहा — "तुम्हें पूर्णिमा की वो शाम याद है?"
मेरे अंदर कुछ ठंडा हुआ।
"आप उन्हें कैसे जानते हैं?"
"मैंने उन्हें देखा है," चंद्रेश ने कहा। "बहुत साल पहले। एक शाम। उस शाम वे अपने बेटे के साथ गुमटी पर बैठी थीं और चाय पी रही थीं। और साहब उसी शाम उनके सामने से गुज़रे थे। बिना रुके। बिना सिर हिलाए।"
मेरे अंदर कुछ जम रहा था, जैसे पानी सर्दी में जमता है।
"आप मुझे डराने आए हैं?"
"मैं तुम्हें बताने आया हूँ," चंद्रेश ने कहा। "साहब आज भी उसी तरह मुस्कुराते हैं। जैसे उस शाम मुस्कुराए थे।"
वो रुका।
"बस," उसने कहा, "तुम्हारे पास अब कोई हाथ नहीं बचेगा।"
मैंने उसकी तरफ़ देखा।
"क्या मतलब?"
"मतलब — शंकर यादव ने अपना हाथ तो दे ही दिया, बेटा। काग़ज़ पर अंगूठा। माँ की दवा के लिए। तुम्हारी बहन नर्सिंग करती है, वो भी उसी अस्पताल में जिसकी ज़मीन साहब के नाम पर जाने वाली है। तुम्हारी माँ बीमार है। तुम्हारा दोस्त टिंकू स्कूल में है।"
उसने एक-एक करके गिनाया, जैसे कोई तराज़ू पर बाट रख रहा हो।
"तुम्हारे पास गली है," उसने कहा। "और गली के पास सब कुछ चला जाएगा — जैसे बाईस साल पहले तुम्हारे बाबा के साथ गया था।"
"मेरे बाबा?"
"तुम्हारे बाबा ने," चंद्रेश ने कहा, "अपना नाम कटवा लिया था। यह तुम्हें पता है?"
मैंने कुछ नहीं कहा।
"तुम्हारे बाबा ने अपना अंगूठा लगाया था," उसने कहा। "और उस अंगूठे के बदले में — सिर्फ़ अपनी दुकान नहीं दी थी। अपना नाम भी दिया था। उस रात। आग की रात।"
मैंने उसकी तरफ़ देखा।
"और तुम्हारे पापा?" उसने कहा। "तुम्हारे पापा ने भी अपना अंगूठा लगाया। उस रात के बाद। वो अंगूठा तुम्हें आज तक पता नहीं चला, है ना?"
"आप झूठ बोल रहे हैं।"
"अगर मैं झूठ बोल रहा हूँ," चंद्रेश ने कहा, "तो तुम मुझे गलत साबित करो।"
वो रुका।
"पर तुम कर नहीं पाओगे," उसने कहा। "क्योंकि तुम्हें खुद पता है कि तुम्हारे पापा ने कुछ छिपाया है।"
मेरी मुट्ठी कस गई।
"मैं जानता हूँ," मैंने कहा। "पापा ने अंगूठा लगाया था। माँ के इलाज के लिए।"
"और मैं," चंद्रेश ने कहा, "तुम्हें यह बता रहा हूँ कि यह अकेला अंगूठा नहीं था।"
वो थोड़ा पीछे झुका।
"बाईस साल पहले," उसने कहा, "तुम्हारे बाबा ने अपना अंगूठा लगाया। बदले में क्या मिला — तुम्हें पता है?"
"क्या?"
"कुछ नहीं," चंद्रेश ने कहा। "तुम्हारे बाबा को कुछ नहीं मिला। वो काग़ज़ सिर्फ़ इसलिए बना था कि उनका नाम उस काग़ज़ पर रहे। और बाद में मिटाया जा सके।"
मैंने अपनी आँखें बंद कीं।
"और आज," चंद्रेश ने कहा, "तुम्हारे पापा का अंगूठा भी उसी हिसाब में जुड़ गया है।"
वो फिर रुका।
"अब समझे, बेटा?" उसने कहा। "तुम्हारे घर में हर आदमी ने एक अंगूठा लगाया है। और हर अंगूठे के साथ कुछ गया है। बाबा के साथ नाम गया। पापा के साथ दुकान गई।"
"और मेरे साथ?"
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