The Mysterious Bell – Chapter 1245
“क्या?”
“जब मैं नगर निगम के रिकॉर्ड कमरे में थी, कुंदनलाल ने रजिस्टर में कुछ लिखा देखा था और उसने कहा था — यह काग़ज़ यहाँ से निकल गया था।”
“कौन सा काग़ज़?”
“वही जिस पर आठवाँ अंगूठा था,” मीरा ने कहा। “वह आठवाँ पन्ना अब नगर निगम में नहीं है। कुंदनलाल ने कहा — वो पन्ना नगर निगम से तीन बार निकाला गया और तीनों बार वापस आया। पर चौथी बार वो नहीं आया। और चौथी बार कब हुआ — वो उसे याद नहीं।”
“कब हुआ?”
“वो कुछ नहीं बोला,” मीरा ने कहा। “पर जब मैं बाहर निकल रही थी, उसने पीछे से कहा — बारिश वाले दिन।”
मैंने अपनी आँखें बंद कीं।
और उस वक़्त मुझे याद आया — पूर्णिमा ने कहा था कि वो बारिश वाले दिन लौटी थी। और रज़िया भी बारिश वाले स्टेशन से लौटी थी। और दुबे अंकल ने कहा था कि वो पुराना लिफ़ाफ़ा किसी बारिश वाले दिन आया था।
“बारिश,” मैंने कहा। “हर बात बारिश पर आकर रुकती है।”
“तो?”
“तो यह बारिश अब भी चल रही है,” मैंने कहा। “बस हमें वो दिन ढूँढ़ना है जिस दिन बारिश आई थी।”
मैंने गुमटी के बाहर देखा।
शाम गहरी हो रही थी। पीपल के पत्ते हिल रहे थे, और उनकी आवाज़ ऐसी थी जैसे कोई बहुत पुराना आदमी धीरे-धीरे कुछ गुनगुना रहा हो।
मैंने घंटी फिर जेब में रखी।
और मीरा की तरफ़ मुड़ा।
“अब सुन,” मैंने कहा। “तीन काम हैं।”
“बोल।”
“एक — टिंकू लौटे तो वो काग़ज़ हमें उस रसीद से मिलाना है।”
“दो?”
“दो —"दो —" मैंने कहा।
मीरा ने पेंसिल उठाई।
"दो — टिंकू लौटे तो उस काग़ज़ को पुरानी रसीद से मिलाना। काग़ज़ का किनारा, रसीद का किनारा, दोनों आमने-सामने रखकर देखना। क्योंकि मुझे लगता है रसीद उसी काग़ज़ का हिस्सा है, बस किसी ने बीच से फाड़कर दो जगह रख दिया है।"
मीरा ने लिखा।
"तीसरा?"
"तीसरा —" मैंने कहा, और अपनी जेब में हाथ डाला। ताला अब भी वहीं था, गरम, हल्का-सा काँपता हुआ, जैसे कोई आधी नींद में करवट बदल रहा हो। "तीसरा — सानिया अपनी अम्मी को हमारे साथ रखे। ज़ुबैदा आपा को किसी की नज़र न लगे। आज शाम सात बजे जो भी हो, वो मेरे नाम से हो, सानिया के घर के नाम से नहीं।"
मीरा ने पेंसिल रख दी।
"तू जानता है," उसने कहा, "तू जो जो काम मुझे दे रहा है, वो सब कम से कम दो घंटे का है। और तेरे पास दो घंटे नहीं हैं।"
"पता है।"
"तो फिर?"
"तो इसीलिए," मैंने कहा, "मैं जो करने जा रहा हूँ, वो अपने दम पर कर रहा हूँ। तू इन तीन कामों से बाहर रह।"
मीरा ने मेरी तरफ़ देखा। उसके पास वही फटा बैग था, वही कैमरा, वही टूटी घड़ी। पर उस घड़ी की सुई अब भी चल रही थी।
"अंकुश," उसने कहा। "मैं तेरी नौकर नहीं हूँ। मैं तेरी दोस्त हूँ। और दोस्त को काम नहीं दिया जाता। दोस्त साथ खड़ा होता है।"
"मीरा।"
"मत बोल।"
"मीरा, सुन —"
"मत बोल, अंकुश," उसने कहा। "मैंने तेरे साथ रमा मैडम के सामने खड़े होकर एक बार अपनी सबसे पुरानी गलती कबूल की थी। उस दिन तूने मुझे नहीं छोड़ा था। तो आज मैं तुझे नहीं छोड़ूँगी।"
मैंने उसकी तरफ़ देखा।
"ठीक है," मैंने कहा। "तू साथ खड़ी रह।"
"ठीक है।"
"पर मेरे पीछे नहीं। मेरे बगल में।"
"ये क्या फ़र्क़ है?"
"फ़र्क़ है," मैंने कहा। "पीछे वाला बचने की सोचता है। बगल वाला देखने की।"
मीरा ने मुझे देखा, और उसके होंठ हिले, पर कुछ नहीं बोली। सिर्फ़ इतना कि उसने अपना बैग कंधे पर सीधा किया।
तभी मुझे पीछे से आवाज़ आई।
"उस्ताद।"
मैं मुड़ा।
टिंकू खंभे के पीछे से आधा सिर निकालकर खड़ा था। उसके हाथ में वही पुराना टेप वाला बल्ला था और माथे पर माँ का गुलाबी दुपट्टा बँधा था, जो अब पसीने से भीग चुका था।
"उस्ताद, गाड़ी का दरवाज़ा खुला है," उसने धीरे से कहा। "और पीछे वाली खिड़की भी। पता नहीं अंदर कितने लोग हैं।"
"तू वहीं रह," मैंने कहा। "तू और सब — वहीं।"
"पर उस्ताद —"
"टिंकू।"
वो चुप हो गया।
"आज तेरा काम एक ही है," मैंने कहा। "मेरी आवाज़ सुनना। अगर मैं ज़ोर से तेरा नाम लूँ, तो तू भागेगा नहीं। तू सबको लेकर गुमटी के पीछे से निकलेगा। समझा?"
टिंकू ने एक पल मेरी तरफ़ देखा, फिर धीरे से सिर हिलाया।
"उस्ताद, एक बात कहूँ?"
"बोल।"
"वो गाड़ी में जो बैठा है," टिंकू ने कहा, "उसने आज दोपहर गली में एक आदमी से कहा था कि अंकुश यादव का नाम अब किसी काग़ज़ पर नहीं रहना चाहिए। मैंने खुद सुना था। मैं छत पर था, पतंग उड़ा रहा था।"
मेरे पैरों के नीचे ज़मीन एक पल के लिए ढीली हुई।
फिर ठीक हो गई।
"अच्छा सुना तूने," मैंने कहा। "अब भाग।"
टिंकू खंभे के पीछे लौट गया।
मैंने मीरा की तरफ़ देखा।
"तू वहीं रह," मैंने कहा। "वो सामने तेरा कैमरा देखेगा। मुझे नहीं देखेगा।"
"और तू?"
"मैं उससे बात करूँगा," मैंने कहा। "काग़ज़ की बात नहीं, आदमी की बात।"
मीरा ने कुछ कहना चाहा, पर रुक गई। उसने सिर्फ़ सिर हिलाया।
मैंने अपनी जेब में हाथ डाला। ताला वहीं था, गरम। घंटी भी वहीं थी, चुप। मैंने एक बार घंटी को उँगलियों से दबाया। कुछ नहीं हुआ। बस पीतल थोड़ा और गरम हुआ, जैसे कोई चुपचाप साँस ले रहा हो।
मैंने हाथ निकाला।
और मैं गाड़ी की तरफ़ चला।
दो कदम। चार कदम।
गाड़ी की सफ़ेद चमक शाम की रोशनी में उतनी चमकीली नहीं लग रही थी, जितनी दोपहर में लगती है। अब उस पर धूल की एक पतली परत बैठ गई थी, जैसे गाड़ी भी थक गई हो।
पर शीशा खुला था।
और चंद्रेश सक्सेना अंदर बैठा था, वैसे ही — सफ़ेद कुर्ता, साफ़ कटा बाल, हाथ में कोई फाइल नहीं, बस एक खुला हुआ हथेली जैसा आराम।
"आ जाओ, बेटा," उसने कहा। "डरो मत। मैं कोई गुंडा नहीं हूँ।"
मैं गाड़ी के पास पहुँचा। खिड़की के किनारे से टेक लगाई।
"मैं डरा नहीं हूँ," मैंने कहा।
"नहीं," चंद्रेश ने कहा। "तुम डरे हुए नहीं हो। तुम थके हुए हो। यह और भी बड़ी बात है। थका हुआ आदमी वो कर सकता है जो डरा हुआ नहीं कर सकता।"
"आप बड़ी अच्छी हिंदी बोलते हैं।"
"मैं वकील हूँ, बेटा," उसने कहा। "हिंदी मेरी दुकान है।"
वो मुस्कुराया।
और उस मुस्कान में वो सब था जो रणवीर की मुस्कान में था, बस थोड़ा और पुराना, थोड़ा और ठंडा।
"तुम्हें पता है," उसने कहा, "यह शहर तुम जैसे लड़कों से ही चलता है।"
"मतलब?"
"मतलब — तुम जैसे लोग जो सुबह चार बजे उठकर किसी की टूटी साइकिल ठीक करते हैं, जो चाय के पैसे बचाकर दूसरे की दवा में डाल देते हैं, जो गली में किसी का झगड़ा हो तो बीच में खड़े हो जाते हैं। यह शहर इन्हीं आदमियों के कंधे पर टिका है, बेटा।"
"तो?"
"तो — बस तुम्हें रास्ता नहीं पता," उसने कहा। "कंधा तुम्हारे पास है, रास्ता हमारे पास है।"
उसने अपने सामने रखी सफ़ेद फाइल उठाई।
मैंने उस फाइल को देखा। मोटी थी, किनारों से घिसी हुई, और ऊपर कोई लेबल नहीं था — बस एक पीली पर्ची चिपकी थी जिस पर नीली स्याही में दो शब्द लिखे थे।
"याद।" और उसके नीचे "एक।"
चंद्रेश ने फाइल खोली।
और मैंने अंदर देखा।
सिर्फ़ दो चीज़ें थीं।
एक — एक पुरानी रसीद, पीली, मुड़ी हुई, किनारों से जली हुई सी।
और दूसरी — एक फटा हुआ काग़ज़। आधा पन्ना। जिसके किनारे असमान थे, जैसे किसी ने जल्दी में फाड़ा हो।
"बस?" मैंने कहा।
"बस," चंद्रेश ने कहा।
"मुझे लगा फाइल में कुछ बड़ा होगा।"
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