The Mysterious Bell – Chapter 1243
“क्योंकि यह काग़ज़,” उसने कहा, “मेरे पास है। और मेरे पास जो है, वो मैं किसी अंधेरे में नहीं रखना चाहता। मैं सीधा आदमी हूँ, बेटा। मुझे छिपाना पसंद नहीं है। मुझे बताना पसंद है — खुलकर, सबके सामने, अपनी तरफ़ से। इसी वजह से आज शाम सात बजे मैं अपनी सारी फाइलें उस मेज़ पर रखने वाला हूँ। सब कुछ। मेरे अपने काग़ज़ भी। मेरे बाप के काग़ज़ भी। ताकि कल को कोई कहे नहीं कि रणवीर ने कुछ छिपाया था।”
“आपके बाप के काग़ज़ भी?” मैंने कहा।
उसकी आँखें उस वक़्त ज़रा सिकुड़ीं। हल्की सी। फिर फैल गईं।
“तुम्हारे कान तेज़ हैं,” उसने कहा। “अच्छी बात है। पर आज शाम तक यह भी जान लेना कि कौन सा काग़ज़ सच बोलता है और कौन सा नहीं। काग़ज़ बोलते हैं, बेटा। और वो ऐसे बोलते हैं जैसे लोग — कभी कुछ छिपाकर, कभी सब दिखाकर।”
“और मेरी याद?”
“तुम्हारी याद,” उसने कहा, “किसी ताले में है। और ताले का हिसाब रसीद से नहीं मिलता। ताले का हिसाब दिल से मिलता है। वो तुम्हें किसी और की ज़ुबान सुननी पड़ेगी।”
मैंने उसकी तरफ़ देखा।
“साहब, मैं आपसे एक बात कहूँ?”
“कहो।”
“मैं आपसे नाराज़ नहीं हूँ,” मैंने कहा। “नाराज़गी आदमी को बूढ़ा करती है, आपने खुद कहा। मैं बस यह कहूँगा कि जो गिरवी रखा गया, उसे छुड़ाना भी हमारा ही काम होगा। रसीद हमारे बाबा की है। ताले की चाबी मेरे गले में है। और जो मेरे घर का नाम है, वो भी मेरे ही घर में लौटेगा।”
वो एक पल मेरी तरफ़ देखता रहा।
फिर उसने अपनी सफ़ेद घड़ी की तरफ़ देखा, ज़रा ऊपर उठाकर, जैसे वक़्त उसका कोई नौकर हो और उसे याद दिला रहा हो कि बात बहुत हो गई।
“तुम ठीक कह रहे हो,” उसने कहा। “छुड़ाना तुम्हारा ही काम है।”
उसने फाइल बंद की।
और तभी, उसने मुझे वो बात कही जो मैं सुनना नहीं चाहता था।
“तुम्हारे पापा,” उसने कहा, “उस शाम गली के मोड़ पर खड़े थे। तुम्हारी माँ के साथ। पूर्णिमा। तुम्हारी माँ के हाथ से रोटी का टिफ़िन गिर गया था। और उस वक़्त साहब गाड़ी से उतरकर उनके पास गए थे — वैसे ही हाथ जोड़कर, वैसे ही मुस्कुराकर, जैसे किसी त्योहार पर कंबल बाँटने आए हों। उन्होंने कहा था — दीदी, आपका बेटा बड़ा होकर क्या बनेगा? और तुम्हारी माँ ने कहा था — जो अपने घर को साथ रखे, वो बनेगा। साहब आज भी वैसे ही मुस्कुराते हैं, बेटा। बस फ़र्क़ इतना है कि उस दिन मुस्कुराहट में हाथ थे। आज मुस्कुराहट में हिसाब है।”
मेरी मुट्ठी सिकुड़ गई।
“कहना क्या चाहते हैं आप?”
“मैं कहना चाहता हूँ,” उसने कहा, “कि तुम अकेले खड़े हो। गली में लोग हैं। दुकानें हैं। बच्चे हैं। सब ठीक है। पर जिस दिन सच सबके सामने आएगा, उस दिन तुम्हारे पास हाथ कम बचेंगे। जिसने गिरवी रखा था, वो भी तुम्हारे साथ नहीं होगा। जिसने काग़ज़ लिखवाया था, वो भी शायद नहीं होगा। और बाक़ी तो तुम खुद जानते हो।”
मैंने कुछ नहीं कहा।
क्योंकि उस वक़्त मुझे अपने घर का दरवाज़ा याद आ रहा था — वो बंद दरवाज़ा जो चूल्हे के पीछे था। जिसे माँ ने आज रात न खोलने को कहा था। जिसके कुंडे पर ज़ंग में एक चीज़ चमक रही थी।
“अच्छा,” चंद्रेश ने कहा, “मुझे निकलना है।”
उसने गाड़ी का दरवाज़ा अंदर से खींचा।
मैं एक कदम पीछे हटा।
और उस वक़्त, जब गाड़ी का इंजन शुरू होने को था, वो रुका।
खिड़की से फिर सिर निकाला।
“एक बात और,” उसने कहा। “याद रखना।”
“क्या?”
“यह काग़ज़,” उसने फाइल को अपनी जेब की तरफ़ दबाकर कहा, “आज मेरी जेब में है। पर तुम्हारी याद नहीं। वो तो कहीं और सिली हुई है।”
गाड़ी का इंजन चला।
उसने खिड़की ऊपर लगा दी।
और तभी — बिल्कुल जाते-जाते — वो एक आख़िरी बार मुस्कुराया। ऐसे मुस्कुराया जैसे किसी पुराने ताले में चाबी घुमा दी हो। और कहा —
“वो याद जिसने गिरवी रखी, उसने उस दिन अपना पूरा हिसाब ख़त्म कर दिया था। और वो दिन था, आग की रात।”
गाड़ी आगे बढ़ गई।
जैसे कोई चीज़ जाती है और अपने जाने के बाद हवा में एक बोझ छोड़ देती है।
मैं वहीं खड़ा रह गया।
गली के कोने पर धूल धीरे-धीरे बैठ रही थी — गाड़ी के पहियों की लकीर फीकी हो रही थी, जैसे कोई पुराना लिखा हुआ मिट रहा हो।
मीरा मेरे पास आई।
“अंकुश।”
“हाँ।”
“तेरा हाथ काँप रहा है।”
मैंने अपनी हथेली खोली।
उसमें रसीद थी। पीली, पुरानी, धुँधले अंगूठे वाली।
“यह,” मैंने कहा, “मेरे बाबा की लिखाई है।”
“मैंने देखी।”
“और वो ख़त्म नहीं हुआ होगा, मीरा। कोई भी आदमी अपने हाथ से अपने घर का काग़ज़ नहीं लिखता, अगर उसे सिर्फ़ दुकान बचानी हो। जगदीश यादव ने कुछ बचाया था। और वो कुछ आज तक हमें नहीं पता।”
तभी टिंकू पीछे से दौड़कर आया।
“उस्ताद!”
“हाँ।”
“मैंने उनकी गाड़ी का नंबर याद कर लिया है।”
“नंबर काम नहीं आएगा,” मीरा ने कहा। “गाड़ी बदल जाती है।”
“नहीं,” टिंकू ने कहा। “यह गाड़ी नहीं बदलेगी। इसके पीछे के शीशे पर एक टूटा हुआ स्टिकर था। वो गाड़ी साहब के पिता की है।”
मीरा ने उसकी तरफ़ देखा।
“कैसे पता?”
“क्योंकि स्टिकर पर “भारद्वाज” लिखा था, और उसके नीचे पुरानी लिखाई में “ख” जैसा कुछ,” टिंकू ने कहा। “मैंने तस्वीर ले ली।”
मैंने टिंकू को देखा।
वो चौदह साल का लड़का था। और उसकी आँखों में पिछले तीन दिनों की नींद बाक़ी नहीं थी।
“शाबाश,” मैंने कहा। “पर अब सुन — तुम चारों पीछे रहोगे।”
“उस्ताद, प्लीज़—”
“सुनो,” मैंने कहा। “यह अब खेल नहीं है। चंद्रेश ने जो कहा है, वह सिर्फ़ मुझसे नहीं कहा है। वह सुनाकर कहा है — यह गाड़ी जिस गली में खड़ी थी, उस गली के हर दरवाज़े ने उसकी आवाज़ सुनी है। और सुनने वाले की सोच बदल जाती है।”
मीरा ने धीरे से कहा:
“उसने जान-बूझकर इतने सारे लोगों के सामने बात की। उसने हमें खंभों की आड़ में खड़े बच्चों के ज़रिए पूरी गली को बात पहुँचा दी।”
“हाँ,” मैंने कहा। “और आज शाम बात करने वाला सिर्फ़ वो नहीं होगा।”
मैं गली की तरफ़ मुड़ा।
शाम ढल रही थी। चाय की गुमटी की तरफ़ से एक धुँधली पीली रोशनी आ रही थी, और कोई रेडियो धीरे से बज रहा था — वही पुरानी हिंदी धुन जो अकसर सुबह सुनाई देती है, इस वक़्त अचानक उदास लग रही थी।
“मीरा,” मैंने कहा।
“क्या?”
“तेरी कॉपी दे।”
उसने दी।
मैंने उस पर वही लिखा — आज मेरे बाबा की रसीद मिली। उन्होंने अपनी याद खुद गिरवी रखी थी। आग की रात। जिसने याद रखी, उसने उस दिन अपना पूरा हिसाब खत्म किया था।
फिर मैंने नीचे जोड़ा — सवाल: क्या हिसाब खत्म हुआ? या सिर्फ़ एक पन्ना फाड़ा गया?
मीरा ने मेरी लिखाई पढ़ी।
“तू क्या सोच रहा है?”
“मैं सोच रहा हूँ,” मैंने कहा, “कि चंद्रेश ने जो कहा, वो किसी ने उसे याद करके दिया है। यह बात कोई सीखकर नहीं बोलता कि “पूरा हिसाब खत्म हो गया था”। यह बात वो बता रहा है जो खुद उसे उस रात से डरा रही है।”
“या फिर,” मीरा ने कहा, “ऊपर से आदेश मिला है कि अंकुश को डराने से उसका शक भी बढ़ेगा और साहब का काम भी होगा।”
“हाँ,” मैंने कहा। “यही बात मुझे टोक रही है। चंद्रेश इतनी सफ़ाई से बात क्यों कर रहा था? वो काग़ज़ मेरे हाथ में रखकर जाने वाला आदमी है। वो जानता है कि काग़ज़ दिखाने से आदमी की सोच अपने हिसाब से बदलती है। और उसकी सोच बदलने की गरज़ क्या है?”
“कि तू सात बजे की मेज़ पर जाकर सिर्फ़ काग़ज़ ढूँढ़े।”
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