The Mysterious Bell – Chapter 1242
“गली में खड़े होकर बात करना,” मैंने कहा, “इसी गली में पैदा हुआ हूँ, साहब। मुझे ठीक लगता है।”
वो हँसा।
हल्की, गोल, गरम हँसी। ऐसी हँसी जिससे आदमी को लगे कि वो किसी की हँसी नहीं उड़ा रहा, बस बात समझ रहा है।
“तुम मुझसे नाराज़ हो,” उसने कहा। “यह सही बात है। नाराज़गी आदमी के अंदर ताक़त रखती है। जिस दिन यह चली जाएगी, उस दिन आदमी बूढ़ा हो जाएगा।”
“आप बात कहाँ से शुरू कर रहे हैं, साहब?”
“मैं बात वहीं से शुरू कर रहा हूँ,” उसने कहा, “जहाँ तुमने खड़े होकर हाथ उठाया था।”
उसने मेरे पीछे की तरफ़ देखा।
“तुम बच्चों को इशारा कर रहे थे। समझदारी है। बच्चे इस वक़्त पीछे ही रहें। पर एक बात मान लो, बेटा — यह शहर तुम जैसे लड़कों से ही चलता है। तुममें दम है। तुममें सोच है। तुम्हारी दुकान पर जो लोग आते हैं, वो पैसे के लिए नहीं आते। वो तुम पर भरोसा करके आते हैं। यह भरोसा हर किसी के पास नहीं होता।”
“और मुझमें एक कमी है,” मैंने कहा।
“हाँ,” उसने मुस्कुराकर कहा। “तुम्हें रास्ता नहीं पता।”
“कौन सा रास्ता?”
“यही रास्ता,” उसने कहा और हाथ से अपनी गाड़ी, गली, दुकानों की तरफ़ इशारा किया। “तुम इस गली में चलना जानते हो। तुम इन लोगों के बीच बैठना जानते हो। पर तुम यह नहीं जानते कि गली के बाहर दुनिया कैसे चलती है। वहाँ काग़ज़ चलते हैं। तारीख़ चलती हैं। और वो काग़ज़ और वो तारीख़ कभी किसी एक आदमी की नहीं होतीं, बेटा। वो सबकी होती हैं। तुम उनसे लड़ रहे हो, और वो तुमसे नहीं लड़ रही हैं। वो तुम्हें अपने अंदर आने का रास्ता दे रही हैं।”
मैंने कुछ नहीं कहा।
वो अपनी गोद से एक फाइल उठाया।
सफ़ेद, मोटी, कोने से थोड़ी मुड़ी।
और उस पर वही काग़ज़ चिपका था जो मीरा ने गाड़ी की पिछली सीट पर देखा था।
उस पर दो शब्द — याद, और एक।
चंद्रेश ने फाइल खोली।
अंदर से हवा निकली — पुराने काग़ज़ की, बंद पड़ी अलमारी की, सूखी स्याही की।
उसने एक काग़ज़ निकाला।
पुरानी रसीद जैसा कुछ। छोटा, तिरछा, किनारे से टेढ़ा कटा हुआ।
“यह देखो,” उसने कहा।
मैंने हाथ आगे किया। उसने काग़ज़ मेरी उँगलियों तक नहीं बढ़ाया — बस खिड़की के किनारे पर रख दिया, जैसे किसी जानवर को दूर से चारा दिखाते हैं।
“उठाओ,” उसने कहा। “तुम्हारी चीज़ है।”
मैंने काग़ज़ उठाया।
रसीद थी — पुरानी, पीली, कोनों से ज़र्द पड़ चुकी। ऊपर कुछ शब्द छपे थे, फीके। नीचे एक लाल अंगूठे का धुँधला निशान। और उसके नीचे एक छोटी लाइन, हाथ से लिखी।
उस लाइन को पढ़ते ही मेरा गला सूख गया।
“क्या लिखा है?” मीरा ने पीछे से पूछा।
“यह रसीद है,” मैंने कहा, आवाज़ को सीधा रखने की कोशिश करते हुए, “जो मेरे बाबा जगदीश यादव ने लिखवाई थी। जब उन्होंने अपनी दुकान गिरवी रखी थी। और नीचे लिखा है — इसके बदले जो भी रखा गया है, वो बरसों तक खोले न जाने की शर्त पर है।”
मीरा आगे आई।
चंद्रेश ने उसकी तरफ़ देखा और वैसे ही मुस्कुराया, जैसे किसी पुराने घर में आए हुए इंसान को देखकर मुस्कुराते हैं।
“अच्छा है,” उसने कहा। “तुम साथ हो। लिखने वाला साथ हो तो बात ज़्यादा दूर जाती है।”
“साहब,” मैंने कहा, “यह रसीद मैंने पहले नहीं देखी।”
“देखी होती तो बात आज तक खत्म हो चुकी होती।”
“और यह काग़ज़?” मैंने फाइल की तरफ़ इशारा किया। “यह किसका है?”
वो रुका।
फिर उसने फाइल से दूसरा काग़ज़ निकाला।
फटा हुआ। आधा। किनारे से चीरा हुआ, जैसे किसी ने जल्दी में फाड़ा हो। उस पर पुरानी लिखाई थी — काली, हल्की झुकी हुई, हर अक्षर अलग-अलग रुका हुआ, जैसे लिखने वाले का हाथ काँप रहा हो।
मैंने उसे पढ़ा।
बहुत धीरे। पहला शब्द। दूसरा। तीसरा।
मेरा हाथ काँपने लगा।
“मेरा बाबा,” मैंने कहा।
“हाँ,” चंद्रेश ने कहा। “तुम्हारे बाबा जगदीश यादव ने खुद लिखवाया था। अपने हाथ से लिखा। यह नीचे का अंगूठा उनका है।”
“यह क्या है?”
“यह एक शर्त है,” उसने कहा। “जिस चीज़ को तुम अपनी याद कहते हो — वो यहाँ मौजूद थी। और बाबा ने उसे गिरवी रखा। खुद। अपनी मर्ज़ी से। कहीं बाहर से कोई आया नहीं था। कोई चोर नहीं था। कोई जादूगर नहीं था। तुम्हारे बाबा ने काग़ज़ पकड़ा, कलम पकड़ी, और लिख दिया।”
“क्यों?”
“क्यों?” उसने दोहराया और हल्की हँसी दी। “अरे बेटा, क्यों की बात उस दिन की रसीद पर नहीं लिखी जाती। रसीद पर सिर्फ़ यह लिखा जाता है कि क्या रखा गया और कब तक नहीं खोला जाएगा। बाक़ी बातें चूल्हे के पीछे होती हैं। घर के अंदर।”
मैंने काग़ज़ को करीब लाकर देखा।
दो लकीरें।
और बीच में एक बिंदु।
वही निशान।
उसी काग़ज़ पर, उसी लिखाई के नीचे, उसी तरह खींचा हुआ, जैसे किसी ने अपनी आख़िरी बात के बाद यह निशान लगाया हो — मानो हस्ताक्षर की जगह।
“यह निशान,” मैंने कहा।
“हाँ,” चंद्रेश ने कहा। “यह निशान गली के हर उस दरवाज़े पर है जहाँ कुछ रखा गया है। यह न किसी का नाम है, न किसी की मोहर। यह निशान उस चीज़ का है जो रखती है।”
“कौन रखती है?”
“याद,” उसने कहा। “याद रखती है, बेटा। बस उसका हिसाब अलग तरीक़े से लिखा जाता है।”
मैंने काग़ज़ को मोड़ना चाहा। उसने हाथ बढ़ाया।
“मोड़ो मत,” उसने कहा। “फटे काग़ज़ को ज़्यादा मत छूओ। यह जितना छूटेगा, उतना फटेगा।”
“यह तो मेरी जेब में जाएगा, साहब।”
“नहीं,” उसने कहा। “यह काग़ज़ आज मेरी जेब में है। तुम्हारे पास सिर्फ़ यह रसीद रहने दो। रसीद तुम्हारी है — तुम्हारे बाबा ने लिखवाई है, तुम्हें रखने का हक़ है।”
“और यह फटा काग़ज़?”
“यह मेरा है,” उसने कहा। “क्योंकि यह जिस चीज़ का काग़ज़ है, वो मेरे पास है।”
मैंने उसकी तरफ़ देखा।
गाड़ी की छत पर धूप पड़ रही थी, हल्की गरम, और चंद्रेश के चेहरे पर वो धूप ऐसे पड़ रही थी जैसे किसी पुराने पत्थर पर सदियों की धूल पड़ रही हो।
“साहब,” मैंने कहा, “मेरी याद किसी ने चुराई कैसे?”
वो हँसा।
और यह हँसी पहली वाली हँसी नहीं थी। यह गहरी थी। यह अंदर से आ रही थी, जैसे किसी बंद कमरे में बरसों से एक बात रखी हो और आज उसे हवा मिल गई हो।
“चुराई किसी ने नहीं, बेटा,” उसने कहा। “गिरवी रखी गई थी।”
“फ़र्क़ क्या है?”
“फ़र्क़ बहुत है,” उसने कहा। “चोरी में तुम दुश्मन ढूँढ़ते हो। गिरवी में तुम अपने ही घर के काग़ज़ ढूँढ़ते हो। और गिरवी रखने वाला भी कोई बाहर का नहीं था।”
मैंने पीछे की तरफ़ नहीं देखा। पर मुझे लगा कि मीरा ने अपनी साँस रोक ली है।
“कौन था?” मैंने पूछा।
“तुम्हारे बाबा ने खुद हाथ बढ़ाया था, बेटा,” उसने कहा। “जब आग लगी थी, तब। उस रात उनके पास दो रास्ते थे — एक में उनकी दुकान बचती थी, दूसरे में उनका घर। उन्होंने एक रास्ता चुना। और उस रास्ते की कीमत उन्होंने अपनी याद से चुकाई।”
मेरा गला और सूखा।
“कौन सी याद?”
“यह मैं नहीं बताऊँगा,” उसने कहा। “यह काग़ज़ बताएगा। और वो काग़ज़ आज इस फाइल में नहीं है। जिसके पास काग़ज़ है, वो बताएगा।”
“कौन बताएगा?”
“वही जिसने काग़ज़ लिखवाया था,” वो मुस्कुराया। “या वही जिसने उसे रखा।”
मैंने रसीद को अपनी जेब में रखा। धीरे से। कोने से पकड़कर।
“साहब,” मैंने कहा, “आपने अभी कहा कि यह फाइल मेरी याद नहीं है। फिर इसमें यह काग़ज़ क्यों है?”
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