The Mysterious Bell – Chapter 1241
मैंने आँखें बंद कर लीं।
"रफ़ीक़," टिंकू की आवाज़ आई, खंभे के पीछे से, फुसफुसाती पर साफ़, "अभी तेरे दो मिनट पूरे नहीं हुए।"
"मुझे लगा कुछ हुआ।"
"कुछ नहीं हुआ। बैठ।"
"मैं खड़ा हूँ।"
"तो खड़ा रह, पर हाथ नीचे रख।"
मैंने मुस्कुराने की कोशिश की और मुँह से आवाज़ नहीं निकली।
तभी सानिया खंभे के पीछे से निकली — नहीं, वो निकली नहीं, वो खंभे के पीछे से झाँक रही थी और उसकी आँखें मेरी तरफ़ थीं। उसने अपनी लाल कॉपी सीने से चिपकाई हुई थी।
"उस्ताद," उसने कहा। उसकी आवाज़ धीमी थी, और इसीलिए मुझे समझ आ गया कि बात छोटी नहीं है।
"क्या?"
"एक बात कहूँ?"
"कह।"
"ये गाड़ी," सानिया ने कहा, "रोज़ सात बजे यहाँ नहीं होती।"
मैंने उसकी तरफ़ देखा।
"मैं रोज़ स्कूल जाती हूँ इसी रास्ते से," सानिया ने कहा। "सुबह भी। और शाम को जब अम्मी के साथ सब्ज़ी लेने जाती हूँ, तब भी। ये गाड़ी यहाँ कभी नहीं होती। ये जगह —" उसने खंभे की तरफ़ इशारा किया, "— किताबों की दुकान के सामने है। दुकानदार बाबा दो बजे दुकान बंद करके सो जाते हैं। उनकी दुकान के सामने कोई गाड़ी नहीं खड़ी करता, क्योंकि वो गुस्सा करते हैं।"
"तो आज क्यों?"
"क्योंकि आज उन्होंने दुकान बंद नहीं की," सानिया ने कहा।
मैंने देखा। दुकान का शटर आधा गिरा हुआ था। आधा, पूरा नहीं।
"और," सानिया ने कहा, "वो रफ़ीक़ के मामा की दुकान है।"
मैंने रफ़ीक़ की तरफ़ देखा। वो खंभे के पीछे से बाहर आ गया था और अब सीधा खड़ा था, और उसका चेहरा वैसा था जैसा बच्चों का होता है जब वो कोई बात छिपा रहे हों और छिपा न पा रहे हों।
"रफ़ीक़?" मैंने कहा।
"मामा ने कहा था," रफ़ीक़ ने धीरे से कहा, "कि आज कोई बड़ी गाड़ी आएगी और वो दुकान बंद नहीं करेंगे।"
"क्यों?"
"क्योंकि उन्होंने मामा से कहा है कि आज भाई लोग आएँगे। मामा ने कहा कि वो सिर्फ़ काग़ज़ देखेंगे और चले जाएँगे।"
"काग़ज़," मैंने कहा।
"हाँ," रफ़ीक़ ने कहा। "मैंने मामा से पूछा कि कौन सा काग़ज़। मामा ने कहा कि बड़ा सा काग़ज़, जिस पर बहुत सारे नाम लिखे हैं।"
मीरा ने मेरी तरफ़ देखा।
मैंने घंटी जेब से निकाली। वो अब भी गरम थी। और अब मैंने उसे अपनी हथेली में रखा और धीरे से बजाया।
एक छोटी सी आवाज़ आई। जैसे कोई बहुत दूर से बोल रहा हो।
"धीरे," घंटी ने कहा। "अभी मत कर।"
"अभी मत कर," मैंने दोहराया, अपने आप से।
"क्या कहा?" मीरा ने पूछा।
"कुछ नहीं।" मैंने घंटी जेब में वापस रखी।
और फिर मैंने गाड़ी की तरफ़ देखा।
वो छोटी पीतल की डिब्बी अब भी हिल रही थी। और अब मुझे लगा कि उसके हिलने का तरीक़ा अजीब है — जैसे कोई चीज़ भीतर से ऊपर उठने की कोशिश कर रही हो और बंद हो जाती हो। जैसे साँस। जैसे कोई भीतर बंद हो और उसे नींद न आ रही हो।
"मीरा," मैंने कहा। "उस डिब्बी की तस्वीर फिर खींच।"
उसने खींची।
"बड़ा कर।"
उसने बड़ा किया। फिर उसने तस्वीर को करीब लाकर देखा।
"अंकुश," उसने धीरे से कहा। "इस डिब्बी पर वही निशान है।"
"कौन सा?"
"दो लकीरें," उसने कहा। "और बीच में बिंदु।"
मैंने आँखें बंद कर लीं।
वो निशान — घंटी के छल्ले पर। चूल्हे के पीछे वाले दरवाज़े की लकड़ी पर। बिजलीघर के बक्से की दीवार पर। असली ताले पर। मंसूर के पीले काग़ज़ पर। चंद्रेश के सम्मान कार्ड पर।
वही निशान।
"ये सिर्फ़ निशान नहीं है," मैंने कहा। "ये नाम है। ये मेरे ही घर का नाम है।"
"या," मीरा ने कहा, "ये उस आदमी का नाम है जिसने तेरा घर बनाया था।"
मैं खंभे से टिक गया।
सामने गाड़ी खड़ी थी, और उसमें एक सफ़ेद फाइल थी, और उस फाइल के ऊपर एक पीतल की डिब्बी थी, और उस डिब्बी पर मेरे घर का नाम खुदा था।
और मेरी जेब में एक ताला था, जो कभी-कभी हिलता था।
"अब सुन मेरी बात," मैंने कहा। मेरी आवाज़ वैसी नहीं थी जैसी होनी चाहिए थी। "मैं अब जाकर उस गाड़ी का दरवाज़ा खोलने की कोशिश नहीं करूँगा।"
"ठीक है।"
"क्योंकि इसमें कोई झंझट है। और मैं उसमें फँसूँगा।"
"ठीक है।"
"मैं इसकी जगह एक काम करूँगा।"
"क्या?"
"मैं उस गाड़ी के सामने खड़ा हो जाऊँगा," मैंने कहा। "और देखूँगा कि कौन पहले झुकता है।"
मीरा ने कुछ कहा नहीं।
"अंकुश," उसने फिर कहा, "तू मेरी कॉपी में कुछ लिखवाना चाहता है?"
"क्यों?"
"क्योंकि," उसने कहा, "तू इस वक़्त जो करने जा रहा है, वो काग़ज़ में लिखा हो तो आगे काम आएगा।"
मैंने उसकी कॉपी ली।
और मैंने लिखा — आज शाम सात बजे, रणवीर ने सारी फाइलें खुली मेज़ पर रखने की बात कही है। इससे पहले, चंद्रेश की गाड़ी में एक सफ़ेद फाइल है जिस पर याद और एक लिखा है, और उसके ऊपर पीतल की एक छोटी डिब्बी है जिस पर मेरे घर का निशान है।
फिर मैंने एक और लाइन जोड़ी।
अगर मैं आज इस गाड़ी से कुछ लेकर नहीं आया, तो इसका मतलब है कि मैं वहाँ पहुँचा ही नहीं।
"क्यों लिखा ये?" मीरा ने पूछा।
"क्योंकि तू," मैंने कहा, "अगर मैं न पहुँचूँ, तो ये किसी को दिखा देना।"
मीरा ने मेरी तरफ़ देखा।
"अंकुश।"
"हाँ।"
"मत कर।"
"क्या?"
"ये सब मत कर," उसने कहा। "ये सब जो तू अपने सिर पर चढ़ा रहा है। कोई मरने वाला नहीं है। हम सब हैं।"
मैंने उसकी तरफ़ देखा। उसके पास वही फटा बैग था। वही कैमरा। वही टूटी घड़ी। और उस घड़ी की सुई अब भी चल रही थी।
"ठीक है," मैंने कहा। "तो हम सब हैं।"
तभी — दूर से — गली के मुँह की तरफ़ से, मुझे रोशनी दिखी।
दो गाड़ियों की रोशनी नहीं। एक गाड़ी की। बड़ी गाड़ी की। और वो हमारी तरफ़ आ रही थी।
मैंने खंभे के पीछे देखा। चारों बच्चे एकदम शांत खड़े थे, जैसे सबने एक साथ पत्थर हो जाने की क़सम खाई हो।
और फिर सफ़ेद गाड़ी आई।
वो रुकी।
मेरे और मीरा के सामने, सिर्फ़ दो हाथ की दूरी पर।
इंजन बंद हुआ।
शीशा नीचे हुआ।
और अंदर से चंद्रेश सक्सेना का चेहरा निकला, वैसे ही मुस्कुराता हुआ जैसे कोई बुज़ुर्ग मुस्कुराता है जब वो जानता हो कि उसने अपनी सारी बातें पहले ही बोल दी हैं और अब तुम्हारी बारी है।
"बेटा," उसने कहा। "अंदर आ जाओ।"
मैंने कुछ नहीं कहा।
"तुम्हें जो देखना है," चंद्रेश ने कहा, "मैं खुद दिखा देता हूँ।"
॥
मैंने टिंकू की तरफ़ पीछे हाथ उठाया। बस इतना — हथेली नीचे, जैसे कोई कहे, रुक जा, यहीं खड़ा रह।
टिंकू रुक गया। उसके पीछे सानिया, गुड्डू, रफ़ीक़ और चिंटू खंभों की आड़ में साँस भी धीमी ले रहे थे।
मैंने मीरा की तरफ़ देखा। उसने कैमरा सीने से लगा लिया था, पर बत्ती बंद थी। उसकी आँखों में वही बात थी जो मेरे अंदर उबल रही थी — यह आदमी इतना शांत क्यों है।
मैं गाड़ी की तरफ़ बढ़ा।
दो कदम। चार कदम।
गाड़ी की धूल में लिपटी सफ़ेद चमक मेरी आँखों में चुभ रही थी, और अंदर से नई गाड़ी की महक आ रही थी — चमड़े की सीट, कोई महँगा इत्र, और उसके ऊपर एक पतली सी स्याही की गंध। जैसे दफ़्तार की गंध। जैसे काग़ज़ की गंध।
मैं खिड़की के पास झुका।
चंद्रेश अंदर बैठा था, दोनों हाथ गोद में, सफ़ेद कुर्ता इस्त्री किया हुआ, कलाई पर सफ़ेद घड़ी, और चेहरे पर वही मुस्कान जो किसी के भी दिल में यह बात डाल देती है कि तुम्हारा भला होने वाला है।
“अंदर आ जाओ, बेटा,” उसने फिर कहा। “गाड़ी में बैठकर बात करते हैं। गली में खड़े होकर बात करना अच्छा नहीं लगता।”
वेबसाइट पर अपनी पसंदीदा कहानियाँ मुफ्त पढ़ें और Story FM App पर उन्हीं कहानियों का शानदार Audio Experience लें।
यह कहानी Story FM app पर ऑडियो में भी सुनें — आगे के एपिसोड सबसे पहले वहीं आते हैं।
Audio mein suno