The Mysterious Bell1237 / 1504

The Mysterious Bell – Chapter 1237

7 min read November 5, 2026

"काजल जाएगी," उन्होंने कहा, "और तू जाएगा। और वो…" उन्होंने पूर्णिमा की तरफ़ देखा, जो अब भी कोने में खड़ी थीं, और जिनकी आँखें अब भी माँ पर टिकी थीं।

"वो भी जाएँगी," माँ ने कहा, "उनका नाम किताब में है, तो वो मैदान पर ही रहेंगी।"

पूर्णिमा ने कोई जवाब नहीं दिया। उन्होंने सिर्फ़ माँ की तरफ़ देखा, और उनकी आँखों में कुछ था जो बाईस साल की चुप्पी से भी भारी लग रहा था।

फिर वो बोली, धीरे से, जैसे किसी पुराने गीत की पहली पंक्ति, "तुमने उसका नाम नहीं बदला।"

माँ ने कहा, "किसका?"

"मेरे बेटे का।" पूर्णिमा ने कहा। "तुमने उसका नाम शंकर ही रखा।"

माँ ने कुछ नहीं कहा।

"मैंने सोचा था," पूर्णिमा ने कहा, "तुम उसे अपने पिता का नाम दे दोगी। या अपने पिता का।"

"मैंने सोचा था," माँ ने धीरे से कहा, "कि अगर मैं उसका नाम बदल दूँगी, तो किसी और के नाम से तुम उसे ढूँढ लोगी।"

कमरा सुन्न।

पूर्णिमा ने कोई जवाब नहीं दिया। उन्होंने बस अपनी साड़ी का पल्लू पकड़ा, और मैंने देखा उनकी आँखें भर आई थीं।

मैंने कुछ नहीं कहा।

मैंने बही उठाई, उसे उस्ताद के हाथ से लेकर दुकान के उस लोहे के संदूक में वापस रख दिया, जहाँ से वो आई थी। पर मैंने संदूक का ढक्कन बंद नहीं किया।

क्योंकि मुझे लगा कि जो चीज़ खुली है, उसे अब बंद करना झूठ होगा।

बाहर आकर मैंने देखा — आसमान साफ़ था, और पीपल की डालियाँ हिल रही थीं, धीरे-धीरे, जैसे किसी ने बताया हो कि दोपहर बीत गई है।

बबलू दरवाज़े के बाहर खड़ा था, और उसके हाथ में अब खाली गिलास था।

"क्या हुआ?" मैंने पूछा।

"कुछ नहीं," उसने कहा, "बस सोच रहा था — जब मैं पहली बार इस गली में आया था, तो यहाँ की दीवारों से मुझे डर लगता था। क्योंकि मुझे लगता था इन दीवारों ने मेरे बारे में भी कुछ जान लिया है।"

"और अब?"

"अब लगता है," उसने कहा, "दीवारों पर वो सब लिखा है जो मैंने कभी अपने से नहीं कहा।"

तभी हमने सुना।

गुमटी की तरफ़ से आवाज़ आई — एक औरत की आवाज़, और उसमें वो तीखापन था जो शबनम आपा में भी है, पर उसमें कुछ और भी था। थोड़ा और तेज़, थोड़ा और कच्चा।

मैंने मुड़कर देखा।

रज़िया गुमटी की तरफ़ चली आ रही थी। सिर पर वही हल्का दुपट्टा। हाथ में वही टेप से बँधा सूटकेस नहीं था। आज उसके हाथ खाली थे।

और वो रो रही थी।

मैंने बबलू की तरफ़ देखा। उसने कहा, "तुम्हारे लिए कुछ है।"

"क्या?"

"मुझे नहीं पता," उसने कहा, "पर उसने आते वक़्त कहा कि आज शाम उसके पास वो चीज़ होगी जिससे याद का ताला खुलेगा।"

मैंने रज़िया की तरफ़ देखा। वो गुमटी के पास रुकी, शबनम आपा की तरफ़ देखा, और फिर भागकर उनके गले लग गई।

मैंने उनकी तरफ़ देखा, और फिर मैंने अपनी जेब से घंटी निकाली।

उसे हाथ में रखते ही मुझे लगा — ये आज पहली बार है कि वो मेरे हाथ में कुछ कह रही है।

मैंने कान लगाया।

और बहुत धीरे, बहुत दूर से, जैसे कोई सालों पुरानी सुरंग से बुला रहा हो, घंटी ने कहा—

"अब याद की चाबी बोलेगी।"

॥

घंटी ने कहा — अब याद की चाबी बोलेगी।

और फिर चुप हो गई। पर इस बार उसकी चुप्पी अलग थी। पहले जब वो चुप होती थी, तो लगता था कि कुछ छिपा रही है। आज लगा कि उसने जो कहा, वो कहकर थक गई है, और अब मुझे चलना है।

मैंने घंटी को हथेली में बंद किया और गुमटी की तरफ़ देखा।

रज़िया वहाँ खड़ी थी। शबनम आपा ने उसका चेहरा दोनों हाथों में पकड़ रखा था, जैसे कोई बर्तन धो रही हो — बहुत हल्के हाथों से, बहुत डर से, कि कहीं टूट न जाए।

मैं पास गया।

"क्या हुआ?" मैंने पूछा।

रज़िया ने मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखें लाल थीं, पर आवाज़ साफ़ थी। औरत जब रोते हुए भी साफ़ बोले, तो समझ लो कि वो रो नहीं रही, कुछ कह रही है।

"तीन," उसने कहा।

"क्या तीन?"

"बही में मेरे नाम के आगे लिखा है — लौटाना। और तीन लिखा है।" उसने दुपट्टे से नाक पोंछी। "और मैंने तीन बार लौटाया भी है।"

शबनम आपा ने उसकी कमर पकड़ी और उसे गुमटी के पास खड़ी बेंच पर बैठा दिया।

"तीन बार कब?" मीरा ने पूछा। वो पीछे खड़ी थी, कैमरा अभी बंद था, पर हाथ उस पर रखा हुआ था, जैसे किसी की तरफ़ इशारा कर रही हो।

"एक बार अस्पताल के गेट पर," रज़िया ने कहा। "जब शंकर भैया की माँ भर्ती थीं। मैंने एक कटोरी दूध ले जाकर रखा और लौट आई।"

"दूसरी बार?"

"दूसरी बार इस गुमटी के दरवाज़े पर। तीन ख़त लिखकर लाई थी, और नाली में फेंक दिए।"

"और तीसरी बार?"

रज़िया ने कोई जवाब नहीं दिया। उसने सिर्फ़ अपनी दाहिनी टाँग की तरफ़ देखा — जहाँ उस दिन प्लास्टर था, अब टाँग पर पुराने प्लास्टर का निशान बचा था, हल्का सा, जैसे कोई पेंसिल से चारों तरफ़ लकीर खींच गया हो।

"तीसरी बार मैं लौटी," उसने कहा। "मुँह लेकर। और उस दिन उन्होंने मुझे पहचानने से मना कर दिया।"

शबनम आपा ने कुछ नहीं कहा। उन्होंने बस अपनी चिमटी उठाई, और गुमटी के चूल्हे के पास रख दी, जैसे अब ये काम का नहीं।

मैंने रज़िया से कहा, "शाम को ये सब बोलेगा। सात बजे। अस्पताल के पुराने मैदान में।"

"मैं आऊँगी," उसने कहा। "पर एक बात अभी कह दूँ, भैया। मेरे पास कोई काग़ज़ नहीं है। मेरे पास बस एक कटोरी है। और वो भी टूटी हुई।"

"टूटी चीज़ें ही तो लाते हैं लोग," मैंने कहा। "टूटी कटोरी, टूटा पहिया, टूटी साइकिल। आप भी ले आइए।"

वो हँसी। एक बार। छोटा सा हँसा, जैसे दरवाज़े के नीचे से हवा आई हो।

और मुझे उसी वक़्त लगा कि मुझे अब वहाँ जाना है जहाँ ऐसी हवा नहीं आती, जहाँ सिर्फ़ काग़ज़ होते हैं और उनकी गंध होती है, और काग़ज़ों की गंध कभी झूठ नहीं बोलती।

मैंने मीरा की तरफ़ देखा।

"चलो," मैंने कहा।

"कहाँ?"

"नगर निगम।"

मीरा ने कैमरा कंधे पर टाँगा और एक लंबी साँस छोड़ी, जैसे वो दिन भर यही सुनना चाह रही थी।

हम गली के मुँह से निकले, पीपल के पास से गुज़रे — जहाँ अब न बोर्ड था, न मेज़, न कोई बैठा था — और उस गली में मुड़ गए जो पुराने बाज़ार की तरफ़ जाती है।

चलते-चलते मीरा ने पूछा, "क्यों नगर निगम?"

"क्योंकि काग़ज़ एक जगह नहीं रहता," मैंने कहा। "अगर असली काग़ज़ एक जगह जलाया जा सकता है, तो उसकी नक़ल कहीं और बैठी होती है। और सरकारी दफ़्तर में नक़ल ही असली हो जाती है।"

"और तुम्हें कैसे पता कि उनका रिकॉर्ड कमरा वहाँ है?"

"मुझे नहीं पता," मैंने कहा। "पर जिस दफ़्तार में काग़ज़ पैदा होता है, उसी में काग़ज़ मरता भी है।"

मीरा ने मेरी तरफ़ देखा और कहा, "तुम्हें पता है, तुम कभी-कभी ऐसी बातें कहते हो जो पता नहीं कहाँ से आ जाती हैं।"

"दुकान के पीछे वाले कमरे से," मैंने कहा। "वहाँ रात में बैठकर बहुत बातें अपने आप आ जाती हैं।"

नगर निगम का दफ़्तार पुराने बाज़ार के उस पार था — एक लंबी पीली इमारत, हरी खिड़कियाँ, और नीचे एक पुराना पोर्टिको जिसमें बारह आदमी खड़े रह सकते थे और चार साइकिलें।

सामने बेंच पर एक आदमी बैठा था जिसके हाथ में पुरानी पर्चियों का बंडल था। उसने हमें देखा और तुरंत नज़र नीची कर ली।

अंदर गए।

गलियारा लंबा था और उसमें दो पंखे लगे थे, और दोनों इतनी धीमी गति से घूम रहे थे कि मुझे लगा वो भी कर्मचारियों की तरह नौकरी कर रहे हैं — काम नहीं, बस हाज़िरी।

"रिकॉर्ड कमरा?" मैंने एक चपरासी से पूछा।

उसने बिना देखे हाथ से पीछे की तरफ़ इशारा किया और कहा, "पीछे, आख़िरी गलियारा। पर वहाँ कुंदन बाबू हैं, वो किसी को कुछ नहीं देते।"

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