The Mysterious Bell – Chapter 1238
"कुंदन बाबू?"
"कुंदनलाल," उसने कहा। "रिटायर हो गए हैं, पर आते हैं। दस साल से आ रहे हैं। तनख्वाह नहीं लेते। किसी को बताए भी नहीं। बस आते हैं, अपनी मेज़ पर बैठते हैं, और काग़ज़ पोंछते हैं।"
मीरा ने मेरी तरफ़ देखा।
मैंने कहा, "यही चाहिए था।"
"ऐसा आदमी?"
"ऐसा आदमी जो तनख्वाह के बिना काग़ज़ों के बीच आता है," मैंने कहा, "वो काग़ज़ों से बात करता होगा।"
और मैं सही था।
पिछला गलियारा और उसके बाद एक बड़ा कमरा — लंबा, चौड़ा, और भरा हुआ। लोहे के रैक ज़मीन से छत तक, रैक पर बंडल, बंडलों पर धूल, धूल पर उँगलियों के निशान — किसी की उँगलियाँ जो इन्हें छूकर ढूँढती थीं।
कमरे के आख़िर में, एक छोटी सी मेज़ पर, एक आदमी बैठा था।
सत्तर से ऊपर। सिर पर बाल कम, कान पर पुराना चश्मा जिसका एक काँच टूटा नहीं था, पर उस पर धागे से पुल बना हुआ था। कमीज़ की आस्तीन चढ़ी हुई, और हाथ में कपड़े का एक टुकड़ा।
और वो कपड़े से एक छोटा पीतल का बर्तन पोंछ रहा था।
मैं कमरे में घुसा। मीरा पीछे।
कुंदनलाल ने मेरी तरफ़ देखा भी नहीं। उसने अपने बाएँ हाथ से एक काग़ज़ उठाया, उसे नाक के पास ले गया, सूँघा, और बोला, "अरे बेटा, तू तो आज ही आया है। तेरा तो अभी दूध पीने का वक़्त है।"
फिर उसने दाहिनी तरफ़ एक और काग़ज़ उठाया, उसे देखा और कहा, "ख़ाला, तू मत रो। तेरा नंबर ऊपर है।"
मीरा ने मेरी तरफ़ देखा। मुझे उसके चेहरे पर हँसी दबाने की कोशिश दिख रही थी।
कुंदनलाल ने कपड़ा उठाया, पीतल के बर्तन को उसी तरह पोंछा, फिर बोले — बिना पलटे, "तुम दोनों काग़ज़ों के लिए आए हो या किसी जीवित आदमी के लिए?"
"काग़ज़ के लिए," मैंने कहा।
"फिर बैठ जाओ," उसने कहा। "काग़ज़ कभी जल्दी नहीं बोलते। वो बैठने से बोलते हैं।"
हम बैठ गए। मेज़ के सामने दो लकड़ी की कुर्सियाँ थीं, दोनों की टाँगें घिसी हुई।
मीरा ने धीरे से कहा, "ये काग़ज़ों से बात करते हैं?"
"हाँ," मैंने कहा।
"और तुम्हें ये अजीब नहीं लग रहा?"
"मीरा," मैंने कहा, "मैं एक ऐसी घंटी से बात करता हूँ जो सिर्फ़ मेरी आवाज़ पहचानती है, और जो टूटी चीज़ें जोड़ने के लिए मुझसे रिश्ते जुड़वाती है। मुझे ये अजीब नहीं लगेगा।"
मीरा ने कॉपी निकाली और मुँह बिचका दिया।
कुंदनलाल ने बर्तन पोंछते-पोंछते कहा, "तुम मीरा हो। बस्ती की आवाज़ वाली।"
मीरा रुक गई। "आप जानते हैं?"
"मैं उस लड़की को जानता हूँ जो पाँच साल पहले एक खबर छापकर चुप हो गई थी," उसने कहा। "यहाँ लोग मुझसे काग़ज़ माँगने आते हैं, मीरा बीबी। उनका काग़ज़ उनकी ज़ुबान जितना चुप नहीं होता।"
मीरा ने कुछ नहीं कहा। मैंने देखा उसने कलम पकड़ने से पहले एक बार गहरी साँस ली।
मैंने कहा, "मुझे अस्पताल की ज़मीन वाला पन्ना चाहिए।"
कुंदनलाल का हाथ रुका। बस एक पल। फिर फिर पोंछने लगा। और वो बोला, बिना किसी रैक की तरफ़ देखे, बिना उठे, बिना उँगली उठाए —
"वो पन्ना यहाँ नहीं है।"
"आपने ढूँढा भी नहीं," मीरा ने कहा।
"ढूँढने की ज़रूरत क्या है, बेटी," उसने कहा, "जब मुझे पता है कि वो कहाँ है और कहाँ नहीं है। वो पन्ना सालों पहले अलग करवा दिया गया था।"
कमरे में सिर्फ़ मेरा सवाल था। "किसने करवाया?"
कुंदनलाल ने पहली बार अपना कपड़ा मेज़ पर रखा और मेरी तरफ़ देखा।
"सक्सेना," उसने कहा। "चंद्रेश सक्सेना। उस वक़्त वो इतना बड़ा वकील नहीं था। काग़ज़ों का मुहर्रिर था — कलम का आदमी, मुहर का नहीं। उसने कहा कि यह पन्ना किसी प्रस्तावित ज़मीन का है, इसलिए इसे अलग रख दो। और जिस दिन उसे अलग किया गया, उस दिन उसने मेरे सामने उस लिफ़ाफ़े पर मोहर लगाई। और मोहर लगाते वक़्त उसके हाथ नहीं काँपे।"
"और आपने मना नहीं किया?" मैंने पूछा।
"किया," उसने कहा। "मैंने कहा कि इस पन्ने पर अंगूठे हैं, यह ग़ायब नहीं हो सकता।"
उसने अपनी कुर्सी की पीठ पर हाथ रखा, और धीरे-धीरे बोला, "तब उसने मुझसे एक सवाल पूछा। उसने कहा — कुंदन भाई, आपको अंगूठे याद हैं, पर आपको किसी की ज़ुबान याद है?"
मीरा ने कलम नीचे रख दी।
"ये बात आपने किसी को बताई?" उसने पूछा।
"बताई थी," कुंदनलाल ने कहा। "एक आदमी को। अस्पताल का कंपाउंडर था, सलीम। वो अगले महीने उसी रात मर गया जिस रात डॉक्टर इसरानी ने उसकी आवाज़ नहीं सुनी।"
मैं चुप हो गया।
क्योंकि यह नाम मैं सुन चुका था। सकीना बी की दुकान पर, उस टिन के बक्से में रखे काग़ज़ में। सलीम अहमद।
"आप रजिस्टर दिखा सकते हैं?" मैंने कहा।
कुंदनलाल उठा। उसकी कमर झुकी हुई थी, और वो उठते वक़्त मेज़ का सहारा लिया। फिर वो पीछे गया, तीसरे रैक के आख़िरी हिस्से में, और बिना देखे — बिल्कुल बिना देखे, जैसे अपने ही घर में चल रहा हो — उसने एक रैक से मोटा रजिस्टर उठा लिया।
लाल कपड़े की जिल्द, किनारों से उखड़ी, और ऊपर की तरफ़ लिखा था — हिसाब खाता। और साथ में एक तारीख़।
वो उसे मेज़ पर लाया। इतना मोटा कि मेज़ हिल गई।
"ये तारीख़ देखो," उसने कहा और उँगली रख दी।
मीरा ने सिर झुकाया। मैंने भी।
तीसरे महीने की सातवीं तारीख़। और साल — वही साल, जिस साल गली में आग लगी थी।
और मीरा की कलम रुक गई।
वो कुछ देर वैसे ही नीचे देखती रही। फिर उसने कलम उठाई, कुछ लिखा, और फिर से रुक गई।
"ये तारीख़," उसने धीरे से कहा। "ये वही है?"
"हाँ," कुंदनलाल ने कहा।
"क्या?" मैंने पूछा।
मीरा ने मेरी तरफ़ देखा। "यही तारीख़ है जिस रात उस्ताद की माँ की दुकान जली थी?"
"नहीं," कुंदनलाल ने कहा। "उस्ताद की माँ उस आग के पाँच दिन बाद चली गई थीं।"
कमरा चुप हो गया।
मैंने रजिस्टर के उस पन्ने को देखा। ऊपर सात नाम लिखे थे। मैंने एक-एक करके पढ़े — कुछ नाम पढ़े जा सकते थे, कुछ पर स्याही फैली थी, और नीचे आख़िरी नाम —
जगदीश यादव।
मेरा हाथ अपने आप रजिस्टर पर रखा जा रहा था, और मैंने उसे रोका। क्योंकि मैंने एक बार पहले भी कुछ छुआ था, और सत्तर अंक खो दिए थे।
"इस पन्ने पर सात अंगूठे थे," कुंदनलाल ने कहा।
वो अब मेज़ की दूसरी तरफ़ से बोल रहा था, और उसकी आवाज़ में कुछ बदल गया था। वो अब काग़ज़ों से बात नहीं कर रहा था।
"मैंने उन्हें लगते देखा था," उसने कहा। "अपनी आँखों से। सात आदमी आए थे। बढ़ई था, कंधे पर लकड़ी रखे हुए। किराने वाला था, हाथ में तराज़ू की चाबी। तांगे वाले की टोपी वाला एक आदमी था, जो बैठा भी नहीं, खड़ा ही अंगूठा लगा गया। दर्ज़ी था, कान पर पेंसिल। हलवाई था, हाथ पर जले का निशान। और टोपी आँखों तक खींचे एक बूढ़ा था, जिसने अंगूठा लगाकर किसी के कंधे पर हाथ रखा।"
"और सातवाँ?" मैंने पूछा।
कुंदनलाल ने कपड़ा उठाया और पीतल के बर्तन को फिर पोंछने लगा। एक बार। दो बार। तीन बार।
फिर उसने वो कपड़ा रख दिया, कुर्सी पीछे सरकाई, और मेरी तरफ़ पूरा मुड़ गया।
"सातवाँ अंगूठा तेरे बाबा जगदीश यादव का था, बेटा।"
मेरे हाथ में घंटी अचानक गरम हो गई।
"और उसी रात," कुंदनलाल ने कहा, और उसकी आवाज़ अब बहुत धीमी थी, "उनका नाम काग़ज़ों से मिटा दिया गया।"
बाहर आते वक़्त मीरा ने एक शब्द भी नहीं कहा। वो सीढ़ियों पर चुपचाप चली, गलियारे में चुपचाप चली, पोर्टिको के नीचे पहुँचकर रुकी, और वहाँ जाकर उसने तीन लंबी साँसें लीं।
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