The Mysterious Bell – Chapter 1236
फिर मैंने कहा, "तुम यहीं रहो।"
"यहाँ?"
"हाँ। और जब शाम को मैदान पर सब जाएँ, तो तुम भी साथ जाओ।"
"पर साहब ने—"
"साहब ने जो कहा," मैंने कहा, "वो साहब के लिए कहा। तुमने तो सुना ही था — कुछ चीज़ें ऐसी होती हैं जिनका नाम नहीं लिया जाता। तो आज शाम हम सबका नाम लेंगे।"
बबलू ने एक लंबी साँस भरी।
और फिर उसने कुछ किया जो मैंने उसे कभी करते नहीं देखा था।
उसने अपनी जेब से अपना पुराना पहचान कार्ड निकाला — प्लास्टिक की परत उखड़ी हुई, कोने मुड़े हुए। उस पर भारद्वाज कंस्ट्रक्शन का नाम छपा था।
उसने उसे मेज़ पर रखा।
"ये मेरा नहीं," उसने कहा, "ये उसका था। जिसने मुझे दिया, उसने मुझे बताया था — इस कार्ड से तुम गली में कहीं भी जा सकते हो, कोई नहीं रोकेगा। अब ये किसी काम का नहीं।"
मैंने कार्ड उठाया। पलटकर देखा। पीछे कुछ लिखा था।
मैंने पढ़ा। चार अक्षर थे, बहुत छोटे, महीन नीली स्याही में।
"याद।"
मैंने कार्ड वापस मेज़ पर रखा। मेरे हाथ काँप रहे थे।
"बबलू भाई," मैंने कहा, "ये कार्ड किसने दिया था?"
"चंद्रेश सक्सेना ने," उसने कहा, "तीन साल पहले। जब मैं साहब का आदमी बना था।"
कमरा फिर चुप हो गया। इस बार चुप्पी में कुछ और था। जैसे कोई सूत जुड़ रहा हो।
मैंने मीरा की तरफ़ देखा। उसने अपनी कॉपी में कुछ लिखा और सिर उठाकर मुझे देखा।
"अंकुश," उसने कहा, "ये कार्ड वो नहीं है जो साहब ने बबलू को दिया था। ये वो कार्ड है जो चंद्रेश ने खुद अपनी जेब से निकालकर दिया था। और किसी चीज़ पर याद लिखना — ये सिर्फ़ लिखना नहीं है। किसी को हमारा नाम याद रखने की शर्त पर दिया जाता है।"
मैंने उस्ताद की तरफ़ देखा। उन्होंने मेरी तरफ़ देखा, और उनके चेहरे पर एक छाया आई — कुछ ऐसा जो शायद वो खुद नहीं समझ पा रहे थे।
"उस्ताद," मैंने कहा, "आपने कहा था कि बही तब तक अधूरी है जब तक घंटी अपना सच न बोले। क्या इसका मतलब ये है कि घंटी किसी चीज़ से जुड़ी है?"
उस्ताद ने बहुत देर तक सोचा।
फिर उन्होंने धीरे से कहा, "घंटी किसी चीज़ से जुड़ी नहीं है। घंटी खुद वो जगह है जहाँ सच लिखा जाता है। जब कोई बोलता है, घंटी सुनती है। जब बहुत सारे लोग बोलते हैं, घंटी बोलती है। और जिस दिन कोई उसके सामने वो बात बोलेगा जो सबसे पहले कही गई थी, उस दिन घंटी अपना नाम भी बताएगी।"
"कौन सी बात?" मैंने पूछा।
"वो बात जो सबसे पहले कही गई थी।" उन्होंने कहा, "वो मुझे नहीं पता। जिसने बोली थी, वो जानता है।"
मैंने अपनी जेब से घंटी निकाली। कपड़ा खोला। घंटी मेरे हाथ में आई।
ये ठंडी नहीं थी।
ये गरम नहीं थी।
ये बस वहाँ थी, जैसे किसी का हाथ।
मैंने उसे देखा और बहुत धीरे कहा, "तुम कब बोलोगी?"
कोई जवाब नहीं आया।
मैंने उसे जेब में रख लिया।
फिर बबलू बोला, और उसकी आवाज़ में वो सब कुछ था जो एक आदमी को बीस साल बाद मिलता है जब वो अपने ही अंधेरे से बाहर आता है।
"अंकुश भाई," उसने कहा, "मैं शाम को साथ चलूँगा। पर एक बात पहले पूछ लूँ — अगर मेरा नाम उस किताब में है, तो क्या मैं बच जाऊँगा?"
मैंने कहा, "नाम होने का मतलब ये नहीं है कि तुम खत्म हो। नाम होने का मतलब ये है कि तुमसे जुड़ी कोई चीज़ अभी बाक़ी है।"
"और अगर बाक़ी होने का मतलब ये हो कि मैं किसी के लिए कुछ उधार हूँ?"
"तो," मैंने धीरे से कहा, "आज शाम वो उधार लौटेगा। और उधार लौटने का कोई अच्छा दिन नहीं होता।"
बबलू ने अपना गिलास उठाया और बाकी चाय एक साँस में पी गया।
फिर वो उठा, स्टूल को दीवार से लगाकर रखा, और कहा, "मैं दुकान के बाहर खड़ा रहूँगा। अगर कोई गाड़ी आए, मैं अंदर खबर करूँगा।"
"ठीक है।"
वो बाहर गया। और जब वो गया, तो कमरा एक अजीब तरह से खाली लगने लगा, जैसे वहाँ से कोई बोझ उठा लिया गया हो, और फिर अचानक याद आया कि वो बोझ किसी और ने उठाया है।
मैंने अपनी कॉपी खोली।
मैंने उस पर तारीख़ लिखी। फिर एक पंक्ति — "आज बबलू अपने नाम से आया।"
फिर मैंने उस्ताद की तरफ़ देखा और पूछा, "उस्ताद, किताब में पूर्णिमा का नाम है। पर वो काग़ज़ जो दादी के पास से आया, वो अलग था। दोनों का क्या रिश्ता है?"
उस्ताद ने बही खोली। पन्ना पलटा। उँगली उस लाइन पर रखी जहाँ पूर्णिमा का नाम था।
"इस लाइन के नीचे एक और लाइन है," उन्होंने कहा, "जो आज सुबह तक नहीं थी।"
मैंने देखा। उन्होंने उँगली से पंक्ति के नीचे इशारा किया।
वहाँ, पुरानी लाइन के बिल्कुल नीचे, नई स्याही में, महीन अक्षरों में एक लाइन जुड़ी थी।
"जिसने नाम छिपाया, उसका नाम पहले लिखा जाएगा।"
कमरे में फिर वो हुई जो पहले हुआ करता था। सबने एक साथ साँस ली।
मैंने बही उस्ताद के हाथ से ली और उसे अपनी कॉपी के बगल में रख दिया।
"अच्छा," मैंने कहा, "तो अब हम जानते हैं कि हम क्या ढूँढ रहे हैं।"
"क्या?" मीरा ने पूछा।
मैंने घंटी जेब से निकाली। मैंने उसे मेज़ पर रख दिया, ठीक बही के ऊपर।
बही गरम होने लगी। नहीं, गरम नहीं — बही की जिल्द के नीचे से एक हल्की गंध आने लगी, जैसे किसी पुराने कमरे की खिड़की खुली हो।
"अब हम वो नाम ढूँढ रहे हैं," मैंने कहा, "जो किताब में सबसे पहले लिखा गया था, और जिसे अब तक कोई पढ़ नहीं पाया।"
फिर मैंने उस्ताद की तरफ़ देखा और कहा, "उस्ताद, उस नाम को पढ़ने का कोई तरीक़ा है क्या?"
उस्ताद कुछ देर मेरी तरफ़ देखते रहे।
फिर उन्होंने स्टूल से उठकर, अपनी सिलाई की दुकान से लाई गई वही लकड़ी की स्टूल उठाकर दुकान के बाहर रखी और बोले, "आज शाम, शाम के सात बजे। जब मैदान पर फाइलें खुलेंगी, तो उस नाम को हम सबके सामने पढ़ा जाएगा।"
"पर वो नाम अभी तक नहीं मिला," मीरा ने कहा।
"वो मिल जाएगा," उस्ताद ने कहा, "क्योंकि जिसने छिपाया है, वो भी अब डर रहा है। और डरा हुआ आदमी हमेशा एक गलती करता है। वो चीज़ों को बचाने की जगह बदलने लगता है।"
उन्होंने रुककर कहा, "और सलीम ने आज सुबह मुझे बताया था कि उस सफ़ेद फाइल पर याद लिखा है। तो अब हमें ये देखना होगा — साहब ने वो फाइल छिपाई कहाँ है।"
मैंने कहा, "वो फाइल उसकी गाड़ी में है। रोज़ शाम गाड़ी आती है, रोज़ रात ड्राइवर उसे तिजोरी में रखता है।"
"तो हमें ड्राइवर चाहिए," मीरा ने कहा।
मैंने मुस्कुराकर कहा, "ड्राइवर से बेहतर है गाड़ी वाला।"
"क्या?"
"आज शाम गाड़ी के पास कोई और होगा," मैंने कहा, "हमें देखना होगा कौन।"
फिर मैंने टिंकू की तरफ़ देखा, जो अब भी दरवाज़े के पास बैठा था, घुटनों को छाती से लगाए।
"टिंकू," मैंने कहा, "तूने आज सुबह स्कूल में जो सूची लगी देखी थी, उस पर मेरा नाम था न?"
उसने सिर हिलाया।
"तुझे याद है उस पर क्या लिखा था?"
"अंकुश यादव," उसने कहा, "और नीचे — जोड़ने वाला।"
मैंने उस्ताद की तरफ़ देखा। उन्होंने सिर हिलाया, जैसे कुछ सोच रहे हों।
"जोड़ने वाला," मैंने कहा, "जो नाम जोड़ता है, उसका नाम पहले लिखा जाता है।"
कमरे में फिर चुप्पी।
फिर मैंने कहा, "आज शाम सात बजे, मैदान पर।"
माँ ने चारपाई से कहा, "मैं नहीं जाऊँगी।"
मैं उनके पास गया। उनका माथा छुआ। गरम था।
"ठीक है," मैंने कहा, "आप नहीं जाएँगी।"
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