The Mysterious Bell – Chapter 1235
उन्होंने अपना कंधे का रुमाल उतारा, उसे मोड़कर मेज़ पर रख दिया, और जैसे उस कपड़े में उन्होंने अपनी सारी तेज़ी रख दी हो, बोलीं—
"आज दोपहर मेरी बहन आ रही है। रज़िया। ग्यारह साल से नहीं बोली मैं उससे। और मैंने उससे आज सुबह फोन पर सिर्फ़ एक लाइन कही — गुमटी पर आ जा, तेरा नाम किताब में है।"
कमरे में सन्नाटा।
पापा ने पूछा, "तुमने उसे बुला लिया?"
"मैंने उसे नहीं बुलाया, पापा," शबनम आपा ने कहा, और उनकी आवाज़ में पहली बार कुछ ऐसा था जो मैंने उनमें कभी नहीं देखा, "किताब ने बुलाया।"
फिर वो मेरी तरफ़ मुड़ीं। "अंकुश, मैं साफ़ कहती हूँ। मैं चाय के पैसे का हिसाब रखती हूँ, जानती हूँ कौन कितना उधार है, और कब लौटाएगा। पर उस किताब में मेरे नाम के आगे जो लिखा है, वो पैसा नहीं है। वो मेरी बहन है। और मुझे याद नहीं कि मैंने उससे क्या लिया था जो अब तक बाक़ी है।"
मैंने उस्ताद की तरफ़ देखा। उन्होंने सिर हिलाया — बहुत हल्का, जैसे कह रहे हों, अब ये रास्ता तुम्हें खुद चलना है।
तभी दरवाज़े पर आवाज़ आई।
न कोई दस्तक। न कोई खाँसी। सिर्फ़ कुछ जो अचानक वहाँ खड़ा हो गया।
मैंने मुड़कर देखा, और मेरे हाथ से चाय की कटोरी फिसल गई। मैंने उसे बड़ी मुश्किल से पकड़ा।
बबलू था।
पर ये वो बबलू नहीं था जिसे गली जानती थी।
गले में सोने की चेन नहीं थी। कमर पर पानदान नहीं था। हाथ में सोने की अंगूठी नहीं थी। उसने पुरानी सफ़ेद कमीज़ पहनी थी, जिसके कॉलर के कोने घिसे हुए थे, और हाथ में मोटा स्टील का गिलास था जिसमें चाय थी और उसमें से भाप उठ रही थी।
वो वहाँ खड़ा रहा। कुछ देर किसी ने कुछ नहीं कहा।
फिर पापा बोले, "अंदर आ जाओ।"
बबलू अंदर आया। उसने कमरे में देखा — माँ को, चारपाई को, संदूक को, पूर्णिमा को।
और जब उसने पूर्णिमा को देखा, तो उसने अपने गिलास को दोनों हाथों से पकड़ लिया।
"आप…" उसने धीरे से कहा, और शब्द उसके गले में अटक गए।
"तुम मुझे जानते हो?" पूर्णिमा ने पूछा। उनकी आवाज़ पहली बार कमरे में गूँजी, और वो आवाज़ अजीब तरह से जानी-पहचानी थी। जैसे माँ की आवाज़ का कोई पुराना संस्करण।
बबलू ने पीछे हटने की कोशिश की, पर दीवार थी। "मैं… मैंने आपको बचपन में देखा था। एक बार। रणवीर साहब के दफ़्तर की पुरानी तस्वीर में।"
"तस्वीर में?" मैंने पूछा।
बबलू ने मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखें वैसी नहीं थीं जैसी गुमटी पर होती थीं। डरी हुई थीं, पर साफ़।
"अंकुश भाई," उसने कहा, "मैं आज सुबह से तीन बार सोच चुका हूँ कि यहाँ आऊँ या नहीं। और तीनों बार मैंने जूता पहन लिया, और तीनों बार उतार दिया।"
"तो अब क्या बदला?" मैंने पूछा।
"आपका नाम," उसने कहा, "आपने शटर पर कोयले से अपना नाम लिखा है। आज सुबह।"
मैंने कुछ नहीं कहा।
"मैं सालों से साहब के लिए काम कर रहा हूँ," बबलू ने कहा, "पर ये बात मैंने आज पहली बार सोची — साहब के नाम के नीचे कभी मेरा नाम नहीं लिखा गया। और आपने अपने नाम के नीचे सबका नाम लिखना शुरू किया। अब बताओ, मैं किसके साथ हूँ?"
कमरे में चुप्पी छा गई।
फिर उस्ताद बोले, "पहले बैठो।"
बबलू ने स्टूल खींचा, पर नहीं बैठा। वो खड़ा रहा, चाय का गिलास पकड़े, और एक पल के लिए उसने पूरी कमरे की तरफ़ देखा, जैसे अपनी जगह तय कर रहा हो।
मैंने कहा, "तुम यहाँ क्यों आए हो, बबलू भाई?"
"क्योंकि मेरे पास एक खबर है," उसने कहा, "और मैं उसे अकेले नहीं रख सकता। मैं उसे लेकर सो नहीं सकता।"
"क्या खबर?"
बबलू ने चाय का घूँट भरा। फिर गिलास उतारा और मेज़ पर रखा।
"साहब की गाड़ी में एक सफ़ेद फाइल है," उसने कहा, "जो कभी घर नहीं जाती। रोज़ सुबह आती है, रोज़ शाम गाड़ी में ही रहती है, और रात में ड्राइवर उसे तिजोरी में रखता है।"
"फाइल में क्या है?" मीरा ने पूछा। उसके हाथ में कॉपी फिर आ गई थी।
"मैं नहीं जानता," बबलू ने कहा, "मैंने उसे खोला नहीं। पर एक बार सुबह, जब ड्राइवर गाड़ी धो रहा था, मैं पास से गुज़रा और फाइल पिछली सीट पर पड़ी थी। बंद थी। पर ऊपर की तरफ़ जो काग़ज़ दिख रहा था, उस पर कुछ लिखा था।"
"क्या लिखा था?" मैंने पूछा।
बबलू ने मेरी आँखों में देखा। उसका गला सूख रहा था, मैं देख सकता था।
"उस सफ़ेद फाइल पर," उसने कहा, धीरे-धीरे, हर शब्द वज़न करके, "नीली स्याही से सिर्फ़ दो अक्षर लिखे हैं।"
वो रुका।
"क्या?" मैंने पूछा।
बबलू ने एक गहरी साँस भरी। फिर बोला, "याद।"
मुझे लगा कमरे का तापमान गिर गया।
क्योंकि ये वो शब्द था जो रात में ताले से आया था। वो शब्द जो रणवीर ने कहा था — "तेरी सबसे प्यारी याद अब भी मेरे पास बंद है।"
मीरा ने कॉपी खोली और लिखने लगी।
"अब सुनो," बबलू ने कहा, और उसकी आवाज़ में अब कुछ और था — कुछ ऐसा जो पहले उसकी आवाज़ में नहीं था, "सिर्फ़ दो अक्षर। नाम नहीं। कोई पूरा शब्द नहीं। फाइल पर सिर्फ़ यही लिखा था।"
"पर फाइल के अंदर क्या है," पापा ने कहा, "ये तुम नहीं जानते?"
"मैं नहीं जानता," बबलू ने कहा, "पर एक बात जानता हूँ।"
"क्या?"
"उस फाइल को साहब ने कभी किसी के हाथ में नहीं दिया। कोई उसे बाहर नहीं देख सकता।" उसने रुककर कहा, "जिस दिन मैंने उसका नाम लिया था, अगले दिन मेरी तनख्वाह से दो हज़ार कट गए थे, और साहब ने मुझसे कहा था — बबलू, कुछ चीज़ें ऐसी होती हैं जिनका नाम नहीं लिया जाता।"
मैंने घंटी जेब से नहीं निकाली। उस्ताद के शब्द याद आ रहे थे — घंटी तब बोलेगी जब कोई बिना डर के बोलेगा।
मैंने शबनम आपा की तरफ़ देखा। वो अब भी खड़ी थीं, और उनकी आँखें भारी थीं। मैंने उनसे पूछा, "आपा, आपने कहा था कि आपको कुछ कहना है।"
उन्होंने सिर हिलाया। "हाँ। और वो बात मैं यहाँ इसलिए कह रही हूँ क्योंकि कल से मैंने अपना नाम तीन बार सुना है, और तीनों बार वो मुझे बुला रहा था।"
"कौन?" मीरा ने पूछा।
"किताब," शबनम आपा ने कहा, "बात अजीब लगेगी तुम्हें। पर जब से ये किताब बाहर आई है, मुझे लगता है जैसे किसी ने मेरे नाम को जगा दिया है। और मुझे याद नहीं कि मैंने किससे क्या लिया था जो बाक़ी रह गया।"
उन्होंने रज़िया का नाम लिया। फिर कहा, "मेरी बहन का नाम आज किताब में था। मैंने सुबह उसे फोन पर सिर्फ़ एक लाइन कही थी। पर मुझे उम्मीद नहीं थी कि वो सच में आएगी।"
फिर उन्होंने पूछा, जैसे किसी ने उनसे पूछा हो, "उस्ताद, क्या किताब में सच में लोगों के नाम अपने आप आ जाते हैं?"
उस्ताद ने कहा, "नाम अपने आप नहीं आते। नाम हैं, वो पहले से हैं। बस उन्हें पढ़ने वाला नहीं था। किताब खुली तो नाम जाग गए। जैसे —" उन्होंने रुककर कहा, "जैसे किसी पुराने घर का कमरा खोलो और उसमें रखे बर्तनों से खुशबू आने लगे। अंदर सब पहले से था।"
शबनम आपा ने स्टूल खींचा और बैठ गईं। उन्होंने चाय का एक घूँट लिया, और मुझे लगा उन्होंने एक बोझ उतारा है।
तभी बबलू ने कहा, "एक और बात है।"
"और?" मैंने कहा।
"साहब ने आज सुबह बुलाकर कहा कि शाम सात बजे मैदान पर जो होगा, उसमें मेरा नाम नहीं होना चाहिए। मुझे दूर रहना है।" उसने मेज़ पर रखा गिलास आगे सरका दिया, जैसे कुछ छोड़ रहा हो। "पर मैं आ गया। अब तुम बताओ, मैं क्या करूँ?"
मैंने कुछ नहीं कहा। मैंने उसकी तरफ़ देखा। मैंने उसकी पुरानी सफ़ेद कमीज़ देखी, कॉलर के घिसे कोने, हाथ की कटी नाखून, उसकी आँखों में वो लड़खड़ाती चमक।
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