The Mysterious Bell – Chapter 1234
उन्होंने कटोरियाँ बाँटनी शुरू कीं। पहले माँ को, जो चारपाई पर आधी बैठी थीं और आधी लेटी। फिर पापा को, जो अब भी संदूक के ढक्कन का सहारा लिए खड़े थे, जैसे अगर हाथ हटाया तो सब बिखर जाएगा। फिर उस औरत को, और जब कटोरी उस औरत के हाथ में गई, तो शबनम आपा की आवाज़ थोड़ी धीमी हो गई।
"पूर्णिमा दीदी," उन्होंने कहा, "गरम है। धीरे पीजिए।"
उस औरत ने कटोरी दोनों हाथों से पकड़ी। उसके हाथ काँप रहे थे, पर चाय एक बूँद ज़मीन पर नहीं गिरी। जैसे उम्र भर का अभ्यास हो, चीज़ें संभालने का।
मैंने देखा कि माँ चारपाई पर उठकर बैठ गई थीं। उनकी आँखों में बुखार था, पर उससे बड़ा कुछ और था। वो कुछ जो मैंने उनकी आँखों में पहले कभी नहीं देखा था।
वो अपनी सास को देख रही थीं।
बाईस साल बाद।
किसी ने कुछ नहीं कहा। क्योंकि ऐसी चुप्पी में बोलना अपराध लगता है। जैसे कोई सालों पुरानी तस्वीर अचानक साँस लेने लगे और तुम उसे छूने से डरो।
मीरा ने अपना कैमरा नीचे रख दिया। मैंने देखा। उसने बिना कहे, बिना किसी के कहने पर, कैमरा बंद कर दिया। यही बात मुझे उसके बारे में सबसे ज़्यादा पसंद थी — उसे पता था कि कब रुकना है।
टिंकू दरवाज़े पर खड़ा था। उसके हाथ में आधा समोसा था जो उसने शायद गुमटी से उठाया था, और वो अब तक काटा नहीं गया था।
"अंकुश भैया," उसने फुसफुसाकर कहा, "मैं बाहर खड़ा हूँ।"
"रुक," मैंने कहा, "तू अंदर है।"
वो अंदर आया। दरवाज़े के पास ही बैठ गया, घुटनों को छाती से लगाकर।
शबनम आपा ने अपना कटोरा नहीं लिया। वो खड़ी रहीं, थाली को दोनों हाथों से सहारा देती हुईं, जैसे कुछ कहने से पहले तय कर रही हों कि क्या कहें और कितना।
"उस्ताद को बुलाओ," उन्होंने कहा।
"क्यों?" मैंने पूछा।
"क्योंकि ये किताब उनकी है," शबनम आपा ने कहा, और उनका इशारा मेरे हाथ में पड़ी काली जिल्द वाली बही की तरफ़ था, "और जो हिसाब किसी का हो, उसे उसके बिना नहीं पढ़ना चाहिए।"
मैंने पापा की तरफ़ देखा। पापा ने सिर हिलाया।
"जाओ," उन्होंने कहा, "बुला लाओ।"
मैंने टिंकू की तरफ़ देखा। वो उठने ही वाला था कि शबनम आपा बोलीं, "मैं जाती हूँ। तुम बैठो। आज तुम्हारी जगह यहीं है।"
वो बाहर गईं। मैंने सुना — चप्पल की आवाज़ आँगन से उतरती है, फिर दुकान की तरफ़ मुड़ती है।
कमरे में तब तक सिर्फ़ तीन आवाज़ें रहीं — माँ की साँस, चाय की कटोरी, और दीवार पर टँगी उस घड़ी की जो पिछली रात से अपने वक़्त पर चल रही थी।
मैंने बही को दोनों हाथों से पकड़ा।
इसका वज़न अजीब था। काग़ज़ का वज़न नहीं था इसमें। जैसे जिसने इसे लिखा, उसने हर लाइन के साथ अपना कुछ रख दिया हो।
मैंने उसे फिर खोला। पहला पन्ना।
ऊपर कोने में एक तारीख़ थी — पीली स्याही में, बहुत छोटी। मैंने उसे पढ़ा, पर समझ नहीं पाया। नीचे सिर्फ़ एक लाइन थी।
"यहां जो नाम लिखता है, वो अपना हिसाब खुद लिखता है।"
फिर बीच में—
"नाम। दिया। लिया। गवाह।"
मैंने पन्ना पलटा। दूसरा पन्ना। तीसरा। चौथा।
हर पन्ने पर लाइनें थीं। कुछ पुरानी, कुछ पुरानी से भी पुरानी। किसी पर नीली स्याही, किसी पर काली, किसी पर सिर्फ़ उँगली की लकीर जैसा धुँधला निशान।
और हर लाइन पर दो नाम। दोनों के बीच में एक शब्द — "भरोसा" या "उधार" या "हिसाब बाक़ी"।
"ये क्या है, पापा?" मैंने पूछा।
पापा ने देखा, पर उन्होंने जवाब नहीं दिया। जवाब देने जैसे वो अब भी खुद को तैयार नहीं कर पा रहे थे।
दरवाज़े पर आहट आई। चप्पल, और उसके साथ एक हल्की खट-खट भी, जो किसी लाठी या पैर के किसी टेढ़े रखे जाने से आती है।
और उस्ताद अली बक्श अंदर आए।
आज उन्होंने वो मोटा चश्मा नहीं पहना था जो हमेशा उनके कान पर सरकता रहता था। उसकी जगह उन्होंने सफ़ेद कपड़े में लिपटा एक पुराना, छोटा चश्मा रखा था।
उनके हाथ में एक लकड़ी की स्टूल थी, दुकान की वही जिस पर वो बैठकर सिलाई करते थे।
उन्होंने वो स्टूल मेज़ के पास रखी और मेरी तरफ़ हाथ बढ़ाया।
मैंने बही उनके हाथों में दे दी।
और वो बैठ गए।
उन्होंने बही खोली। पहला पन्ना पलटा। दूसरा। तीसरा। और फिर जब उनकी उँगली किसी पन्ने पर रुकी, तो मुझे लगा कि कमरे की हवा भारी हो गई है।
उन्होंने पन्ना नहीं पलटा। काफ़ी देर तक उसे देखते रहे, और उनकी उँगली उस लाइन पर टिकी रही।
फिर उन्होंने धीरे से, ऐसे जैसे कोई पुरानी नींद से बोल रहा हो, पढ़ा—
"पूर्णिमा — नाम। दिया — हिसाब। लिया — माँ की बीमारी पर आठ रुपये। गवाह — कोई नहीं।"
कमरा सुन्न हो गया।
उनके चेहरे पर जो पहले कभी नहीं था, अब था। टूटन। सिलाई की मशीन का वो छोटा टुकड़ा जो कभी नहीं टूटता था, वो टूट रहा था।
"उस्ताद," मैंने कहा, "ये क्या है?"
उन्होंने पन्ना बंद कर दिया। बही मेज़ पर रखी और दोनों हाथों को अपने घुटनों पर रख लिया। फिर बोले, बहुत धीरे—
"ये हिसाब की किताब नहीं है, अंकुश।"
मैंने पूछा, "तो क्या है?"
"ये जोड़ों की किताब है," उन्होंने कहा, "इसमें लोग अपना नाम लिखवाते थे और लिखवाते थे कि उन्होंने किससे क्या लिया और किसे क्या दिया। कोई पैसा, कोई चीज़, कोई बात। और जो गवाह बनता था, वो अपना हाथ नीचे रखता था — ये उसका गवाह हाथ कहलाता था।"
"गवाह हाथ?"
"हाँ। जिसने गवाही दी, उसका हाथ। जब संदेह होता था, तो लोग उसी हाथ को अपने सिर पर रखकर कहते थे — मैं झूठ बोलूँ तो यही हाथ मेरे काम आए।" उन्होंने रुककर देखा। "गली के लोग इसे जोड़ कहते थे। चीज़ें जोड़ना नहीं — लोगों को।"
मैंने बही की तरफ़ देखा। अब मुझे इसका वज़न समझ आ रहा था।
"तो ये…" मैंने धीरे से कहा, "ये वो जोड़ तंत्र है?"
उस्ताद ने सिर नहीं हिलाया, न मना किया। उन्होंने कहा, "ये उसका काग़ज़ी चेहरा है। तंत्र तो उसके पीछे था। किताब वो जगह थी जहाँ लोगों के भरोसे लिखे जाते थे, ताकि ज़ुबानी बात किसी न किसी रोज़ झूठी न हो जाए।"
मीरा ने आगे झुककर कहा, "उस्ताद, अगर ये सच है, तो ये किताब हमारे पास रहनी चाहिए।"
उस्ताद ने उसकी तरफ़ देखा। "रहेगी," उन्होंने कहा, "पर ये तब तक अधूरी है, जब तक घंटी अपना सच न बोले।"
"क्यों?" मीरा ने पूछा।
"क्योंकि इस किताब के आख़िरी पन्ने पर एक जगह खाली है," उस्ताद ने कहा, "वो जगह उसके लिए है जिसने सबसे पहला नाम लिखा था। जिसने अपना हिसाब घंटी से बाँधा था। जब तक घंटी खुद नहीं कहती कि वो किसकी है, ये किताब अधूरी रहेगी — और जो किताब अधूरी हो, उसके हिसाब से कोई सच नहीं उतरता।"
"और घंटी कब बोलेगी?" मैंने पूछा।
"जब कोई उसके सामने बिना डर बोलेगा," उस्ताद ने कहा।
मैंने अपनी जेब में झाँका। घंटी वहीं थी, कपड़े में लिपटी, आज सुबह से चुप। पर जैसे ही उस्ताद ने ये शब्द कहे, मुझे लगा कपड़े के नीचे पीतल हल्का-सा हिला।
फिर शबनम आपा बोलीं।
"मेरी बात सुनो," उन्होंने कहा, और उनकी आवाज़ पहले जैसी तेज़ नहीं थी। थकी थी, पर साफ़।
सबने उनकी तरफ़ देखा।
"मुझे कल से इस किताब में अपना नाम दिख रहा है," उन्होंने कहा।
माँ ने चारपाई से कहा, "कहाँ?"
"तीन जगह," शबनम आपा ने कहा, "तीन जगह मेरा नाम है इस किताब में। और तीनों जगह मेरे नाम के आगे एक ही शब्द लिखा है। लौटाना।"
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