The Mysterious Bell – Chapter 1233
"उस्ताद," मैंने कहा, "अंदर आइए।"
वो आए। धीरे-धीरे। उन्होंने बबलू को देखा, फिर बही को देखा, फिर बबलू को देखा।
और फिर उन्होंने कुछ नहीं कहा।
वो मेज़ के पास गए। कुर्सी पर बैठे। बही अपनी तरफ़ खींची।
और फिर — बहुत देर तक — कुछ नहीं बोले।
मैंने काजल की तरफ़ देखा। काजल ने मुझे देखा। पापा ने सिर झुकाया। मीरा ने अपनी कॉपी बंद कर दी, जैसे यह वक़्त लिखने का नहीं, देखने का है। बबलू ने चाय का गिलास दोनों हाथों में पकड़ लिया और साँस रोक ली।
उस्ताद का हाथ बही के पन्नों पर चलने लगा। धीरे। जैसे कोई अंधा आदमी उँगलियों से अक्षर पढ़ता है। कभी वो एक पन्ने पर रुकते, कभी दूसरे पर। कभी होंठ हिलते, कभी नहीं। उनके चेहरे पर कोई भाव नहीं था, पर उनके हाथ की उँगली एक जगह से दूसरी जगह ऐसे जाती थी जैसे कोई रास्ता ढूँढ रही हो — पुराना रास्ता, जो उसे पचास साल पहले पता था।
और फिर उनकी उँगली एक पन्ने पर ठहर गई।
मैंने देखा। उस पन्ने पर नामों की जोड़ियाँ लिखी थीं — दो-दो नाम, बीच में एक लकीर। किसी के बीच में 'दिया', किसी के बीच में 'लिया', किसी के बीच में सिर्फ़ 'बाक़ी'। नीचे की तरफ़ हर जोड़ी के आगे छोटी लकीरें थीं, जैसे किसी ने गिनती की हो।
"उस्ताद?" मैंने धीरे से कहा।
वो नहीं बोले।
उनकी उँगली उस पन्ने से हटी नहीं। बल्कि और गहरी दबी। जैसे वो उसे मिटाना चाहते हों, या उसे अपने हाथ में बंद कर लेना चाहते हों, या उस पन्ने को सीने से लगा लेना चाहते हों।
मैंने उनका चेहरा देखा।
और मुझे पहली बार उस्ताद अली बक्श का चेहरा टूटता दिखा।
ये वो चेहरा नहीं था जो मुझे रोज़ दुकान पर मिलता था — जिसके कान पर पेंसिल होती थी और जिसके होंठों पर सदा एक जैसा सूखा संतुलन होता था, जो छोटी सी बात पर भी कहे — "अरे, चार टाँके बाक़ी हैं, सब्र कर।" ये कोई और आदमी था। बूढ़ा। थका। अकेला। जिसकी आँखों के कोनों से एक पतली लकीर उतर रही थी, जो आँसू नहीं थी, पर आँसू से कम भी नहीं थी। और उसके होंठ काँप रहे थे।
मैंने कभी उस्ताद को काँपते नहीं देखा था। मैंने उन्हें पचास साल की मशीन की सुई बदलते देखा था — एक बार में, बिना देखे। मैंने उन्हें उस दिन देखा था जब गली की हवा में कोई भी बात नहीं थी पर वो चुप बैठे रहे। पर ऐसा नहीं।
"उस्ताद," मैंने फिर कहा, "बताइए। क्या लिखा है?"
उन्होंने साँस खींची। एक लंबी साँस, जैसे पचास साल की थकान उसी में बाहर निकल गई हो।
"ये हिसाब की किताब नहीं है, बेटा।"
"तो?"
"ये जोड़ों की किताब है।"
उन्होंने उँगली उस पन्ने पर घुमाई।
"इसमें लोग अपना नाम लिखवाते थे," उन्होंने कहा, "और साथ में ये भी लिखवाते थे कि किससे क्या लिया और किसे क्या दिया। कोई सिक्का, कोई ब्याज, कोई ज़मीन, कोई बेटी का दान, कोई दुकान की मज़दूरी — सब यहाँ है। पर सबसे नीचे सबसे अलग लकीर वाली चीज़ ये है।" उन्होंने पन्ने की तलाश की, फिर पिछली तरफ़ का एक पन्ना पलटा, "ये। ये जोड़ों का हिसाब है। यहाँ सिर्फ़ दो नाम हैं और बीच में सिर्फ़ एक शब्द — 'भरोसा', 'माफ़ी', 'साथ'। ये वो नाम हैं जो मिस्त्री की दुकान से बंधे।"
मैंने पन्ने पर झुककर देखा। नाम पढ़े।
शबनम — रज़िया।
बंसी — निसार।
हाशिम — हरनाम।
मक़बूल — रामस्वरूप।
नूर मोहम्मद — रामकिशन।
क़ादिर — बद्री।
और फिर मेरी नज़र एक जोड़ी पर रुकी और मैं पीछे हट गया।
जगदीश — शंकर।
मैं रुक गया।
"उस्ताद — बाबा जगदीश? और पापा?"
उस्ताद ने सिर हिलाया।
"यही तो मैं कह रहा हूँ, बेटा।"
"पर ये क्या है? इनके बीच में क्या लिखा है?"
उस्ताद ने उँगली उस लकीर के ऊपर रखी।
"बाक़ी।" उन्होंने एक पल रुककर कहा, "सिर्फ़ बाक़ी। बाप ने बेटे से उधार लिया और लौटाया नहीं।"
पापा ने मुँह फेरा।
मैंने देखा — पापा का मुँह फिर गया, और उनके होंठ कुछ बोलना चाहते थे, पर बोल नहीं पाए। उन्होंने अपनी हथेली चारपाई पर रखी और उसे देखते रहे, जैसे उसमें कोई हिसाब लिखा हो।
मैंने उस्ताद की तरफ़ देखा। उनकी उँगली जगह से खिसकी और एक और जोड़ी पर रुकी।
मैंने पढ़ा।
अली बक्श — इलियास बक्श।
और बीच में एक लकीर के नीचे, नीली स्याही में — "भाई, तेरा हिसाब मेरे मन में है। कल आना।"
उस्ताद का हाथ काँप रहा था। वो मेज़ पर टिक गए।
"ये लकीर मेरी है," उनकी आवाज़ टूट रही थी, "मैंने खींची थी। मैंने अपनी तरफ़ से सब लिखवा दिया — क्या लिया, क्या दिया, क्या बाक़ी। पर नीचे वाली लाइन इलियास की है। ये उसने लिखी। ये उसकी लिखावट है — देखो, 'क' की गर्दन ऐसे मुड़ती है। ये उसने लिखी।" उन्होंने एक उँगली उस लाइन पर रखी, जैसे उसे चूम रहे हों। "और मैं उसे पचास साल से मरा हुआ मान रहा था।"
मैंने कुछ कहना चाहा, पर मेरी आवाज़ नहीं निकली।
काजल ने मेरा हाथ पकड़ा। उसका हाथ भी काँप रहा था।
उस्ताद ने पन्ना खिसकाया, फिर उँगली नीचे की तरफ़ ले गए, जहाँ और भी नाम थे। उन्होंने अपने हाथों को बही के ऊपर रखा और सीधे मेरी तरफ़ देखकर कहा:
"ये किताब मेरी माँ की थी। उनके हाथ से लिखी गई थी। ये उन्होंने मुझे तब दी थी जब मैं चौदह साल का था। और कहा था — बेटा, जब तक तू इस किताब में अपना हिसाब नहीं लिखवा ले, तू बड़ा नहीं होगा। और मैंने लिखवाया। पचास साल पहले। और उस दिन से ये किताब छिपी है।"
"कहाँ?" मीरा ने पूछा, "कहाँ छिपी थी?"
उस्ताद ने धीरे से कहा, "दीवार के अंदर। जैसे कोई अपनी ही धड़कन को दीवार में चुन देता है। मेरी माँ ने इसे चूने और ईंट के बीच रखवाया था, और कहा — जिस दिन तुम्हारा बेटा अपना नाम लिखवाएगा, उस दिन ये खुलेगी।"
"तो फिर ये आपके पास कैसे आई?" मैंने पूछा।
"पचास साल बाद, उस घर को गिराया जा रहा था," उन्होंने कहा, "मेरी माँ का घर। उनके जाने के बाद कोई नहीं रहा। मिस्त्री की दुकान भी मेरे भाई के साथ जल गई थी, ये खंडहर रह गया था। मैंने उस रात खुद ईंटें उठाईं और ये निकाली।" उन्होंने एक पल रुका, फिर बोले, "और उसी दिन मुझे पता चला कि मेरी माँ ने अपने हिसाब के आख़िरी पन्ने पर मेरा नाम नहीं लिखा — नाम की जगह खाली छोड़ दी।"
"क्यों?"
"क्योंकि उन्हें उम्मीद थी कि मैं अपने हाथ से लिखूँगा।"
मीरा ने अपनी कॉपी उठाई। "तो उस्ताद, अगर ये सच है, तो ये किताब हमारे पास रहनी चाहिए।"
उस्ताद ने सिर हिलाया। "रहेगी।"
फिर उन्होंने एक पल रुककर कहा, "पर ये किताब तब तक अधूरी है, जब तक घंटी खुद न बोले।"
मैंने उनकी तरफ़ देखा। "क्या मतलब?"
"इस किताब के आख़िरी पन्ने पर एक जगह खाली है," उन्होंने कहा, "वो जगह उस नाम के लिए है जिसने इस हिसाब को सबसे पहले शुरू किया था — जिसने अपना नाम लिखा और कहा — मेरा हिसाब घंटी से है। जब तक घंटी अपना सच नहीं बोलेगी, बही पूरी नहीं होगी।"
"और घंटी कब बोलेगी?"
"तब," उस्ताद ने कहा, "जब कोई उसके सामने बिना डर के बोलेगा।"
कमरे में चुप्पी छा गई।
और तभी, दरवाज़े से शबनम आपा की आवाज़ आई।
"चाय लेकर आई हूँ," वो बोलीं, "और मुझे कुछ कहना है।"
वो अंदर आईं। पीतल की थाली में कटोरियाँ थीं, चाय से भरी हुईं। बादाम और इलायची की खुशबू वातावरण में फैल गई। उनके लाल बॉर्डर वाला घिसा रुमाल कंधे पर पशबनम आपा ने थाली मेज़ पर रखी और उसी अंदाज़ में कहा, "पहले चाय। बात बाद में।"
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