The Mysterious Bell – Chapter 1232
मैंने पापा की तरफ़ देखा। शंकर नाम सुनकर उनका सिर उठा, फिर वो फिर झुक गए।
"यह बही," मैंने कहा, "यह बही मेरे दादा की है?"
"हाँ," उस्ताद ने कहा।
"तो इसमें मेरा नाम क्यों नहीं है?"
उन्होंने मेरी तरफ़ देखा। बहुत देर तक।
"क्योंकि तेरा जोड़ा अभी लिखा ही नहीं गया, बेटा," उन्होंने कहा। "और जिस दिन लिखा जाएगा, उस दिन यह बही अपने आप बंद हो जाएगी। ऐसा मैंने एक बार सुना था, जगदीश जी के मुँह से।"
"और मेरे जोड़े के आगे क्या लिखा जाएगा?"
"यह तू तय करेगा," उस्ताद ने कहा। "बराबर, बाक़ी, या भूल गया।"
मैंने घंटी को जेब में रखा। वो अब भी गरम थी।
तभी शबनम आपा ने रूमाल निकाला और आँखें पोंछीं, पर उनकी आवाज़ सख़्त थी।
"मैं आज दोपहर उससे बात करूँगी," उन्होंने कहा। "और मैं उससे कुछ नहीं छिपाऊँगी। न कटोरी, न पंद्रह साल, न वो दिन।"
"और अगर वो न सुने?" काजल ने पूछा।
"तो मैं सुनाऊँगी," शबनम आपा ने कहा। "सुनने वाला कोई न कोई रह जाता है। कम से कम अपनी गुमटी की कटोरी तो सुन लेती है।"
काजल हँसी। हल्की सी। और उस हँसी से कमरे की हवा थोड़ी सी हल्की हुई।
दादी उठीं और संदूक के पास से अपना सूटकेस खींचा। मैंने आगे बढ़कर उनका हाथ पकड़ा, पर उन्होंने सिर हिलाकर मना कर दिया।
"मैं अभी नहीं जा रही," उन्होंने कहा। "मैं बाहर बैठूँगी। इसी गली में। जब बही खुलेगी, तब मैं सामने रहूँगी, यह मेरा हिसाब है, मेरा तो सीधा नाम है इसमें।"
वो सूटकेस खींचकर बाहर चलीं। दरवाज़े पर पहुँचकर रुकीं और मेरी तरफ़ मुड़ीं।
"अंकुश," उन्होंने कहा, "तेरे पापा को पहले मैंने सिखाया था कि डर के आगे चुप रहना पड़ता है। आज मैं उन्हें सिखाऊँगी कि डर के आगे खड़े होना पड़ता है। मुझे भी वही सीखना है, बेटा। बूढ़ी औरत हूँ, सीखने में वक़्त लगता है।"
वो बाहर निकल गईं। सूरज की रोशनी दरवाज़े से अंदर आई और संदूक के खुले ढक्कन पर पड़ी।
मैंने बही उठाई, उसे कपड़े में लपेटा, और ट्रंक के अंदर रखने लगा। उस्ताद ने मेरा हाथ रोका।
"नहीं," उन्होंने कहा। "इसे खुले में रख। आज से यह बही ट्रंक की नहीं है। यह दुकान की मेज़ की है।"
मैंने बही मेज़ पर रख दी। मेज़ की टाँग हिली, और उस्ताद ने बिना देखे ही अपनी चप्पल से उसके नीचे काग़ज़ का एक टुकड़ा ठेल दिया।
"इस मेज़ की टाँग भी बही जैसी है," उन्होंने कहा। "चलती रहती है, पर गिरती नहीं।"
अब हम चार थे कमरे में। मैं, पापा, काजल और उस्ताद। मीरा दरवाज़े के पास खड़ी थी, कैमरा बंद, कॉपी खुली।
और तभी दरवाज़े पर एक परछाई पड़ी।
मैंने सिर उठाया।
दरवाज़े पर बबलू पांडे खड़ा था।
पहले मैंने उसे पहचाना नहीं। सच कहूँ, तो उस आदमी को मैंने पहली बार इस तरह देखा था। गले में वो मोटी सोने की चेन नहीं थी। पानदान नहीं था। उसकी उँगलियों में वो पीली काग़ज़ की थैली नहीं थी। उसने कमीज़ के बटन पूरे बउसने कमीज़ के बटन पूरे बंद कर रखे थे, जैसे कोई बुखार में काँपता आदमी अपने कपड़ों को समेट लेता है, जैसे कपड़े ढीले छोड़ देने से ठंड अंदर आ जाएगी।
और उसके हाथ में एक गिलास था। मोटा स्टील का गिलास, जिसमें चाय थी। भाप ऊपर उठ रही थी, और वो भाप उसके चश्मे पर जमकर बूँदें बना रही थी, पर वो चश्मा पोंछने की ज़हमत नहीं कर रहा था।
मैंने उसे देखा और मेरी ज़ुबान अपने आप रुक गई।
ये वही आदमी था जिसने कुछ ही हफ़्ते पहले मेरा गला पकड़ा था। जिसकी सोने की चेन चलते वक़्त खनकती थी और गली के मुँह तक सुनाई देती थी। जो चूड़ियों की गुमटी उलट देता था और पान चबाते हुए बोलता था कि बड़े साहब की नज़र मेरी दुकान की जगह पर है। जिसने मेरी दुकान के शटर को देखकर कहा था — ये जगह बिकने वाली है, बेटा, तू पहले से हिसाब कर ले।
आज वो आदमी दरवाज़े पर खड़ा था, और उसके गले में कुछ नहीं था।
खाली गला। खाली उँगलियाँ। और हाथ में सिर्फ़ चाय का गिलास।
"बबलू भाई," मैंने कहा, "अंदर आइए।"
वो अंदर आया। धीरे। जैसे ये उसकी दुकान हो और मैं मेहमान हूँ, या जैसे वो इस कमरे में कुछ तोड़ने के डर से आया हो। उसने चारों तरफ़ देखा, एक-एक चीज़ पर नज़र टिकाई। खुले संदूक पर। काली जिल्द वाली बही पर। ट्रंक से निकले हथौड़े और रेती पर। काजल पर। पापा पर।
और सबसे ज़्यादा देर तक वो पापा को देखता रहा।
"शंकर भाई," उसने कहा, आवाज़ इतनी धीमी कि मैंने अंदाज़ा लगाया होगा शायद वो सपने में बोल रहा है, "मैं आपके सामने बैठ सकता हूँ?"
पापा ने सिर हिलाया।
बबलू बैठ गया। उसके घुटने चारपाई की तरफ़ थे, पर वो मेज़ की तरफ़ देख रहा था। उसकी आँखें लाल थीं। सुबह से नहीं, शायद सालों से। नींद की कमी का लाल, और उसमें कुछ और भी — कुछ ऐसा जो किसी का नहीं होता, जो अपना होता है।
बही मेज़ पर खुली थी।
उसकी नज़र उस पर पड़ी तो उसके हाथ से चाय का गिलास काँपा। एक बूँद मेज़ पर गिरी और उसने उसे हथेली से पोंछ दिया, बहुत ध्यान से, जैसे अपनी ही गलती साफ़ कर रहा हो।
"ये…" उसने कहा, "ये वही है?"
"हाँ," मैंने कहा।
"जो साहब के दफ़्तार में थी?"
"वही है।"
उसने चाय का एक घूँट भरा। फिर गिलास नीचे रखा — धीरे, बहुत सँभालकर, जैसे गिरा देने का डर हो।
"अंकुश," उसने कहा, "मैं तुमसे कुछ माँगना चाहता हूँ।"
"माँगिए।"
"इस बही में मेरा नाम है।"
मैंने देखा। मैंने पन्ना पलटा। नाम बहुत थे। घिसे, मिटते, कुछ पर काली स्याही फैल गई थी, कुछ पर नीली स्याही उभरी हुई थी, जैसे अभी लिखी गई हो। कुछ नामों के आगे रकमें थीं। कुछ के आगे सिर्फ़ लकीरें थीं। कुछ के आगे सिर्फ़ निशान — वो निशान जो मैंने चूल्हे के पीछे वाले दरवाज़े पर देखा था, बिजलीघर के बक्से पर देखा था, उस्ताद की घंटी के छल्ले पर देखा था।
दो लकीरें, और बीच में बिंदु।
पर मुझे बबलू का नाम नहीं दिखा।
"कहाँ है?" मैंने पूछा।
वो उठा, मेरे पास आया, और उसने उँगली रखी — सीधे एक कोने पर, जहाँ सिर्फ़ एक आधा अक्षर बचा था और उसके नीचे एक लकीर। ऊपर की स्याही मिट चुकी थी, बस नीचे का हिस्सा काग़ज़ के रेशों में उतर गया था।
"ये मेरा है," उसने कहा, "या मेरे बाप का है। पक्का नहीं पता। पर ये हमारा है। यहाँ जो लिखा है, वो मेरे घर में बोला जाता था — 'बंसतलाल का हिसाब।' मेरे बाप का नाम बंसतलाल पांडे था।"
मैं एक सेकंड के लिए रुका।
बंसतलाल।
यह नाम मैंने कभी नहीं सुना था। गली में किसी ने नहीं बोला। मेरे पापा ने नहीं बोला। उस्ताद ने नहीं बोला। और अब यह एक ऐसी बही में था जो पचास साल से ज़मीन के नीचे दबी थी, और जिसके बारे में कुछ ही दिन पहले तक रणवीर भारद्वाज तक नहीं जानते थे।
"बबलू भाई," मैंने कहा, "आपको ये नाम याद क्यों आया?"
उसने मेरी तरफ़ देखा और उसकी आँखों में कुछ ऐसा था जो मैंने पहले कभी उसमें नहीं देखा था।
"क्योंकि," उसने कहा, "जिस दिन मैं साहब का आदमी बना, उस दिन मेरे बाप ने मुझे यही नाम बताया था।" उसने अपनी हथेली देखी, जैसे उस पर कुछ लिखा हो और वो उसे पढ़ रहा हो। "और कहा था — बेटा, जब बही खुलेगी, तब ये नाम मिटेगा या हमारा हो जाएगा।"
कमरे में चुप्पी छा गई।
काजल ने मेरे कंधे पर हाथ रखा। पापा ने सिर उठाया। मीरा ने कॉपी खोली।
और मैंने उस्ताद को बुलाया।
वो दरवाज़े पर ही खड़े थे — मुझे नहीं पता कब आए। उनका चेहरा पत्थर जैसा था, पर उनकी आँखें बही पर टिकी थीं।
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