The Mysterious Bell – Chapter 1230
और वही निशान, उसी जगह, बही के फटे कोने के ऊपर भी आधा-आधा टूटा पड़ा था।
मैंने साँस अंदर खींची।
"अब," मैंने कहा, "हम हिसाब नहीं जोड़ेंगे।" मैंने बही बंद की। "अब हम नाम जोड़ेंगे।"
उस औरत ने, जो अब तक दरवाज़े पर चुप खड़ी थी, पहली बार अपना दुपट्टा सिर से हटाया।
और मुझे ऐसा लगा, जैसे मैंने अपनी ही दादी को पहली बार देखा हो — अपनी उम्र से पचास साल पहले वाली किसी तस्वीर से जीवित निकलती हुई।
उसके होंठ हिले, और सिर्फ़ इतना कहा — "अब तुमने मुझे पहचान लिया, बेटा।"
और मेरे हाथ में बही थी, जिसका आख़िरी पन्ना अब अधूरा नहीं था।
पर उस पन्ने पर एक लाइन बाक़ी थी, जो सबसे नीचे लिखी थी, और जिसे मैंने अभी पढ़ा नहीं था। मैंने उसे पढ़ने के लिए बही फिर खोली।
उस आख़िरी लाइन में सिर्फ़ तीन शब्द थे, और वो तीन शब्द मेरी रीढ़ से ऊपर चढ़ गए।
अब भुगतान होगा।
॥
अब भुगतान होगा।
तीन शब्द। मैंने उन्हें पढ़ा, और मेरे हाथ से बही खुली ही रह गई।
दुकान के पीछे वाले कमरे में जो भी खड़ा था, उसने साँस लेना बंद कर दिया। छत का पुराना बल्ब आज भी गुनगुना रहा था, पर आज उसकी आवाज़ भी किसी के बोलने से पहले डर गई थी। संदूक का ढक्कन खुला पड़ा था, टिन का डिब्बा, हथौड़ा, रेती, तीन आदमियों की कटी तस्वीर, सब वैसे ही बिखरे हुए। और उस सबके बीच मैं खड़ा था, हाथ में वो बही लिए जिसका आख़िरी पन्ना अब अधूरा नहीं था।
"क्या लिखा है?" काजल ने पूछा। उसका हाथ मेरे कंधे पर था और उसकी उँगलियाँ बर्फ जैसी ठंडी थीं।
"तीन शब्द," मैंने कहा। "बस तीन शब्द।"
"कौन से?"
मैंने बही उसकी तरफ़ घुमाई। वो पढ़ती गई, और पढ़ते-पढ़ते उसके होंठ हिलते रहे, पर आवाज़ नहीं निकली।
पीछे से माँ की आवाज़ आई, कमज़ोर, बुखार में डूबी हुई।
"अंकुश, वो काग़ज़ वापस रख। ऐसे नहीं खुला रहने दे।"
मैं अंदर गया। माँ चारपाई पर अधलेटी थीं, साड़ी का पल्लू कमर में खोंसा हुआ, और हाथ में वही हिसाब की कॉपी थी जिसे उन्होंने रात भर बंद नहीं किया था।
"माँ, आप लेटिए।"
"लेटूँगी," उन्होंने कहा। "पर पहले यह बता, वो औरत सच में वही है?"
"हाँ," मैंने कहा। "सच में वही है।"
माँ की आँखों में कुछ हिला। डर नहीं था। कुछ और था, जिसका नाम मुझे नहीं पता।
"बाईस साल," उन्होंने धीरे से कहा। "बाईस साल मैंने इस घर में उस औरत का नाम नहीं पूछा। क्योंकि मैं जानती थी कि अगर पूछा, तो तेरे पापा टूट जाएँगे। और टूटे हुए आदमी से घर नहीं चलता, बेटा। घर सिर्फ़ बचा हुआ आदमी चलाता है।"
"और आज?"
"आज तुम्हारे पापा पहले से टूटे हुए हैं," उन्होंने कहा। "तो अब पूछ लेने में क्या जाता है।"
मैंने उनका हाथ दबाया। वो पतला था, नसें उभरी हुई, और उसमें वो ताक़त नहीं थी जो मुझे बचपन में पहाड़ जैसी लगती थी। पर उस पतले हाथ में एक चीज़ अब भी थी, जिसे मैं शब्दों में नहीं कह सकता। ज़िद। बस ज़िद।
बाहर लौटा तो वो औरत संदूक के पास वाली लकड़ी की स्टूल पर बैठ चुकी थी। मेरी दादी। पूर्णिमा। उनका टेप बँधा सूटकेस पैरों के पास रखा था, और उनकी उँगलियाँ उसके हत्थे पर ऐसे कसी थीं जैसे वो सूटकेस नहीं, कोई ज़िंदा चीज़ पकड़े हों।
पापा दीवार से टिके खड़े थे। उनका टेप बँधा चश्मा हाथ में था, और आँखें ज़मीन पर।
"दादी," मैंने कहा।
वो उठीं। सच में उठीं। इतनी धीरे कि लगा हड्डियाँ आवाज़ कर रही हैं। फिर उन्होंने मेरा चेहरा दोनों हाथों में लिया और देखा।
"तू जगदीश जैसा नहीं है," उन्होंने कहा। "तू तेरी माँ जैसा है। ज़िद्दी, हट्टा-कट्टा, और बात करने से पहले आँखें बोल देती हैं।"
मेरा गला भर आया। मैंने जल्दी से पूछा, ताकि आवाज़ न टूटे।
"आप इतने सालों बाद… सिर्फ़ इस बही के लिए आई हैं?"
"नहीं," उन्होंने कहा। "मैं ज़मीन के लिए नहीं आई, बेटा। मुझे उस काग़ज़ से कोई मतलब नहीं जो तुम बचाने निकले हो। मैं इस बही के लिए लौटी हूँ।"
"बाईस साल बाद?"
"हाँ। क्योंकि ताला गरम हुआ है।" उन्होंने मेरी तरफ़ देखा। "और जब ताला गरम होता है, तो बही जागती है। और जब बही जागती है, तो घर का एक नाम भी वापस लौटता है। यही उसकी शर्त है।"
मैंने बही उठाई और उनकी तरफ़ बढ़ाई।
"इस आख़िरी लाइन में क्या लिखा है, दादी? अब भुगतान होगा। किसका हिसाब?"
उन्होंने बही छुई, पर खोली नहीं। उनकी उँगली आख़िरी पन्ने के कोने पर रुक गई।
"यह लिखाई मेरी नहीं है," उन्होंने कहा। "जगदीश की भी नहीं।"
कमरे में एक ठंडी ख़ामोशी उतर गई।
"मैंने यह बही तीस साल तक हर हफ़्ते देखी है," वो बोलीं। "जब यह दुकान की पीछे वाली अलमारी में रहती थी, मैं इसे एक बार में खोलकर बंद कर देती थी। आख़िरी पन्ना बंद पड़ा था। उस पर यह लाइन नहीं थी।"
"तो यह किसने लिखी?"
"यही," उन्होंने कहा, "वो बात है जिसके लिए मैं इतनी दूर से आई हूँ।"
तभी दरवाज़े पर टिंकू की आवाज़ आई।
"उस्ताद! उस्ताद आ गए!"
मैंने अपनी जेब में हाथ डाला। ताला वहीं था, कपड़े में लिपटा, और वो अब गरम था। बर्फ जैसा ठंडा नहीं। गरम, जैसे किसी ने उसे अभी हाथ में पकड़कर रखा हो।
उस्ताद अली बक्श अंदर आए। आज उनके हाथ में कैंची नहीं थी, कपड़ा नहीं था, सिर्फ़ उनकी उँगलियाँ थीं, जो चलते वक़्त हवा में घूम रही थीं जैसे कोई बहुत पुराना गिनती का हिसाब गिन रही हों। कान पर पेंसिल थी, चश्मा नाक पर, और पीठ आज कल से ज़्यादा झुकी हुई।
वो दरवाज़े पर रुके।
उन्होंने दादी को देखा। दादी ने उन्हें देखा।
दो बूढ़े लोग। दोनों ने एक-दूसरे को नाम से नहीं, सालों से जाना था। और दोनों के चेहरों पर एक साथ वो भाव आया, जो शब्दों से पहले आता है।
"पूर्णिमा भाभी," उस्ताद ने धीरे से कहा।
"अली बक्श," दादी ने कहा।
बस इतना। उसके बाद कुछ नहीं।
मैंने उस्ताद का हाथ पकड़ा और उन्हें संदूक के पास लाकर बैठाया। वो बैठे, अपनी कमर सीधी करने की कोशिश की, पूरी नहीं हुई। फिर मैंने बही उनके सामने रख दी।
और जो हुआ, वो मैंने पहले कभी नहीं देखा।
उस्ताद ने बही को हाथ में लिया और बोले नहीं। पलटते गए। एक पन्ना। दूसरा। तीसरा। उनकी उँगली पन्नों पर रेंगती रही, जैसे किसी पुराने नक़्शे पर रास्ता ढूँढ रही हो। कमरे में सिर्फ़ काग़ज़ की वो धीमी सरसराहट सुनाई दे रही थी।
फिर उनकी उँगली एक पन्ने पर रुकी।
रुकी और हिली नहीं।
उनका जबड़ा कसा। मैंने देखा कि उनकी गर्दन में नसें उभर आई हैं। उन्होंने चश्मा निकाला, कुर्ते के कोने से पोंछा, फिर लगाया, फिर दोबारा निकालकर हाथ में पकड़ लिया। और उनकी आँखें, जो हमेशा दुकान के पीछे की उस हल्की रोशनी में भी साफ़ रहती थीं, आज धुँधली हो गईं।
"उस्ताद," मैंने कहा। "इस बही में क्या लिखा है?"
वो कुछ देर चुप रहे। फिर बोले, और उनकी आवाज़ में वो तराज़ू नहीं था जो हर बात तोलकर बोलता था।
"यह हिसाब की बही नहीं है, बेटा।"
"तो?"
"यह जोड़ों की बही है।"
मैंने उनकी तरफ़ देखा। "जोड़ों की?"
"हाँ।" उन्होंने पन्ने पर उँगली रखी। "इसमें लोग अपना नाम लिखवाते थे। और नाम के आगे लिखवाते थे कि उन्होंने किससे क्या लिया और किसे क्या दिया।"
"पैसा?"
"पैसा भी।" उन्होंने सिर हिलाया। "पर पैसा सबसे छोटी चीज़ थी जो इस बही में लिखी जाती थी।"
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