The Mysterious Bell1229 / 1504

The Mysterious Bell – Chapter 1229

6 min read November 5, 2026

और उस फटे हुए हिस्से के ठीक नीचे, पन्ने के आख़िर में, दो शब्द बचे थे।

बाक़ी।

बस इतना। "बाक़ी।"

जैसे किसी ने लिखते-लिखते कलम रख दी हो और कह दिया हो — बाद में।

मैंने बही उठाई और उसे रोशनी की तरफ़ किया।

कटे कोने की जगह से रोशनी आर-पार निकल रही थी।

"ये किसने काटा?" मैंने पूछा।

पापा ने जवाब नहीं दिया।

"पापा, ये किसने काटा?"

और तभी पीछे से आवाज़ आई।

माँ।

वो बुखार में थीं। काजल ने उन्हें रोका भी, पर वो उठकर आ गईं। कमर में साड़ी का पल्लू खोंसा हुआ, बाल बिखरे, हाथ में काजल की उँगली पकड़ी हुई। चेहरा लाल, आँखें धँसी हुई, होंठ सूखे।

और जैसे ही उन्होंने मेरे हाथ में बही देखी, वो वहीं रुक गईं।

"ये…" उनकी आवाज़ काँपी। "ये तुमने कहाँ से निकाला?"

"संदूक से, माँ। पापा के संदूक से।"

"कौन सा संदूक? ये लोहे वाला?" उन्होंने पापा की तरफ़ देखा, और उनकी आँखों में वो डर था जो सिर्फ़ उन दोनों के बीच की बात का था। "शंकर… ये बाबा जगदीश की किताब है।"

मैंने कहा, "हाँ, उनका नाम पहले पन्ने पर—"

"नहीं," माँ ने मेरी बात काटी। "तू समझा नहीं। ये वो किताब है जो बाबा जगदीश ने खुद लिखी थी। और ये…" उन्होंने एक कदम आगे रखा और फिर रुक गईं, "ये अलमारी में नहीं रखी थी। ये ज़मीन के नीचे गाड़ी थी।"

कमरे में सन्नाटा छा गया।

मैंने धीरे से कहा, "माँ, आप क्या कह रही हैं?"

"मैंने इसे देखा है," माँ ने कहा, और अब वो साफ़ बोल रही थीं, बुखार अचानक उतर गया था, जैसे डर को बुखार भी डरता हो। "एक बार। रात में। तेरे पापा इसे कपड़े में लपेटकर लाए थे और उनके हाथ मिट्टी से भरे थे और उन्होंने मुझसे कहा था कि अगर मैं किसी को बताऊँ, तो ये घर नहीं रहेगा।"

मैंने पापा की तरफ़ देखा।

वो खड़े थे। एक हाथ बही पर, एक हाथ संदूक के ढक्कन पर।

"पापा," काजल ने कहा, और उसकी आवाज़ तेज़ थी, तेज़ और काँपती हुई, "घर में और कितने ताले हैं जिनके बारे में हमें पता नहीं?"

पापा ने उसकी तरफ़ देखा।

"कितने, पापा?" काजल ने दोहराया। "एक ताला गले में। एक संदूक पर। एक चूल्हे के पीछे। एक दादी की अलमारी में। कितने और हैं? क्या आपने हमें कभी बताया होता कि हमारा घर इतना भारी है?"

"काजल—" माँ ने कहा।

"नहीं, माँ।" काजल की आँखें भर आई थीं। "मैं सच पूछ रही हूँ। जब से मैंने होश सँभाला है, हमारे घर में चीज़ें बंद हैं। एक ताला खुलता है, तो उसके पीछे दूसरा। एक चुप्पी जाती है, तो दूसरी आती है। मैं थक गई हूँ।" उसने मेरी तरफ़ देखा। "और तू? तू इसे मज़ाक बनाकर चलता रहता है, अंकुश। तू हर चीज़ को हँसी में बदल देता है। पर ये हँसी की चीज़ नहीं है।"

मैंने कुछ कहा नहीं।

काजल सही थी। और सही होने वाले लोगों से मैं हमेशा चुप रह जाता हूँ, क्योंकि उनसे लड़ना अपने आप से लड़ना होता है।

पापा ने चश्मा जेब से निकाला। कान का टेप इस बार खुल गया था, इसलिए उन्होंने उसे जेब में ही रखा।

फिर उन्होंने आँखें मलीं।

फिर उन्होंने बही को दोनों हाथों से उठाया, मेरे हाथों से लिया, और उसे खोलकर आख़िरी पन्ने पर रखा।

कटे कोने पर उनका अँगूठा आया। और रुक गया।

"मैंने इसे फाड़ा था," उन्होंने कहा।

उनकी आवाज़ इतनी धीमी थी कि कमरे में मौजूद हर आदमी को सुनने के लिए पास आना पड़ा। शबनम आपा भी पास आ गईं।

"क्या?" मैंने कहा।

"ये पन्ना। इसका कोना। मैंने फाड़ा था।" उन्होंने आँखें नहीं उठाईं। "फाड़कर नाले में बहा दिया था।"

मेरे अंदर कुछ गिरा। जैसे कोई सीढ़ी सीढ़ी से नीचे गिरती है।

"क्यों?" मैंने पूछा।

"क्योंकि उस पर एक नाम लिखा था।"

"किसका नाम?"

पापा ने कुछ नहीं कहा।

"पापा," मेरी आवाज़ भारी हो चली थी, "किसका नाम?"

और तभी, मेरी तरफ़ देखे बिना, माँ ने आँखें बंद कर लीं और उनके होंठ हिले।

उन्होंने एक नाम कहा।

धीरे से। सिर्फ़ मुझे सुनाई देने जितना।

"पूर्णिमा।"

मेरा पूरा शरीर ठंडा हो गया।

मुझे लगा जैसे दरवाज़े का शटर मेरे सीने पर गिर गया हो। मैंने पलटकर देखा।

वो औरत — पूर्णिमा — दरवाज़े पर खड़ी थी। अपने टेप बँधे सूटकेस के साथ। उसके चेहरे पर कोई भाव नहीं था। कोई हैरानी नहीं, कोई गुस्सा नहीं। बस एक थकान थी, जैसे वो इस पल का इंतज़ार बहुत सालों से कर रही हो और इंतज़ार करते-करते इंतज़ार भी पुराना हो गया हो।

"पापा," मैंने कहा, और मेरी आवाज़ फट गई, "पूर्णिमा कौन है?"

पापा ने चश्मा फिर जेब से निकाला। इस बार उन्होंने टेप लगाया। धीरे-धीरे। बहुत धीरे। जैसे समय को कुछ देर रोकना चाहते हों।

और फिर उन्होंने वो कहा जो पूरे पच्चीस साल बोला नहीं था।

"पूर्णिमा," उन्होंने कहा, "मेरी माँ का नाम था।"

कमरे में जो सन्नाटा आया, वो मुझे आज तक याद है।

काजल ने अपना हाथ मुँह पर रख लिया।

शबनम आपा वहीं की वहीं, दीवार का सहारा लेकर खड़ी हो गईं।

माँ की आँखों से आँसू गिर रहे थे, और वो पोंछ भी नहीं रही थीं।

और मैं खड़ा था, बही हाथ में, और मुझे समझ नहीं आ रहा था कि मुझे किस चीज़ से डरना चाहिए — उस औरत से, जो दरवाज़े पर खड़ी थी, या उस नाम से, जो मेरी दादी का था और जिसे मैंने अपनी ज़िंदगी में कभी नहीं सुना था।

"पापा," मैंने कहा, "आपने कभी नहीं बताया कि दादी का नाम पूर्णिमा था।"

"क्योंकि दादी मर चुकी हैं," उन्होंने कहा।

"तो?"

"तो मुर्दों के नाम घर में नहीं टाँगे जाते, बेटा।" उनकी आवाज़ रूखी थी, पर उसमें घाव था। "उनका नाम लेते ही घर की दीवारें बोलने लगती हैं।"

मैंने उस औरत की तरफ़ देखा। मेरी नज़र लड़खड़ाई।

"आप…" मैंने धीरे से कहा, "आप कौन हैं?"

उसने जवाब नहीं दिया।

पर पापा ने दिया।

"ये मेरी माँ हैं," पापा ने कहा, और उनकी आवाज़ टूट गई, "जिन्हें मैंने मरा हुआ मान लिया था।"

कमरे में हवा भारी हो गई।

मैंने उस औरत की तरफ़ देखा, जिसके हाथ टेप बँधे सूटकेस के हत्थे पर कस रहे थे, और जिसके सफ़ेद दुपट्टे के नीचे एक पीली चुनरी का कोना झाँक रहा था, जिसके छोटे घिसे फूल मैंने गुमटी पर देखे थे।

मुझे लगा सब कुछ रुक जाएगा। पर नहीं रुका।

क्योंकि मेरी जेब में एक पीला काग़ज़ था। वो, जो ताले के छेद से निकला था। वो, जिस पर नीली स्याही में सिर्फ़ एक शब्द लिखा था।

पूर्णिमा।

मेरे हाथ काँप रहे थे जब मैंने उसे निकाला।

"पापा," मैंने कहा, "एक बात देखिए।"

मैंने बही उठाई, आख़िरी पन्ना खोला, और उस पन्ने के फटे कोने के बिल्कुल पास वो पीला काग़ज़ ले जाकर रखा।

कमरे में जो हुआ, वो मैं शब्दों में नहीं कह सकता।

फटे कोने का किनारा और पीले काग़ज़ का किनारा — बिल्कुल मिल गए।

ऊपर का रेशा नीचे के रेशे से चिपक गया। कोई दरार नहीं। कोई अंतर नहीं।

दोनों की स्याही एक जैसी नीली थी। फीकी, पुरानी, पर एक ही कलम से।

और जहाँ बही के पन्ने पर लिखा था "आख़िरी हिसाब —" वहाँ, उस पीले काग़ज़ के जुड़ने से, ऊपर वाली लाइन में एक नाम बन गया, जो बरसों से अधूरा पड़ा था।

इस हिसाब का आख़िरी नाम — पूर्णिमा।

काजल ने मेरे कंधे पर हाथ रखा। उसका हाथ भी काँप रहा था।

"अंकुश," उसने धीरे से कहा, "अब क्या?"

मैंने उस पीले काग़ज़ को देखा। उसके नीचे के कोने पर वही निशान था — दो लकीरें और बीच में बिंदु।

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