The Mysterious Bell – Chapter 1228
"पूरा नाम?"
उसने मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखें बहुत शांत थीं। इतनी शांत कि मुझे डर लगा। डरने वाले लोग चिल्लाते हैं। शांत लोग सिर्फ़ इंतज़ार करते हैं — और इंतज़ार करने वाले लोगों के पास अक्सर कुछ ऐसा होता है जो बहुत पहले तय हो चुका होता है।
"पूरा नाम बाद में बताऊँगी," उसने कहा, "पहले तुम अपने पापा से पूछो कि मैं कौन हूँ।"
मैंने पलटकर देखा।
पापा दरवाज़े पर खड़े थे। बही सीने से चिपकाए। काली जिल्द वाली वही बही, जिसे वो कुछ देर पहले लेकर आए थे। उनकी उँगलियाँ बही के किनारे पर सफ़ेद पड़ गई थीं, इतनी कसकर पकड़ा था।
"पापा?"
उन्होंने कुछ नहीं कहा।
"पापा, ये कौन हैं?"
उन्होंने चश्मा उतारा। कान का टेप खुल गया और चश्मा उनके हाथ में लटक गया। उन्होंने उसे देखा, जैसे पहली बार देख रहे हों, और फिर धीरे से बोले, "अंदर चलो।"
"क्या?"
"अंदर चलो," उन्होंने दोहराया, "दुकान के पीछे।"
शबनम आपा ने कहा, "शंकर भाई, ये औरत—"
"आपा," पापा ने उनकी तरफ़ देखकर कहा, "आप भी चलिए।" और फिर उस औरत की तरफ़ देखकर, बहुत धीमे से, इतना धीमे से कि मुझे लगा मैंने सुना नहीं, बल्कि समझा — "तुम भी आ जाओ।"
वो औरत सूटकेस खींचती हुई अंदर आई।
तुम सोच रहे होगे कि मैंने उसे रोका क्यों नहीं। सच कहूँ? मैं रोक ही नहीं पाया। क्योंकि जब पापा ने उस औरत को "तुम" कहकर बुलाया, तो मेरे अंदर कुछ ऐसा हिला जो सालों से चुपचाप बैठा था।
दुकान के पीछे वाला कमरा। वही कमरा जिसमें औज़ारों का ट्रंक था, लोहे की अलमारी थी, और गुनगुनाता पुराना बल्ब। उस बल्ब की रोशनी में कमरा हमेशा पीला दिखता है, जैसे पुरानी तस्वीर।
पापा ने औज़ारों का ट्रंक हटाया।
उसके पीछे, दीवार से सटा, एक लोहे का संदूक पड़ा था।
मैंने उसे अपनी ज़िंदगी में पहली बार पूरा देखा। चौबीस साल में पहली बार। वो इतने सालों से वहीं था, और मैंने उसे हमेशा दीवार का हिस्सा समझा था। उस पर पीतल की पट्टियाँ लगी थीं, कोनों पर घिसी हुई, और उस पर इतनी धूल थी कि उँगली रखने पर अंगूर जैसा निशान बन जाए।
पापा ने अपनी कमीज़ के कॉलर में हाथ डाला और एक काला धागा बाहर निकाला।
धागे में एक छोटी चाबी बँधी थी।
"ये?" मैंने कहा। "ये आपने कभी मुझे नहीं दिखाई।"
"क्योंकि तूने कभी पूछा नहीं," उन्होंने कहा।
"पापा, मैंने आपसे सौ बार पूछा है कि आपके गले में क्या है। आप हर बार कहते थे — बाद में।"
"तो अब बाद में है," उन्होंने कहा, और चाबी मेरी हथेली पर रख दी।
चाबी ठंडी थी। बहुत ठंडी। जैसे किसी ने उसे बरसों तक किसी के सीने के पास नहीं, किसी कुएँ के पानी में रखा हो।
मैंने चाबी संदूक के ताले में डाली।
वो बैठी।
मैंने घुमाया।
पहले तो कुछ नहीं हुआ। फिर अंदर कुछ छटका — जैसे सालों की ज़ंग एक साथ टूटी हो — और ताला खुल गया।
संदूक खोला।
और कमरे में एक गंध फैल गई।
पुराने काग़ज़ की गंध। मिट्टी के तेल की गंध। और उसके ऊपर, बहुत हल्की सी, कपूर की गंध।
काजल पीछे खड़ी थी। उसने नाक सिकोड़ी और कहा, "ये गंध… मुझे ये गंध कहीं से याद है।"
"कपूर," मैंने कहा।
"नहीं," काजल ने कहा, "इससे पहले वाली। मिट्टी के तेल वाली।"
माँ की आवाज़ अंदर से आई। वो बुखार में थीं, और उनकी आवाज़ इतनी धीमी थी कि जैसे किसी दूसरे कमरे से नहीं, किसी दूसरे साल से आ रही हो।
"शंकर," उन्होंने कहा, "तुमने वो संदूक खोल दिया?"
पापा ने जवाब नहीं दिया।
संदूक में सबसे ऊपर एक मोड़ा हुआ लाल कपड़ा था। उसके नीचे औज़ार थे। एक मोटा हथौड़ा, जिसके लकड़ी के हत्थे पर टेप लिपटा था। एक पुरानी रेती, जिसके दाँते घिस गए थे। एक मुड़ी हुई लोहे की पट्टी। और एक छोटा सा टिन का डिब्बा, जिसमें पेंच, कीलें और दो मुड़े हुए काँटे थे।
मैंने हथौड़ा उठाया।
हत्थे पर टेप के नीचे कुछ खुदा था। मैंने टेप हटाया।
"शंकर," वहाँ लिखा था।
मेरे हाथ रुक गए।
"पापा," मैंने कहा, "ये आपका हथौड़ा है?"
"नहीं," उन्होंने कहा। "ये तेरे दादा का है। और उस पर मेरा नाम मैंने खुद खोदा था, जब मैं सोलह साल का था।" उन्होंने एक पल रुककर कहा, "ताकि अगर कोई औज़ार अलग हो जाए, तो पता चले कि किसका है।"
मुझे कुछ कहना चाहिए था। पर मैं चुप रहा, क्योंकि मैं संदूक के अंदर देख रहा था।
औज़ारों के नीचे दो तस्वीरें थीं।
पहली — काली-सफ़ेद, मुड़ी हुई, किनारों से पीली। उसमें तीन आदमी खड़े थे। बीच में एक साइकिल थी। बाईं तरफ़ का आदमी — पतला, चश्मा, कान पर पेंसिल। मैंने उसे पहचाना। उस्ताद अली बक्श। जवान उस्ताद। और दाईं तरफ़ का आदमी — चौड़े कंधे, मोटी मूँछें, हाथ साइकिल के हैंडल पर।
तीसरा आदमी — बीच वाला — काटा हुआ था। बिल्कुल सीधी कैंची से। जैसे किसी ने उसे तस्वीर से निकाल दिया हो, पर उसकी परछाईं तस्वीर में छोड़ दी हो।
दूसरी तस्वीर छोटी थी। एक औरत बैठी थी, गोद में बच्चा था, और उसके पीछे एक दीवार थी जिस पर कोई चीज़ टँगी थी — धुँधली, पर शक्ल से घंटी जैसी।
औरत के चेहरे पर हल्की हँसी थी। वो हँसी मैंने कहीं देखी थी।
"ये कौन है, पापा?" मैंने पूछा।
उन्होंने तस्वीर छुई नहीं। बस देखी।
"अभी नहीं," उन्होंने कहा।
"पापा—"
"अभी नहीं, अंकुश।" उनकी आवाज़ में वो चीज़ थी जो पहले कभी नहीं थी — मिन्नत। "पहले नीचे देख।"
मैंने नीचे देखा।
औज़ारों के नीचे, कपड़े में लिपटी, एक पतली बही रखी थी।
काली जिल्द। घिसी हुई। कोनों से उखड़ी हुई।
मैंने उसे बाहर निकाला। कपड़ा खोला।
बही बहुत हल्की थी। जितनी हल्की किसी की पूरी ज़िंदगी का हिसाब हो सकता है।
मैंने पहला पन्ना पलटा।
ऊपर, बीच में, सुंदर और सीधी लिखाई में — "हिसाब — साइकिल मरम्मत। साइकिल गली।"
मैंने दूसरा पन्ना पलटा।
नाम थे। तारीख़ें थीं। रकम थीं। हर नाम के आगे एक लाइन, और हर लाइन के आगे या तो "चुका दिया" लिखा था, या कुछ नहीं।
चुका दिया वाले नामों पर हल्की लकीर खींची गई थी। जिन नामों पर लकीर नहीं थी, वो अभी भी वहीं खड़े थे, काग़ज़ पर, बरसों से, इंतज़ार करते हुए।
मैं तेज़ी से पन्ने पलटने लगा।
और फिर मैं रुका।
क्योंकि एक पन्ने पर तीन नाम एक के नीचे एक लिखे थे।
जगदीश यादव।
शंकर यादव।
अंकुश यादव।
और तीनों के आगे, एक ही लिखाई में, एक ही शब्द —
हिसाब बाक़ी।
मैंने उँगली उस पन्ने पर रखी।
"पापा," मैंने कहा, और मेरी आवाज़ मेरी नहीं लगी, "ये क्या है?"
"बही," उन्होंने कहा।
"मुझे दिख रहा है बही। पर इसमें मेरा नाम क्यों है? मैं तो पैदा भी नहीं हुआ था जब ये लिखा गया।"
पापा ने उस पन्ने को देखा। फिर बोले, "हर नाम के आगे नहीं लिखा जाता कि वो कब पैदा हुआ। कुछ नाम पहले से लिखे रहते हैं, बेटा। बस उनका हिसाब बाद में खुलता है।"
मुझे ठंड लगी। दुकान के पीछे के कमरे में, पुराने बल्ब की पीली रोशनी में, मुझे सच में ठंड लगी।
मैंने आख़िरी पन्ना पलटा।
वो पन्ना बाक़ी पन्नों से अलग था। उस पर हिसाब नहीं था। उस पर सिर्फ़ एक लाइन थी, और वो लाइन उसके ऊपर वाले हिस्से में थी।
"आख़िरी हिसाब —"
और उसके बाद का पूरा हिस्सा कटा हुआ था।
एक बड़ा कोना — इतना बड़ा कि अंगूठे से तीन उँगलियाँ ढक जाएँ — फटा हुआ था। फटा नहीं, काटा हुआ। किनारा इतना सीधा था कि कोई चाकू या ब्लेड ही कर सकता था। काग़ज़ के रेशे तक बराबर थे।
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