The Mysterious Bell – Chapter 1227
मीरा ने सोचा।
"भोला भाई," उसने कहा, "पर वो डरता है।"
"डरता है, तो ठीक है। डर उसका भी है, मेरा भी है। पर आज मुझे उस डर वाले आदमी से एक सवाल पूछना है।"
"क्या?"
"ये," मैंने ताला उठाया, "रणवीर के घर में जुड़वाँ ताला है क्या?"
टिंकू ने अपनी नज़र मेरी तरफ़ उठाई।
"उस्ताद, मंसूर चाचा ने कहा था — जुड़वाँ ताले, दो घर।"
"हाँ," मैंने कहा, "और अगर एक ताला ठंडा है, तो दूसरा भी होगा। पर मुझे ये भी जानना है कि दोनों ताले किससे जुड़े हैं।"
शबनम आपा ने कुर्सी से उठते हुए कहा, "मैं भोला को बुला लाती हूँ।"
"आपा, वो डरेगा—"
"मैं उसे डरने नहीं दूँगी," उन्होंने कहा, "मैं उसकी पत्नी को बोलूँगी। औरत जब बोलती है, तो आदमी डरना भूल जाता है।"
वो चली गईं।
मैं मेज़ पर झुका।
ताला सामने था। चाबी सामने थी। छेद बदला हुआ था।
मैंने चाबी फिर उठाई। इस बार नीचे के छेद में डाली — जो अब तक भरा हुआ था।
चाबी घुसी।
नीचे तक गई।
और फिर रुक गई।
मैंने घुमाया।
ताला नहीं खुला।
पर उसके अंदर से एक आवाज़ आई — बहुत धीमी, बहुत दूर से, जैसे मेरी ही आवाज़ हो जो बरसों पहले बोली गई हो।
"अब तूने रास्ता खोज लिया।"
मैंने चाबी वापस निकाली और मुट्ठी में दबा ली।
टिंकू ने मेरी मुट्ठी देखी, फिर मेरे चेहरे पर आई।
"उस्ताद, क्या हुआ?"
"कुछ नहीं।"
"झूठ।"
मैंने उसकी तरफ़ देखा।
"टिंकू—"
"तेरी आँखें बदल गईं।"
मैंने उसकी तरफ़ देखा और फिर— मैंने सच कहा।
"ताले ने बात की।"
टिंकू एक पल के लिए रुका।
"क्या कहा?"
"कहा कि मैंने रास्ता खोज लिया।"
टिंकू ने ताला देखा। फिर उसने कुछ सोचा।
"उस्ताद, ये ताला मेरी समझ से बाहर है। पर एक बात मैं जानता हूँ।"
"क्या?"
"तूने खुद कहा था — हर जोड़ को दो आदमी चाहिए। एक ताला भी अकेला नहीं।"
मैं उसकी तरफ़ देखता रह गया।
कभी-कभी ये लड़का इतनी आसानी से वो बात कह देता है जिसे मैं हफ़्तों सोचता रहता हूँ।
"तो?"
"तो," टिंकू ने कहा, "तेरी याद जिस ताले में बंद है, वो ताला अकेला नहीं है। उसका कोई जोड़ीदार है। और जब तक वो नहीं मिलता, ये नहीं खुलेगा।"
मैंने ताला उठाया।
"तो जोड़ीदार कहाँ है?"
टिंकू ने सिर हिलाया।
"वहीं, जहाँ भेजने वाले ने रखा होगा। रणवीर के घर में।"
मैंने कुर्सी पीछे सरकाई और खड़ा हो गया।
"फिर? आज सुबह?"
"आज सुबह," टिंकू ने कहा, "अभी। भोला भाई आ रहे हैं। मीरा दीदी कैमरा ले रही हैं। हम पीछे वाले रास्ते से जाते हैं।"
"तू स्कूल—"
"उस्ताद," टिंकू ने मेरी बात काटी, "मैंने तुझसे वादा किया था — अब छिपकर नहीं। तो अब तू भी मान ले। साथ चलेंगे।"
मैंने उसकी तरफ़ देखा।
पंद्रह साल का लड़का, घुटने पर पट्टी, स्कूल का बस्ता एक तरफ़ रखा, और आँखों में वो चीज़ जो बड़े-बड़ों में नहीं होती — साफ़ इरादा।
"ठीक है," मैंने कहा, "पर एक शर्त है।"
"कह।"
"जो मैं कहूँ, वही करेगा।"
"पर जो तू गलत कहे—"
"तो तू मुझे पहले बताएगा," मैंने कहा, "और हम दोनों मिलकर सही रास्ता चुनेंगे।"
टिंकू मुस्कुराया।
"डील।"
उसने हाथ बढ़ाया।
मैंने हाथ बढ़ाया।
हाथ मिलाया।
उसी वक़्त मेरी जेब में घंटी हिली।
एक बार।
हल्की-सी, जैसे किसी ने दूर से देखा हो और सिर हिलाया हो।
तभी बाहर शबनम आपा की आवाज़ आई।
"अंकुश!"
मैं शटर के पास गया।
शबनम आपा के साथ एक औरत थी — पचास के आसपास, सफ़ेद दुपट्टा, टेप से बँधा पुराना सूटकेस।
और उनके पीछे, गली के मोड़ पर, वो खड़ी थी।
मैं उसे पहचानता हूँ।
वो गली के मोड़ पर सालों से खड़ी रहती है, टूटी साइकिल की तरह, किसी के आने का इंतज़ार करती हुई।
पर आज वो साइकिल चल रही थी।
वो औरत मेरी तरफ़ बढ़ रही थी।
और उसके हाथ में एक लिफ़ाफ़ा था।
पीला। मैला। फटा हुआ।
"ये," उसने कहा और लिफ़ाफ़ा मेरी तरफ़ बढ़ाया, "तुम्हारे पास रखा था। मैंने सोचा, आज तुम्हें दे दूँ।"
मैंने लिफ़ाफ़ा लिया।
उस पर कोई नाम नहीं था। कोई मोहर नहीं थी।
पर उसके नीचे के कोने पर — वही निशान था।
दो लकीरें और बीच में बिंदु।
मैंने लिफ़ाफ़ा खोला।
अंदर एक चीज़ थी।
और वो चीज़ देखकर मेरा हाथ रुक गया।
क्योंकि वो चीज़ मैंने पहले देखी थी।
उस्ताद की दुकान पर।
उस रात।
जब उन्होंने ट्रंक के पीछे से कुछ निकाला था और कहा था — "जब तुम्हारा घर खुलेगा, तब ये खुलेगी।"
वो चीज़ थी एक ताले की चाबी।
बहुत छोटी। बहुत पुरानी। जिसके दाँते घिसे हुए थे, और छल्ले पर रेशमी धागा बँधा था।
धागा लाल था। बहुत पुराना। और उस पर सुई के दो टाँके थे।
मैंने उसे हवा में उठाया और पलटकर देखा।
उस पर कोई नाम नहीं था।
पर जब मैंने उसे उलटा किया, तो देखा — उसके छोटे-से पीतल के ढक्कन पर भी वही निशान था।
दो लकीरें। बीच में बिंदु।
शबनम आपा ने पास आकर पूछा, "ये क्या है?"
मैंने उनकी तरफ़ देखा।
"ये," मैंने कहा, "मेरी याद का दूसरा हिस्सा है।"
और उसी वक़्त, मेरी जेब में घंटी ने एक बार फिर बजकर कहा, "अब दोनों ताले पास आ गए।"
इस बार आवाज़ में जल्दी थी।
और उस जल्दी में कुछ था जिसे मैं समझ गया —
वक़्त कम है।
उस औरत ने, जो अब तक चुप खड़ी थी, एक लंबी साँस ली और कहा, "मेरा नाम भी तुम्हारे उस काग़ज़ पर लिखा है।"
मैंने उसकी तरफ़ देखा।
"कौन से काग़ज़ पर?"
"जिसे तुम अभी ढूँढ रहे हो," उसने कहा, "सातवें काग़ज़ पर। जो रणवीर भारद्वाज के गले में लटकता है।"
मैंने ताला और चाबी दोनों मुट्ठी में भींच लिए।
और मैंने पहली बार उस सुबह महसूस किया कि ये लड़ाई सिर्फ़ ज़मीन की नहीं है।
ये लड़ाई नामों की है।
और नामों में — वो भी लिखा है जो कोई नहीं पढ़ना चाहता।
मैंने पापा की तरफ़ देखा।
वो दरवाज़े पर खड़े थे। बही सीने से लगाए। और उनकी आँखों में वो चीज़ थी जिसे मैंने पहले कभी नहीं देखा था — पहचान।
वो उस औरत को जानते थे।
और उस औरत की आँखों में भी वो पहचान थी।
"शंकर," उस औरत ने कहा, "तूने मुझे नहीं बताया था कि तेरा बेटा इतना बड़ा हो गया।"
पापा ने कुछ नहीं कहा।
बस बही को कसकर पकड़ लिया।
और मेरे अंदर कुछ ऐसा टूटा जिसे मैंने अभी तक नहीं जोड़ा था।
मैंने उस औरत की तरफ़ देखा।
"आप कौन हैं?"
उसने मुस्कुराकर कहा, "मैं वही हूँ," और फिर उसने एक लंबी साँस लेकर अपना नाम बताया।
"पूर्णिमा।"
मेरे हाथ से चाबी फिसल गई।
और ताले की तरफ़ गिरी — जो अब गरम हो रहा था।
॥
चाबी फ़र्श पर गिरी, दो बार उछली, और एक छोटी सी ठन की आवाज़ के साथ रुक गई।
और ताला — जो अब तक बर्फ़ जैसा ठंडा था — गरम हो रहा था।
मैंने चाबी उठाई। उँगलियों में उसकी गरमाहट नहीं थी, पर ताले से आती हुई हवा गरम थी। जैसे किसी ने अंदर बैठकर लंबी साँस छोड़ी हो।
शबनम आपा ने मेरी कलाई पकड़कर कहा, "अंकुश, ये औरत कौन है?"
मैंने उनकी तरफ़ नहीं देखा। मैं उस औरत को देख रहा था।
वो दरवाज़े के ठीक बीच में खड़ी थी। सूटकेस का टेप बँधा हत्था दोनों हाथों से पकड़े हुए। सफ़ेद दुपट्टा सिर से खिसककर कंधों पर आ गया था, और उसके नीचे के बाल — पूरे सफ़ेद नहीं, पर आधे सफ़ेद, जैसे कोई चीज़ आधी रात में पकी हो और आधी कच्ची छूट गई हो।
"आपने अपना नाम कहा," मैंने कहा, "पूर्णिमा।"
"हाँ।"
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