The Mysterious Bell – Chapter 1226
मीरा उसी वक़्त आई।
हाथ में उसका फटा बैग, कंधे पर कैमरा, आँखों में वो लाली जो रात भर जागने से आती है। उसने अंदर आते ही मेज़ पर अपनी मोबाइल रखी और बिना कुछ कहे एक बटन दबाया।
रिकॉर्डिंग चल पड़ी।
पहले सन्नाटा। फिर मेरी ही आवाज़ — बहुत धीमी — "ठंडा है।"
फिर—
"तेरी सबसे प्यारी याद अब भी मेरे पास बंद है।"
कमरे में वो आवाज़ भर गई।
गहरी। बूढ़ी। ठंडी। जैसे किसी तहखाने से आ रही हो। और उसमें वो कुछ था जिसे मैं शब्दों में नहीं कह सकता — जैसे आवाज़ नहीं, किसी की साँस हो जिसने बहुत दूर से बोला हो।
टिंकू ने अपने दोनों हाथ कान पर रख लिए।
"फिर वही," उसने कहा।
"हाँ," मीरा ने कहा, "बिल्कुल वही। जैसा ताले से सुना था — शब्द, रुकाव, सब।"
शबनम आपा ने अपना कुल्हड़ मेज़ पर रखा। उनके हाथ नहीं काँपे — पर उन्होंने अपने होंठ भींच लिए थे।
"आवाज़ बुरी है," उन्होंने कहा, "हड्डी तक जाती है।"
"पर ये आवाज़ है या रिकॉर्ड किया हुआ डर?" मैंने पूछा।
मीरा ने मेरी तरफ़ देखा।
"मैंने इसे तीन बार सुना है," उसने कहा, "और तीनों बार इसमें एक चीज़ बदली है।"
"क्या?"
"आख़िरी लफ़्ज़ — 'बंद है।' पहली बार में वो जल्दी बोला गया था। दूसरी बार साफ़। तीसरी बार… उसमें जैसे हँसी थी। नीचे, दबी हुई।"
मैंने ताला मेज़ पर घुमाया।
"यानी ये रिकॉर्डिंग नहीं है," मैंने कहा, "रिकॉर्डिंग तीन बार एक जैसी होती है।"
"रिकॉर्डिंग कोई भी हो सकती है," शबनम आपा ने कहा, "पर ये बात कर रही है।"
कमरे में सन्नाटा छा गया।
तभी बाहर, पीपल की तरफ़ से आवाज़ें आईं। कोई बोल रहा था — ऊँची आवाज़ में, इतनी ऊँची कि दुकान तक सुनाई दे।
"मैं कहता हूँ ये सब साहब का नया डर है!"
मैं शटर के पास गया।
पीपल के नीचे तीन-चार आदमी बैठे थे। उनमें से एक — मैंने उसे पहचाना — पुराने बाज़ार का वो आदमी था जो कभी-कभी हमारी गली से गुज़रता था। हरी शर्ट, पीली पैंट, मुँह में पान।
"साहब ने आवाज़ बनवाई है," वो बोल रहा था, "किसी स्टूडियो में। 'तेरी प्यारी याद बंद है' — ऐसा रिकॉर्ड करवा दिया। अब छोड़ दिया गली में। डराने के लिए।"
दूसरे आदमी ने कहा, "भई, इससे अच्छा डर भी क्या होगा? सोचो — इंसान लड़ेगा, तोड़ेगा, धमकाएगा। पर जब वो तेरी यादों पर हाथ डाले, तो क्या करेगा?"
"मेरे पास यादें ही नहीं हैं," पहले वाले ने हँसकर कहा, "मैं तो अभी खाली आदमी हूँ।"
वो दोनों हँसे।
और उनकी हँसी में एक चीज़ थी जो मुझे चुभी — डर। असली डर, जिसे वो हँसी के नीचे छिपा रहे थे।
मैं शटर के सहारे खड़ा रहा।
फिर मैंने हाथ ऊपर किया।
"अरे भाई!"
वो दोनों रुक गए।
"अच्छा है ना," मैंने कहा, "कम से कम साहब ने हमारे लिए कुछ नया बनवाया तो। पिछले हफ़्ते वो सिर्फ़ काग़ज़ भेज रहा था। अब आवाज़ भेज रहा है। प्रगति है यार। कल शायद वो खुद आएगा।"
वो चुप हो गए।
पान वाले ने मुँह बनाया, फिर कुछ बड़बड़ाया और अपनी राह चला गया। बाकी भी उठ गए।
शबनम आपा ने मेरी तरफ़ देखा।
"तू हँस रहा था," उन्होंने कहा, "पर तेरी आँखें नहीं हँस रही थीं।"
मैंने उनकी तरफ़ देखा।
"आपा—"
"पता है," उन्होंने कहा, "मुझे सब पता है। पर आज सुबह मैं तुझे उस पर नहीं छोड़ूँगी। पहले ये ताले का क्या है, बता।"
मैं कुर्सी पर वापस बैठा।
मीरा ने मेज़ पर अपनी मोबाइल रखी।
टिंकू मेरे सामने वाली स्टूल पर बैठा और अपनी ठुड्डी हाथों पर टिकाकर मुझे देखने लगा — वो वाली नज़र जिसमें कहा जाता है, "अब बोल, मैं सुन रहा हूँ।"
मैंने ताला उठाया।
"ये ताला," मैंने कहा, "मेरी सबसे प्यारी याद बंद है इसमें।"
"कैसे पता?"
"घंटी ने कहा। वो आवाज़ ने कहा। दोनों ने कहा।"
"और तू मानता है?"
"नहीं," मैंने कहा।
"फिर?"
"फिर भी ठंडा है," मैंने कहा और ताला उनकी तरफ़ बढ़ा दिया।
शबनम आपा ने ताला छुआ और तुरंत हाथ खींच लिया।
"बाप रे," उन्होंने कहा, "ये तो बर्फ़ जैसा है। अभी तो धूप निकली है।"
"हाँ," मैंने कहा, "पर इसमें धूप नहीं पहुँचती।"
मीरा ने ताला हाथ में लिया। उसने उसे पलटा, उँगली से छेद को टटोला, फिर मेरी तरफ़ देखा।
"अंकुश," उसने कहा, "तेरे पास चाबी है?"
"हाँ," मैंने कहा, "पापा की पीतल की। माँ ने दी थी पोटली में।"
"देख।"
मैंने जेब से पीतल की चाबी निकाली।
वो मोटी थी, घिसी हुई, किसी पुराने ज़माने की चाबी — जिसके दाँते बरसों से खुरदुरे हो चुके थे।
मैंने चाबी ताले के छेद में डाली।
आधी गई।
फिर अटक गई।
मैंने धीरे से घुमाया। कुछ नहीं।
ज़ोर लगाया। कुछ नहीं।
"फँस गई।"
"निकाल," शबनम आपा ने कहा।
"निकल नहीं रही।"
मैंने खींचा। चाबी हिली, पर बाहर नहीं आई। जैसे अंदर से किसी ने उसे पकड़ लिया हो।
टिंकू उठकर पास आया।
"उस्ताद, तेल डाल?"
"तेल?" मैंने कहा, "ये ताला तेल से नहीं खुलने वाला।"
"तो?"
"पता नहीं यार।"
मैंने फिर खींचा। इस बार चाबी थोड़ी बाहर आई — जैसे अंदर कुछ ढीला हुआ हो।
फिर वो बाहर आ गई।
पूरी।
और फिर जो हुआ, वो मैंने पहले नहीं देखा था।
ताला, जो अब तक हथेली में समा जाता था — उसका छेद बदल गया था।
मेरी चाबी के दाँते उसमें आधे ही बैठते थे, और मैंने सोचा था कि ताला पुराना है, इसलिए अटकता होगा।
पर अब, जब चाबी निकली — तो छेद का आकार कुछ और था।
और ये बात मैं समझ गया।
रात में किसी ने उस ताले के अंदर, अंदर से, दूसरा ताला लगा दिया था।
मैंने ताले को उजाले में किया।
छेद गोल नहीं था। वो अब थोड़ा आयताकार था, जैसे कोई दूसरी चाबी पहले से अंदर बैठी हो और उसने अपनी जगह बना ली हो।
मेरा हाथ रुक गया।
टिंकू ने मेरी आँखों की दिशा देखी। वो नीचे झुका, ताले को अपनी तरफ़ घुमाया, और उसकी साँस अटक गई।
"उस्ताद—"
"देख रहा हूँ।"
"ये छेद—"
"बदल गया है।"
मीरा ने ताला मुझसे छीना। वो खिड़की की तरफ़ ले गई, धूप में उठाया, ध्यान से देखा।
"अंकुश," उसने कहा, "ये छेद नया नहीं है। ये पुराना है। ज़रूरत से ज़्यादा पुराना।"
मैंने उसकी तरफ़ देखा।
"मतलब?"
"मतलब," उसने कहा, "ये ताला जब बना था, तब शायद दो छेद वाला बना था। एक ऊपर, एक नीचे। और ऊपर वाला अब तक भरा हुआ था।"
"किसने भरा?"
"यही तो सवाल है," मीरा ने कहा, "या—"
वो रुकी।
"या अंदर वाले ने खुद को बाहर कर दिया।"
शबनम आपा ने अपना कुल्हड़ उठाया और एक घूँट में पूरी चाय पी ली।
"बहन," उन्होंने कहा, "मेरे पास बीस ज़्यादा कुल्हड़ हैं गुमटी में। कहीं इन्हें ले आऊँ?"
"क्यों?"
"क्योंकि आज यहाँ जो होने वाला है, वो सूखे गले से नहीं होगा।"
मैंने ताला वापस मेज़ पर रखा।
वो ठंडा था। अभी भी।
पर अब उसकी ठंडक कुछ और कह रही थी।
मैंने अपनी कॉपी खोली। "शंकर यादव — हिसाब बराबर" के नीचे जो सवाल लिखा था — "अंदर वाला कौन है?" — उसके नीचे मैंने एक नई लाइन जोड़ी।
"अंदर वाले ने अपना रास्ता बदला।"
और फिर मैंने अपनी कलम नीचे रखी, कॉपी बंद की, और खिड़की की तरफ़ देखा।
बाहर सूरज ऊपर आ रहा था। गली में किसी ने पानी डाला था, धूल बैठ रही थी।
पीपल की छाया लंबी पड़ रही थी।
वो छाया जहाँ आज सुबह कुछ आदमी हँस रहे थे।
मैंने मीरा की तरफ़ देखा।
"सुन," मैंने कहा, "एक काम कर। रणवीर के पास जो लोग काम करते हैं — बबलू के अलावा — उनमें से कोई जो अभी भी हमसे बात कर सके, ऐसा कोई है?"
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